सत्पथ
मिथ्या से बचकर रहो, सच का डालो हार।
सच पर चलने के लिए, दो त्याग अहंकार।।
सत्यनिष्ठा औ प्रतिज्ञा, हो हिम्मत दरकार।
मृत्यु है एकबार ही, कभी न डरना यार।।
बातें सच की सब करें, सच की चलें न राह।
बातें सब हँसकर करें, मन में रखकर डाह।।
सच है अब कम हो गई, सच की पैदावार।
आज सभी को चाहिए, सुवर्ण, बँगला कार।।
बातें करते हैं सभी, सारी अच्छी बात।
मौका मिलते ही करें, भीतर से आघात।।
सच पर चलने की सजा, कठिन बहुत है यार।
सतयुग में भी देखिए, बिखर गया परिवार।।
राजा बलि का दोष क्या, दानी था वह वीर।
प्रभु वामन बन आ गये, कृत्य न था गंभीर।।
सतयुग में सत् चुक गया, कलयुग की क्या बात।
पग-पग पर है परीक्षा, बड़े-बड़े आघात।।
हर युग खाईं ठोकरें, मानी कभी न हार।
सच की जिद है आज भी, तुम भी मानो यार।।
दुर्गम राह भले सही, श्रेय परम् संतोष।
कुंदन निखरे आग से, यही बने परितोष।।
मिथ्या से बचकर रहो, सच का डालो हार।
सच पर चलने के लिए, दो त्याग अहंकार।।
सत्यनिष्ठा औ प्रतिज्ञा, हो हिम्मत दरकार।
मृत्यु है एकबार ही, कभी न डरना यार।।
बातें सच की सब करें, सच की चलें न राह।
बातें सब हँसकर करें, मन में रखकर डाह।।
सच है अब कम हो गई, सच की पैदावार।
आज सभी को चाहिए, सुवर्ण, बँगला कार।।
बातें करते हैं सभी, सारी अच्छी बात।
मौका मिलते ही करें, भीतर से आघात।।
सच पर चलने की सजा, कठिन बहुत है यार।
सतयुग में भी देखिए, बिखर गया परिवार।।
राजा बलि का दोष क्या, दानी था वह वीर।
प्रभु वामन बन आ गये, कृत्य न था गंभीर।।
सतयुग में सत् चुक गया, कलयुग की क्या बात।
पग-पग पर है परीक्षा, बड़े-बड़े आघात।।
हर युग खाईं ठोकरें, मानी कभी न हार।
सच की जिद है आज भी, तुम भी मानो यार।।
दुर्गम राह भले सही, श्रेय परम् संतोष।
कुंदन निखरे आग से, यही बने परितोष।।


