दोहे - सत्पथ

सत्पथ

मिथ्या से बचकर रहो, सच का डालो हार।
सच पर चलने के लिए, दो त्याग अहंकार।।

सत्यनिष्ठा औ प्रतिज्ञा, हो हिम्मत दरकार।
मृत्यु है एकबार ही,  कभी न  डरना  यार।।

बातें सच की सब करें, सच की चलें न राह।
बातें सब हँसकर करें,  मन में रखकर डाह।।

सच है अब कम हो गई,  सच की  पैदावार।
आज सभी को चाहिए, सुवर्ण, बँगला कार।।

बातें करते हैं सभी,  सारी  अच्छी बात।
मौका मिलते ही करें, भीतर से आघात।।

सच पर चलने की सजा, कठिन बहुत है यार।
सतयुग में भी  देखिए,  बिखर  गया  परिवार।।

राजा बलि का दोष क्या, दानी था वह वीर।
प्रभु वामन बन आ गये, कृत्य न था गंभीर।।

सतयुग में सत् चुक गया, कलयुग की क्या बात।
पग-पग   पर   है   परीक्षा,   बड़े-बड़े   आघात।।

हर  युग  खाईं  ठोकरें,  मानी  कभी  न  हार।
सच की जिद है आज भी, तुम भी मानो यार।।

दुर्गम राह भले सही, श्रेय  परम्  संतोष।
कुंदन निखरे आग से, यही बने परितोष।।

चुनावी दोहे

मिल सकता अवसर पुनः, खूब मचाना लूट।
बार-बार जो भज सको,  वही  पुराना  झूठ।।

झाँसा-पट्टी  खा   गये,   भूल गये  इतिहास।
चल पड़ा फिर रिमोट से, सत्ता का परिहास।।

मान-मनौव्वल शुरु हुआ, कौन बने सिरमौर।
आगे की  अब  सोचिये,  आया  कैसा  दौर।।

लो जी अब तो हो गये,  हम भी हैं निरपेक्ष।
मन की बात मत करना, अर्थ लगा सापेक्ष।।

जीत मिली पर खुश नहीं,  कैसा आया काल।
खुद के  बुने  उलझ  गये,  वादों  के  जंजाल।।

संभव है हर बार ही, झोंक सको तुम धूल।
कुछ दिनों के बाद ही, जनता जाती भूल।।

माफ किया हमने तुझे, मत करना फरियाद।
भूल गये सब लोभ में,  रहा न कुछ भी याद।।

छोटी-मोटी बात पर,  नाप  दिया  सरकार।
आगे की तो बात क्या, शुरू अभी तकरार।।

कीमत मत की भूलकर,  बेच  दिया  बेमोल।
अपनी किस्मत आप ही, रखकर डंडी तोल।।

चक्र घूम रथ का  गया,   ऐसा  चला  कुचक्र।
अर्द्ध-सत्य ने फिर किया, राह काल का वक्र।।

नक्कारे की चल पड़ी, उल्टी सीधी चाल।
बल्ले-बल्ले हो रही ,  ठोंको  देकर  ताल।।

सिक्का खोटा चल गया, चहक रही मुस्कान।
इतिहास मगर कह रहा,  फीकी  है पकवान।।

दिये जलायें

आओ मिलकर दिये जलायें,
तम को मन से  दूर भगायें।
रह   जाये  ना कोई  कोना,
अबकी ऐसी अलख  जगायें।

दुनिया का यह कैसा मेला,
लेकर  के हाथों  में थैला,
फिरते   हैं सब  मारे-मारे,
ढूंढ  रहे हैं   बैठ किनारे।

जो   भी चाहे  मोती पाये,
तजकर आलस डूब लगाये।
आओ मिलकर दिये जलायें,
तम को मन  से दूर भगायें।

आनी-जानी   दुनिया फेरा,
किसका घर है किसका  डेरा,
आओ दिल में ज्योति जलायें,
अरमानों    के पंख लगायें।

जो   चाहे  आकर ले  जाये,
मिलजुल कर नवदीप जलाये।
आओ मिलकर  दिये जलायें,
तम  को मन  से दूर भगायें।

रात अमावस की  यह काली,
वरदानों     से भरनेवाली,
साफ-सफाई  का मौसम है,
विजयोल्लास का यह पर्व है।

आओ      तोरणद्वार    बनायें,
सुख-समृद्धि से घर को सजायें।
आओ   मिलकर  दिये जलायें,
तम   को मन  से दूर भगायें।


बोलते दिये

बोलते दिये
°°°

रूंदी  मिट्टी,  पानी  देकर,  वह  देती   चाक  चढ़ाय,
मिट्टी को  देकर एक रूप नया  मात  रही  मुस्काय।

चलती चक्की पर बड़े प्रेम से उंगली वह फिराती है,
हौले-हौले मिट्टी में वह एक नवजीवन गढ़  देती  है।

परम संतोष भाव से एक-एक भाजन गढ़ती जाती है,
कभी घड़ा, कभी कुल्हड़, तो दिये  कभी  बनाती  है।

रह जाये जो कुछ अक्र-वक्र, सहलाती है, दुलराती है,
देखकर अपनी संततियों को वह फूले नहीं समाती है।

जननी है वह तो सबको एक समान सुपूत बनाती है
ठोंक पीटकर मिट्टी के लोंदे को घड़ा वह बनाती  है।

सूखकर  छाया  में  जब  आकार स्थिर हो जाता है,
आवे में पककर भाँड फिर पानी को भी धर लेता है।

उम्र की रेखाएँ मुखपर कहानी अपनी लिख जाती हैं,
दुख चाहे जितना हो, सृजन  का  सुख  दे  जाती  है।



आत्मनिष्ठ

शर्माजी, वर्माजी से फोन पर बातें कर रहे थे।

"आओ यार बहुत दिन हो गए मिले हुए।" ..... तभी उनका कुत्ता आ जाता है । "टॉमी, अभी जाओ उधर, देख नहीं रहे हो, अंकल से बात कर रहा हूँ। ....... ये टॉमी भी ना, बस पूछो मत, अपने मे ही उलझाए रखता है । कभी घुमाने ले जाओ कभी सहलाओ ! बच्चों की तरह नखड़े करता रहता है ।" पत्नी को पुकारते हैं, "अरे भई, दो इसको बिस्किट-विस्किट ।" हाँ वर्मा, तो मैं क्या कह रहा था, आओ ना कभी । टॉमी से मिलवाता हूँ । बहुत मिलनसार है । बिटिया ले आई थी स्टेट्स जाने से पहले । वह तो इसके बिना एक पल भी नहीं रह पाती थी । हमारा भी इसी के साथ टाइम पास हो जाता है । वो भाईसाब बाहर के आदमी को देखकर जो उछलता है ! ............. आओ ना, फिर मिल बैठकर बात करते हैं । .......... अरे भाई, मेरा क्या, पैमवे का काम तो चल ही रहा था, आजकल एक वेटलॉस हर्बल प्रॉडक्ट का भी काम शुरू कर दिया है। "

वर्माजी ने फोन कब काटा, शर्माजी को पता भी नहीं चला।

दूसरों की भावनाओं को समझने की फुर्सत भी किसे है!

https://youtu.be/CA1QzvNo71M

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बेदिल दिल्ली

धूल, धुँए और धुंध में लिपटी
एक शहर दिल्ली है।
हर पल की आपाधापी है
बिना बात की मारामारी है।
फितरत नहीं हद में रहना
हर तरफ कोलाहल है।
वाहनों की रेंगती कतार है
पर्वताकार कूड़ों के अंबार हैं।
कभी कंधे टकराने को लेकर
तो कभी हार्न पर अकड़ जाती है।
छोटी-छोटी बात पर
असीम हाहाकार है।
कितना नाज था कभी
दिल वालों की दिल्ली पर!
आज दिल्ली की बेदिली
हर पल जलाती है।
दिल्ली वालों मदद मत माँगना
चलती कार में अस्मत का व्यापार है।
बीच सड़क पर कूड़ा डाल
घर अपने चमकाते रहना।
माता-पिता को छोड़ निरूपाय
पहाड़ों की सैर को जाना।
भरोसा किसी पर मत करना
अपनों का हिसाब बहुत बुरा है।

वतन_के_लिए

नमन  तुम्हें  देश  के  वीरों, 
                    ऋणी  तुम्हारा  देश  है।
मिट गये तुम देश की खातिर,
                    आज का यह संदेश है।

माँ की गोदी कितनी उजड़ी,
                    सूनी कितनी माँग हुई।
बहन देखती रह गईं राह,
                    गली गाँव की सून हुई।

आते जाते पूछें राही,
              किस घर का वह वासी था।
पत्थर एक लिखा सरहद पर,
                  वह बस भारतवासी था। ----------

देकर हमको आजादी वह,
                     देखो हो गुमनाम रहा।
अपना फर्ज निभाकर वह तो,
                  बनकर सदा अनाम रहा।

मातृभूमि पर करे निछावर,
                     नसीब नहीं सभी पाते।
देशहित में जी लें जो यहाँ,
                  कम नहीं कर्तव्य निभाते। ---------

साफ-सफाई और सुरक्षा,
                आचरण सही हो जिसका।
कहाँ महत्व कम हुआ उसका,
             बचा विरल गुण यह किसका।

आज तिरंगा बोल रहा है,
                अब लेकर आगे जाओ।
कठिन तपस्या का यह फल है,
                समुचित है मोल चुकाओ। ---------

अपनी हिंदी

अपनी हिंदी

अनुपम अपनी अभिलाषा
गूढ़ बहुत संघर्षों की गाथा
भावों की धारा अविरल है, अपनी यह हिंदी भाषा।

विविधता के कितने रंग सजाये
हर बोली का यह मान बढ़ाये
सरस और सरल कितनी है, अपनी यह हिंदी भाषा।

जन-मन की अभिव्यक्ति हिंदी
देश की बहुल-संस्कृति है हिंदी
मेल जोल की गंगा जमुनी है, अपनी यह हिंदी भाषा।

सदियों की दासता के विरुद्ध
जन-गण का जब छिड़ा महायुद्ध
मुक्ति का मार्ग बन गई है, अपनी यह हिंदी भाषा।

तुलसी की चौपाई, मीरा के पद
दोहे कबीर के या रसखान हों
प्रेम और सद्भाव अनुपूरित है, अपनी यह हिंदी भाषा।

अलंकार के, श्रृंगार के अद्भुत
ओज सोज से भरी हुई है
प्रवाहमयी और प्रांजल है, अपनी यह हिंदी भाषा।

दिवस चौदह माह सितंबर
सन् उन्नीस सौ उन्चास
घोषित हुई जब राजभाषा है, अपनी यह हिंदी भाषा।

हिंदी चंदन, हिंदी वंदन
हिंदी नवयुग का है अभिनंदन
नमन और मनन दिल से है, अपनी यह हिंदी भाषा।

लघुकथा - यम सा नियम

सेठ जमनालाल भोजन कर रहे हैं । आमतौर पर घर में सब से पहले भोजन वही करते हैं। घर वालों ने उन्हें इतना सम्मान दे रखा है कि दोपहर का या रात्रि का भोजन हो, शुरुआत उनसे ही होती है। आखिर घर के सबसे बुजुर्ग जो ठहरे। चार पुत्रों, बहुओं और पोते-पोतियों से भरा यह घर पूरे मोहल्ले में एक आदर्श परिवार है, आज के समय में। 

एकदम सधी हुई और नियमित दिनचर्या है सेठ जी की। गिनती की तीन चपातियाँ, कम तेल-मसालों में बनी हुई सब्जी और साथ में थोड़ा सा दूध। रात में सामान्यतः यही कुछ उनका आहार है। दिल की बीमारी के कारण परहेज से ही रहते हैं। घर वालों को भी आदत सी पड़ गई है। सबकुछ नियमानुसार चल रहा है। यांत्रिक सी जीवनचर्या कभी-कभी उबाऊ भी लगती है। बहू ने खाना दिया, उन्होंने सिर झुकाकर खाना शुरु किया और कमरा खाली। खाना ख़त्म होते न होते उनकी दवाइयाँ हाजिर। कोई मान-मनुहार नहीं, कमी-बेसी की कोई गुंजाईश नहीं। 

परंतु आज सब्जी कुछ खास लग रही है। उनको इच्छा हो रही है कि एक चपाती और ले लें। ‘काश कि आज बहू ही पूछ ले।’ पत्नी, गठिया के कारण कम ही इधर-उधर करती है, शायद आ जाए और पूछ बैठे, पुराने दिनों की तरह। जब, ‘हो गया’ कहने के बाद भी वह चपाती लेकर जरूर आती थी और उनके हाथ धोने तक खड़ी रहती थी। और नहीं तो उनके प्यारे पोते-पोतियों में से ही कोई आ निकले .......। सोचने लगे, ‘बोल दूंगा, लेता तो नहीं, मगर तुम्हारा आग्रह है तो मानना ही पड़ेगा’। 

जैसे ही उन्होंने सिर उठाया, अपनी प्यारी पोती अंशु को सामने पाया। एक स्मित सी मुस्कान तिर आई। पोती ने मुट्ठी खोल कर दाहिनी हथेली को सामने कर दिया जिसमें दवाएँ हैं। कुछ भी नहीं कहा, सूनी हो गई आँखों से पोती के मासूम चेहरे को निहारते हुए अपनी बाईं हाथ से दवाइयाँ उठा लीं।

लघुकथा - नामकरण

नामकरण

        "ओये लौंडे तुम्हारा नाम क्या है?" निकृष्टतम काली पोशाक में मुच्छड़ कालू उस्ताद ने पूछा। जी में आया जली हुई मोबिल सनी मिट्टी मुँह पर झोंक कर भाग पड़े ! पिता की मृत्यु और माँ की परिस्थिति का ख्याल कर चाचा उसे काम सिखाने के लिए शहर लेकर आया था। ....  खून का घूँट पी कर रह गया।

       "तेजवीर प्रताप सिंह। " बड़ी मुश्किल से बोल पाया।
       "बाप का नाम ?"
        "सूर्यवीर प्रताप सिंह। " न चाहते हुए भी एक गुस्सा सा आँखों में उतर आया। झटका खा गया उस्ताद भी।

        "चलो छोडो, क्या रखा है नाम में। गैराज लाइन का उसूल है। हर नया लड़का, टेनी, रामू, कालू, राजू, ओये या अबे होता है। पुराना हो जाने पर जब अपना खोल लोगे तो उस्ताद अपने-आप जुड़ जायेगा।"

        "हर नई शुरुआत के लिए पुराने को मिटना ही होता है। 

लघुकथा - एक और पन्ना धाय

एक और पन्ना धाय “मेरी बातें ध्यान से सुनना। किसी भी प्रकार की होशियारी बहुत महँगी पड़ेगी। तुम्हारा बेटा और चौकीदार दोनों ही हमारे कब्जे में हैं। ....... उनकी सलामती चाहिए तो बस, जब, जैसा, जो करने को कहा जाए, करते जाना। पुलिस की तो सोचना भी मत। ....... हमारे अगले कॉल का इंतजार करो।” फोन विच्छेदित होते ही सेठ चम्पक लाल की आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा। फोन एक डरावनी वस्तु लगने लगा। बिना एक पल गँवाए घर का रूख किया। रास्ते भर, हजारों तरह की आशंकाएं मन में आती रहीं। अपनी सारी सफलताओं पर ही आज ग्लानि हो रही थी। गेट पर चौकीदार नहीं था। ....... ‘इसका मतलब फोन करनेवाले की बात सही थी। या तो उसे भी उठा लिया गया होगा या फिर वह भी उन्हीं लोगों से मिल गया होगा ! छोटे लोगों के ईमान का क्या भरोसा !’ ....... बदहवासी की हालत में दौड़ते हुए से ऊपर बेडरूम में पहुंचे। बच्चे को सही-सलामत देख कर कलेजा मुँह को आ गया। बेतहासा गले से लगा लिया। ....... सोचने लगे तो क्या चौकीदार ने अपहरणकर्ताओं को झूठ बोलकर अपना ही बच्चा ....... !!

लघुकथा - भलाई की सींग पूँछ नहीं होती

भलाई की सींग पूँछ नहीं होती

बढती भीड़ और लम्बी होती कतार स्थाई समस्या सी बन चुकी है महानगरों की। उसपर से जब देश की राजधानी दिल्ली की बात हो तो ........  कहने ही क्या ! मेट्रो की शुरुआत हुई। मानों राजधानी की धमनियों में एंजियोप्लास्टी कर स्टेंट डाल दी गई हो। पर थोड़े ही दिनों में फिर से नसों में संकुचन होने लगीं। एएफसी गेट पर कतारें लम्बी होने लग गईं। विकल्प के तौर पर कुछ स्टेशनों पर बाई-पास की तरह एक गेट, ‘मात्र निकास के लिए’, बनाया गया।

निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पर एक नंबर प्लेटफार्म की तरफ से सिर्फ निकास वाली सीढियाँ चलन में आ चुकी हैं। बहुत से लोग जिन्हें स्कोप मीनार, ईस्ट एंड या गुरु अंगद नगर की ओर जाना होता है, इन्हीं सीढ़ियों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कुछ लोग मात्र निकास वाली अवधारणा को नहीं समझने के कारण इसी मार्ग से सहमते से धीरे-धीरे ऊपर की ओर भी यदा-कदा जाते दिखाई दे जाते हैं। वैसे, हर जगह भीड़ देखने की आदि आँखें कुछ ही सीढियाँ चढ़ते ही शक करने लग जातीं कि ऊपर की ओर जाने के लिए 'इतने कम लोग क्यों या फिर मैं अकेला ही कैसे ! मगर पूछे भी तो किससे ! सभी धडाधड उतरे ही जा रहे हैं ! जगहंसाई का खतरा अलग से !’

ऐसे ही एक दूसरे का सहारा लेकर सीढियाँ चढ़ रहे एक वृद्ध दम्पती को बड़ा सहारा मिला, जब लगभग दौड़कर उतरती हुई एक जींस-टॉप वाली लड़की ने रुककर पूछ लिया कि ‘दूसरी ओर पार करनी है या मेट्रो पकड़नी है’ और बताया कि "........... अम्माँ ये सीढ़ियाँ सिर्फ नीचे जाने के लिए हैं, आप तो बस, ऊपर के लिए, सर्विस लेन की दूसरी ओर से लिफ्ट या सीढ़ी पकड़ो। "

सहमी, सकुचाई, आशाभरी निगाहों को देखते/महसूसते तो सभी हैं, पर पहल करने की जहमत लेने वाले विरले ही होते हैं। ..... और उनके कोई धर्म, जाति या लिंग नहीं नहीं होते। सच ही कहते हैं, भलाई के लिए किसी सींग पूँछ की आवश्यकता नहीं होती।

लघुकथा - गति-मति

गति-मति

साढ़े आठ बजते-बजते आलोक रंजन जी रात्रि भोजन कर लेते हैं। बच्चों के भोजन का समय देर से होता है। श्रीमती जी का समय, उनके और बच्चों के बीच में, कहीं उनके जीवन की ही तरह डोलता रहता है। किसी के पास खाली समय होता ही नहीं ! सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त।  

ऐसा नहीं कि आलोक रंजन के पास मोबाइल नहीं है!  उनके पास भी है और इस्तेमाल करने का हुनर भी ! फिर भी कहीं-ना-कहीं उन्हें लगता है कि इससे बेहतर होता आपस में बैठकर कुछ बातें करते। इसी, बात से ही तो बच्चों को अधिक चिढ़ होती, कि सारी बात घूम-फिरकर नसीहतों पर आ जानी है ! खास तौर पर, हमारे समय में ऐसा होता था, अब के बच्चे ऐसा करते हैं, वैसा करते हैं ! समझते ही नहीं, जिम्मेदारी का एहसास ही नहीं है ! शायद इन्हीं वजहों से एक ही मकान में कई कमरे और कमरों भी कई सूने कोने विकसित होते जा रहे हैं। 

अपने इस अकेलेपन को दूर करने का उन्होंने एक रास्ता निकाल लिया है। भोजन करते ही, सामने के पार्क में, टहलने के लिए चल पड़ते हैं।  यहां घूमते हुए, उन्होंने एक दोस्त भी बना लिया है।   मन-ही-मन अपने इस दोस्त से वह भरपूर मन की बातें किया करते हैं। कहीं-ना-कहीं लगता है कि उनका दोस्त भी उन्हीं की तरह अकेलेपन का शिकार है और उनसे ही मिलने आया करता है।  उनका दोस्त कोई जीव जंतु नहीं बल्कि आसमान में उड़ने वाला जहाज है। उनका दोस्त, एयरपोर्ट पर उतरने की क्यू में होने के कारण चक्कर काट रहा होता है।  जब तक वह पार्क का एक चक्कर लगाते हैं, दोस्त दो चक्कर लगा कर उन्हें चुनौती दे रहा होता है।  तब वे पहचानने की कोशिश करते हैं कि उनका दोस्त उनके साथ धोखा/चीटिंग तो नहीं कर रहा ! वही जहाज बार-बार चक्कर लगाता है या हर चक्कर पर कोई नया आ जाता है। भुक-भुकाती बत्तियां कभी नीली, कभी पीली और कभी लाल; कभी दाएं और कभी बायें या कभी पीछे की ओर ! इन्हीं जलती बुझती बत्तियों या सरसराती, गड़गड़ाती आवाजों से वह अपने दोस्त को पहचानने की कोशिश करते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं। .......अचानक उनका दोस्त आसमान से गायब हो जाता है,  .......शायद उसे उतरने की जगह मिल गई होगी।  

....... एक लम्बी उच्छ्वास निकलती है उनके मन के सूने कोने से।  ........ वे याद करने लग जाते हैं, ........ कभी इसी समय पत्नी के साथ लूडो खेलने बैठ जाया करते थे और धोखे से अधिक घर गोटी सरका लेने के सवाल पर दोनों जी भरकर लड़ने का खेल खेल कर हँसते हुए सोने चले जाया करते थे। 

मच्छड़ बनाम मुच्छड़ संस्कृति!

मच्छड़ बनाम मुच्छड़ संस्कृति!


एक व्यक्ति घर के बाहर बरामदे में बैठा हुआ था। एक मच्छड़ बार-बार उसके चेहरे पर आकर बैठ जा रहा था।
इस बार व्यक्ति का हाथ चेहरे पर लगा और मच्छड़ मारा गया। दूसरे मच्छड़ सोच रहे थे, मरनेवाला शायद
थोड़ा आलसी था या कुछ ज्यादा ही लालच कर गया।  ........ मच्छड़ संस्कृति!

शर्मा जी के घर कल सी.बी.आई. का छापा पड़ा था। आज शहर भर में उसीके चर्चे हैं। अखबार पर नजरें गड़ाए
वर्मा जी सोच रहे हैं, 'शर्मा जी से चूक कहाँ हुई होगी, वैसे तो बड़े स्मार्ट बने फिरते थे' ! ........ मुच्छड़ संस्कृति!

बड़े खिलाड़ी

गुप्ता जी  अपने बड़े खिलाड़ी।
समझे ना  इनको कोई अनाड़ी।

घर  के काम  दफ्तर में  करते।
दफ्तर की झट इधर-उधर करते।
गुप्ता  जी अपने  बड़े खिलाड़ी।
समझे  ना इनको  कोई अनाड़ी।

हँस-हँस  के बोलें जहर  बुझे बोल।
करते रहते सबसे हरदम मोलजोल।
पुरानी गाड़ी लेकर ढूंढें रोज कबाड़ी।  
गुप्ता   जी अपने   बड़े खिलाड़ी।

वैसे तो बनते  हैं शुद्ध शाकाहारी।
फिश फिंगर  पर करते मारामारी।
लाते सब्जी  लेकर सरकारी गाड़ी।
गुप्ता   जी अपने   बड़े खिलाड़ी।

वैसे   तो बड़े   ही मिलनसार  हैं।
मानो रसगुल्ले की खट्टी डकार  हैं।
खा-खा   कर इनकी  फूली हाँड़ी।

गुप्ता   जी अपने  बड़े खिलाड़ी।

दोहा एकादसी

दोहा एकादसी
कौन यहाँ अब पूछता, सुनकर करुण पुकार।
मानवता है चुक  गई,  अजब  हुआ  संसार।।१
मानवता के नाम पर, ऊँची बनी दुकान।
सच को झूठ बना रहे, फीके हैं पकवान।।२
दया, कृपा और करुणा, बनी किताबी बात।
पर पीड़ा में ढूंढते,  अब  तो  शह औ मात।।३
किसको फुर्सत है यहाँ, मिलने की हर रोज।
पर्व-त्योहार पर नहीं, ले पाते अब खोज।। ४
पक्के बने मकान ज्यों, मन भी हुआ कठोर।
हर तरफ है मचा हुआ, खींचतान पुरजोर।।५
कुटिल है देखो कितनी, उनकी सारी चाल।
बनता काम बिगाड़ के, खुश हो कूदें डाल।।६
बेटे  की  ही  चाह  में,  कन्या  देत  उजाड़।
निर्धन घर ममता मिले, बिटिया हुई पहाड़।।७
मात-पिता को त्याग कर, खुश हैं श्रवण कुमार।
नीर नहीं जब  नयन  में,  किसे  कहें  परिवार।।८
वाणी मधुर कहाँ मिले, बहुत बुरा है हाल।
निर्मम कड़वे बोल हैं, नोचें  अपनी  खाल।।९
बातें बनकर  रह  गईं,  दिखे  कहाँ  इंसान।
बीत अनेक वर्ष गये, मिले न साधु सुजान।।१०
बीच सड़क चोटिल हुआ, पड़ा रहा इंसान।
खींच सेल्फी चल दिये, कितने हैं नादान।।११

लघुकथा - भरोसा

भरोसा

       उच्चाधिकारियों की बैठक बुलाई गई है। माननीय मंत्री पर्यावरण संकट की समीक्षा कर रहे हैं।
      "आज तीसरा दिन है राज्य के आसमान पर धूल के बादल छाए हुए हैं और आपलोग कुछ करना तो दूर समस्या से कैसे निपटा जाए इसकी एक कार्य-योजना तक नहीं प्रस्तुत कर पाए हैं। चलिये योजना भी छोड़िये, एक बयान तक नहीं दे पाए हैं। इससे पहले कि समस्या खुद-ब-खुद दूर हो जाए, लोकतंत्र का तकाजा निभाना होगा। इतनी संवेदनशीलता तो दिखानी ही होगी कि लोगों का भरोसा अपनी चुनी हुई सरकार पर बनी रहे।"
      अगले दिन के अखबारों में अभूतपूर्व वायु प्रदूषण से निपटने के सरकारी प्रयासों की कई खबरें छपी थीं। पानी की बौछारें करते टैंकर, वैक्यूम क्लीनिंग मशीनों से सफाई के चित्र भी छपे थे।

बस यही मत पूछना

बस यही मत पूछना

पेंशन हेतु लाइफ सर्टिफिकेट अर्थात जीवन प्रमाण-पत्र के लिए संजीत कौर कार्यालय में आई थी, पोपला सा मुस्कुराता चेहरा लिए। अभी दो ही साल हुए हैं उनको अवकाश ग्रहण किये हुए। विदाई समारोह का पूरा दृश्य मन आँखों के सम्मुख ताजा हो आया। खासकर, उनकी बहू की वह स्वीकारोक्ति, जिसमें उसने गलत-फहमी होने की बात स्वीकारी थी और दुबारा ऐसी गलती न होने की कसम खाई थी।

दुआ-सलाम के बाद पूछा, “मैडम कैसी हो, सब कैसा चल रहा है ?”
    अपने चिर परिचित अंदाज में गर्मजोशी से उसने जवाब दिया, “सब चंगा है, जी। आपलोगों की दुआएं हैं और रब की मेहर है, किसी चीज की कोई कमी नहीं है जी। अच्छी भली सेहत है, प्रभु कृपा से दाल-रोटी की भी कमी नहीं है।“
    बेटे-बहू ठीक से रखते हैं? लगे हाथों पूछ ही लिया।
    “बस यही मत पूछना! बाकी सब ठीक है। “
    मुस्कुरा वह तब भी रही थी, मगर उसके पीछे के आँसू छुप कहाँ रहे थे!

अपरिचय

अपरिचय

निर्धारित समय पर दोनों एक पार्क मिले। संयोग अच्छा था, एक सूने कोने में खाली बेंच भी मिल गई। दोनों एक दूसरे से इस तरह चिपक गए जैसे कभी अलग होना ही न हो।
“सुनो। … अगले हफ्ते मैं जा रही हूँ। “ घुटती सी आवाज में लड़की ने कहा।
“कहाँ? अधरामृत का पान करते हुए लड़के ने पूछा।
    “ऊ…. हरपालपुर। “
    “किसलिए। “
    “मेरी शादी तय हो गई है। आज अपनी आखिरी मुलाकात है। समझ नहीं आ रहा, तुम्हारे बिन कैसे जिऊंगी! “
    “ओह …. !”
    फिर, दोनों ने स्वयं को एक दूसरे से आजाद किया और अपनी-अपनी राह पकड़ ली। ...... ऐसे, जैसे कभी मिले ही न हों!

सख्त व्यवस्था

सख्त व्यवस्था

एक मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर सुबह नौ बजे, एक टांग वाला लाचार व्यक्ति बिखरा पड़ा था और आने जाने वाले यात्रियों से दर्दनाक आवाज में दया की अपील कर रहा था।

दोपहर बाद के दो बजे, उसी जगह, आठ-दस सीढियाँ ऊपर मैले-कुचैले कपड़ों में एक औरत, एक बेसुध से बच्चे को लेकर बैठी थी और आनेजाने वाले की आत्माओं को झकझोर रही थी।

रात्रि के नौ बजे, वहीं, चंद सीढ़ियाँ ऊपर या नीचे, एक दीन-हीन असहाय सी बूढी औरत लोगों को पुण्य के लिए ललकारती पाई जाती है।

परिसर में सीसीटीवी सहित ….  गहन निगरानी व्यवस्था है।  प्रतीत होता है, सुरक्षा एजेंसी की ही तरह इनकी भी पाली बदलती है सख्त निरीक्षण में।

कभी नरम - कभी गरम

कभी नरम - कभी गरम 

मेट्रो में दाखिल होते ही उस अधेड़ सज्जन ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित सीट पर बैठे युवकों की ओर अजीब  दृष्टि से देखा, मानों उससे खड़ा होना भी दूभर हो रहा हो। दोनों में से एक ज्यादा ही शातिर निकला! उसने नजरें मिलाई ही नहीं और आँखें बंद कर सोने का दिखावा करने लगा। दूसरा बर्दाश्त नहीं कर पाया और सीट खाली कर दी। व्यक्ति आराम से मोबाइल से खेलने लगा।

गंतव्य स्टेशन आते ही वही व्यक्ति लगभग दौड़ता हुआ सा सभी को पीछे छोड़ता हुआ निकास द्वार की ओर सबसे पहले निकलने के लिए भाग रहा था।

अभागा दरिंदा

अभागा दरिंदा

आज शहर के तमाम अखबारों ने विगत सप्ताह हुए अपर्णा वर्मा हत्याकांड के रिकॉर्ड समय में पुलिस द्वारा किए गये खुलासे की सुर्खियाँ लगाई थीं।

आर.डब्ल्यू.ए. के सीसीटीवी फुटेज में घटना के समय के पूर्व व समय के बाद जो लड़का बदहवास अवस्था में जाता दिखाई दिया था, वह घर के नौकर सोनू का दोस्त रमेश निकला जिसे पुलिस ने दबिश देकर बिहार के सोनपुर से लूट के जेवरात सहित गिरफ्तार कर लिया। जैसे ही पुलिस ने अपने तरीकों का इस्तेमाल किया कि टूट गया। उसने कुबूल किया कि सोनू के कहने पर ही उसने मैडम जी की हत्या की थी। बाद में
लूट के माल की बँटवारा करने की योजना थी।

एक पड़ोसी के हवाले से यह भी खबर दी गई थी कि कैलिफोर्निया में रहने वाले उसके पुत्र से सम्पर्क किया गया तो पता चला कि जब भी उसकी बात माँ से होती थी तो वह बोला करती थी कि सोनू की पुत्रवत सेवा से वह अभिभूत थी और अपनी जायदाद में से एक हिस्सा मरणोपरांत उसके नाम कर जाना चाहती थी ताकि उसकी जिंदगी भी आगे चलकर व्यवस्थित हो सके।

सच ही कहा गया है, लालच बुरी बला है! अभागे ने लालच में आकर न सिर्फ मानवता को कलंकित किया बल्कि अपनी भी संवरती जिंदगी बर्बाद कर डाली।

लघुकथा - इशारा

इशारा

रोज की तरह वह आज भी ऑफिस के लिए घर से निकली। कॉलोनी के फाटक से निकलते ही दो आवारा किस्म के लड़के भद्दी सी सूरत से  भद्दे इशारे करते आज भी दिखे।

पास ही दो-चार आवारा कुत्ते भी रोज की तरह ही झाँव-झाँव करते हुए भी मिल गए। लड़की ने आज फैसला कर लिया था शायद, आव देखा न ताव और एक पत्थर उठाकर दे मारा। कुत्ते दुम दबाकर भाग खड़े हुए ...... लड़के भी ...... इशारा समझ चुके थे।

शतरंज सी है ज़िंदगी

बेशक शतरंज सी है ज़िंदगी
कभी फर्शी तो कभी है बंदगी।

प्यादे की दुःख भरी दास्तान है
बादशाह की देखो झूठी शान है।

घोड़े की ढाई घर की टेढ़ी छलांग है
ऊँट की भी तिरछी चाल उटपटांग है।

राजा तो संवैधानिक प्रधान बस नाम का है
पौ-बारह तो इस देश में वजीर के काम का है।

कटवाकर प्यादे को हाथी के पीछे छुप जाता है
वजीर के साथ गलबहियां डाले राजा मुस्काता है।

कभी सुस्ती से, कभी फुर्ती से दुश्मन को उलझाता है
बड़े ही इत्मीनान से शासक समस्या सुलझाता है।

शतरंज के खेल का उद्गम स्थल ही भारत है
हमारे आकाओं को इसमें इसीलिए महारत है।

चाहे कुछ भी जो जाये, खुद पर न आंच आने देना है
चाहे जिसका जो हो, जिन्दगी के भरपूर मजे लेना है ।

अंतिम प्रिया

अंतिम प्रिया

कितना करती हो मुझसे तुम प्यार प्रिये
यह जीवन है तुम्हारा ही उपहार प्रिये।
जन्म के साथ ही तुमसे जुड़ गया था नाता
जो भी आया इस जग में एक दिन है जाता।
बचपन खेल तमाशा, सपने जवानी के
घर-परिवार, डगमग पाँव बुढ़ापे के।
मोह-माया, झूठे सब जग के रिश्ते नाते
एक दिन तो पंछी सबको तजकर जाते।
प्रेम सरिता नयनों में बसाये फिरते
बनकर जोगी हर घाट में धूनी रमाते।
मनमोहक मनभावन कल्पना की मूरत
हरपल छाये आँखों में बस तेरी सूरत।
कितनी शीतल, निर्मल, कोमल, मधुर सी
अविरल प्रेरणा, उन्मुक्त चेतना पंख सी।
कटु सच है, पर कहाँ होता सबको पता
आने से पहले प्रिये बस इतना देना जता।
गठरी बांध सारे मायाजाल कर तिरोहित
तेरे आलिंगन को लेकर पुष्प संयोजित।
शपथ है विलम्ब नहीं बिलकुल करूंगा
प्रिये, चिर काल के लिये तेरा वरण करूंगा।

परछाईं

परछाईं
दिन ढलने लगा
परछाईयाँ होने लगीं लम्बी
खोने लगा इन्सान का वजूद
पालने लगा वहम
अपनी लम्बाई का।
गुम हो चुके अस्तित्व का
गढ़ने लगा इतिहास
करने लगा आभास
झूठी लम्बाई का।
देने लगा आभासी विस्तार
अपनी काली सघनता को।
काटने लगा खुद को
करने लगा विस्मृत
रात की असलियत
भूलकर सच्चाई
थोड़ी ही देर में चली जाएगी
साथ छोड़ जायेगी परछाईं।
मिट जाएगी परछाईं
रह जायेगा मानव ठगा सा
और भी लघु होकर
पहले से भी ज्यादा।

कामवाली

रधिया सुगिया  कहो या
गंगा जमुनी दे दो नाम।
आसपास  कई  घरों  में
करते रहते नित  काम।
काम  हमारा  किसी  को  भाए
कोई हरदम मीनमेख निकाले।
कोई   पूछे   पड़ोसी   का  हाल
दोष अपना कोई हम पर डाले।
रंग-रंगीले दुनिया के ढंग
बहू लाते ही हमें निकाले।
लाल  कई  ऐसे  भी  देखे
माँ को लाकर हमें धकेले।
पति   से   भी  ज्यादा
हमपर   रखे   निगाह।
ओह! बेचारी, कितनी
हसरत से भरती आह!
कोई   भागे    काम    पर
कोई   दिन   भर   सड़ती
ठसक   में  कमी  लेकिन
रत्ती भर भी कहाँ करती!
हमारा तो यह धंधा  है
माना कि गैरत कम है
परिवार अपना  मगर
इसी पर तो पलता  है।

दोहा त्रयोदशी

जीवन के प्रति :-
धैर्य सम धरम नहीं, जब हों दिन विपरीत।
ज्ञानी गुण त्यागें नहीं, दिन जानें दें बीत।। १

कली-कली हर अलि फिरें, करत फिरें गुंजार।
प्रेम सुधा रस पान कर, जीवन जोत संचार।। २

अद्भुत हैं खेल जग के, अद्भुत है संसार।
जाना तय है एक दिन, फिर भी मारामार।। ३

चलते-चलते थक चुके, होने को है शाम ।
चल मुसाफिर छेड़ तान, कल होगा अब काम।। ४

शांत चित्त है मन व्यथित, उपजा है अनुराग।
योगी बन भटकत फिरें, अपना-अपना भाग।। ५

विरहन की व्यथा :-
सज धज कर गोरी चली, पिया मिलन की आस।
रूठे सजन मिले कहाँ, टूट गया विश्वास ।। ६

पिया गए परदेस को, लाने चुनरी खास।
सजनी बाट जोह रही, जब तक तन में साँस।। ७

प्रीत की रीत जगत में, जान सका है कौन ।
सुनकर विरहन की व्यथा, रह जाते सब मौन ।। ८

इंदौर की घटना पर :-
कच्ची कली मसल दिया, नहीं हुआ संताप ।
पामर मन कलुषित हुआ, गहन हुआ उत्ताप ।। ९

अदालत ने कातिल की, कर दी सजा मुक़र्रर।
इतिहास एक रच दिया, सुनवाई त्वरित कर।। १०

तेईस दिन में फांसी, सजा सही सुनाई ।
वहशी कामुक सिरफिरे, देते अब दुहाई ।। ११

कानून व्यवस्था पर :-
धारण कर गहने कई, नार चली बाजार ।
गुंडे आकर ले गए, बाली, चैन उतार ।। १२

आम बात अब हो गई, गुंडों का है जोर।
चेन लूटकर बोलते, करना मत अब शोर।। १३

छलावा

कहाँ कुछ बदला है!
आज भी युवा चिंतित है
प्रेमपत्र नहीं लिखता है
नौकरियों की दौड़ लगाता है।
युवतियाँ सशंकित हैं
जल्दी घर लौटने के दबाव झेलती
घर और बाहर के काम निबटाती हैं।
हर बार बदलाव का बवंडर उठता है
और फुस्स हो जाता है
जड़ जाता है दो-चार गालियाँ!
पिटे हुए गालों को सहलाते हुए
याद करता है कंधों पर पड़े बोझ को
और लगाने लगता है फिर से दौड़
लगाने लगता है जुगाड़
शायद इसबार लग जाए!
भूख, गरीबी और असुरक्षा के बीच
कितना संयम दिखलाता है युवा!
समय छलावे की तरह आता है
गुजर जाता है, कुछ और जख्म देकर
और वह भागता रहता है
हाँफता हुआ दौड़ता रहता है।

उम्मीद की डोर

एक ख़त क्या आया, पूरे गाँव में शोर हो गया! इससे पहले कि वह पत्र उसके पताधारक अर्थात् पीताम्बर मिश्र को प्राप्त होता, गाँव भर को पता चल गया!

अब सभी इस बात का पता लगाने को व्यग्र हो उठे थे कि पीताम्बर के पिता श्री परशुराम मिश्र जो कि महीने भर पहले ही शहर के अस्पताल से अचानक गायब हो गये थे, के इस तरह लापता होने का क्या रहस्य था। … और यह भी कि सबसे सही अटकल किसने लगाई!

पीताम्बर को पत्र घर पर नहीं दिया गया। कालिदास आम पेड़ के नीचे एक बिनबुलाई पंचायत सी लग गई। पुत्र की सहमति से पिता के पत्र को उनके अभिन्न मित्र लिकड़ू काका ने खोला और गणेश पंडित को पढ़ने को दिया।

"… बड़ी उम्मीद लेकर आया था, बाबा, दादा, काका, चाचा बनकर सबके साथ जीवन के आखिरी पल बिताने! अकेला उस दिन नहीं हुआ जब शकुंतला छोड़कर कर चल बसी थी, …. उस समय उम्मीदें शेष थीं। अस्पताल के बिस्तर पर सात-सात दिन तक किसी अपने की प्रतीक्षा ने शायद उस उम्मीद की हत्या कर दी। … चलो माफ किया, माफी मांगता भी हूँ। अब तक जो हुआ सो हुआ… आगे मेरे लिए किसी भी प्रकार की परेशानी मत उठाना। सारी जिम्मेदारियों से बरी कर दिया। कोई क्रियाकर्म करने की आवश्यकता नहीं है। शकुंतला ने जीते जी कार्तिक उद्यापन के समय अपने साथ मेरे भी अंतिम संस्कार करा डाले थे, पंडित जी और समस्त ग्राम वासी साक्षी होंगे। …

एक भयावह सन्नाटे ने पूरे चौपाल को घेर लिया था।

सूचना संचार क्रांति

बिट-बाइट और अभिकेंद्रित परिपथ का चमत्कार
बदल दिया सबकुछ ऐसा अद्भुत यह आविष्कार।

सूचना सम्पर्क की अब तो बह रही बयार
टेलीफोन समा गये मुट्ठी में होकर बेतार।

बेकार हो रहे हैं देख लो, पुराने सभी तंत्र
स्मार्ट होने लगे हैं छोटे-बड़े घर के सारे यंत्र।

बुक करो, गाड़ी बुलाओ या फिर मंगाओ सामान
ऑनलाइन हो गया सबकुछ, कितना है आसान।

इंटरनेट का फैल गया यह मायावी जाल
अच्छा है कि बुरा, उलझन भरा है काल।

कॉल, विडिओ या चैटिंग में अबाल-वृद्ध मस्त
पल में इधर की उधर तो अफवाहों से भी पस्त।

सूचना और ज्ञान-सुलभ बन गया है संसार
अफवाहों की भी लेकिन भरपूर है पैदावार।

सूक्ष्म तरंगों से प्रवाहित अब विचार होने लगे हैं
सिमट रही है दुनिया, लोग करीब आने लगे हैं।


जमाना कितना बदल गया है

जमाना कितना बदल गया है

मां ने कहा,  पढ़ लिया करो
बेटा कूदने को छत पर चला गया।
बाप ने कहा, वक्त पर घर आ जाया करो
बेटी घर छोड़ कर चली गई।
ना जाने, क्यों! मगर ऐसा ही हो गया है
वक्त को मानों पंख लग गया है।
कल ही तो बेटा छोड़ कर गया था
आज ही बाप का कूल्हा खिसक गया है।
कल ही पाँव फिसले थे उनके
आज ही कूड़ेदान पर फेंककर चले गये हैं।

समय

❆ समय ❆

रे समय, तू भागता कहाँ है, छोड़कर मुझको इस समर में
ले चल, मुझको भी साथ, मत छोड़ अकेला इस समुंदर में

देखे हैं, कितने ही खेल निराले, इस जगत में जाने-अनजाने
झूठे सारे रिश्ते-नाते, आडम्बर हैं चाल-चलन नये या पुराने।

तू ही कर्ता-धर्ता है, और सच क्या है, एकमात्र तू ही जानता है
कर्म भी उसी का फलता है जग में, जो समय को पहचानता है।

छोड़ हमें बीच मँझधार में, रण से भागकर कहाँ तू सोता है
बाकी है काम अभी, इसीलिए प्रतिदिन तुम्हारा आना होता है।

देखा नहीं, पेशानी पर अपने, रेखाएं कितनी मैंने खींच रखी हैं
बंजरों में बाग लगाये, अभेद्य चट्टानें कितनी ही दरका रखी हैं।

किंतु अब जी घबराता है, मौसम यहाँ का बदलने लगा है
मजदूर भूख से मरता है, किसान आत्महत्या करने लगा है।

ससुराल

दुल्हन के वेश में सजी, भरी भरकम जोड़े से ढकी वह गाड़ी में अब अकेली रह गई थी। ननद की बेटी, चुनियाँ, जो रास्ते भर उसे चिकोटी काटती आई थी, वह भी, कब की उतर कर भाग गई थी। राजेश, भला घर के पास, इतने लोगों के सामने अपनी पत्नी के पास कैसे बैठ सकता था ! कितनी तौहीनी की बात होती ! ....... ‘वो देखो, शादी के पहले दिन से ही पत्नी से चिपका बैठा है! क्या ज़माना आ गया है ! जरा भी सब्र नहीं होता !’ ………
कुछ औरतें, कुछ बच्चे, बच्चियाँ कभी-कभी उसे घूंघट में से झाँक भी जाते, बिना उसकी कोई मर्जी जाने! मानों वह कोई सामान हो, उसकी मर्जी का क्या ! हाँ, सबको इस बात की तो जरूर उत्सुकता है कि जाने कि सामान क्या-क्या आया है ! सारे घर वाले भी इसी व्यवस्था में लगे हुए हैं कि सामानों को यथाशीघ्र कायदे से रखा जाये ताकि सभी लोग बिना किसी दिक्कत के देख सकें। ......... आखिर इतना सारा सामान मिला भी तो है। पूरे गाँव में आजतक किसी को भी इतना दहेज़ नहीं मिला होगा! पूरा ट्रक भर कर, हर तरह का सामान दिया था उसके पिता ने। शायद तभी ट्रक के उन सामानों की तो पूछ हो रही थी, मगर मुरझाये, बासी फूलों लटके कार में बैठी नई-नवेली दुल्हन, अपने ससुराल के दरवाजे पर पहुँच कर भी, अभी तक परिक्षण और द्वार छेकाई की रश्म का इंतजार कर रही थी। कोई नहीं था जो उसका हालचाल भी पूछे या जाने कि उसे किसी चीज की जरूरत तो नहीं ......... !

अबला नहीं

अबला नहीं
प्रबला है वह
देखो कैसे पीट-पीटकर
चट्टानों को तोड़ रही।
फौलादी इरादे हैं
पत्थर को पीटकर
पालती है पेट।
ठक-ठक की आवाज ही संगीत बन
सुलाती है गोद में प्यारी बिटया।
दूध की धार
और पसीने की मार
एकसाथ 
जिम्मेदारियों का निर्वहन
गजब का देखो संतुलन।
लगन और रवानी से
दरक कर पत्थर कठोर भी
मातृत्व के अनुशासन की चोट से
लेता है मनचाहा आकार।
कर्म के संतोष की आभा से अनुप्राणित
यंत्रवत सहजता से सृजन
गृहस्थी के सारे काम कर सहज
जब तुम मुस्काती हो
सृष्टि की धुरी सबल बन जाती हो।
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भूख

भूख नहीं एक बीमारी है
जो सोच पर भी भारी है।
पेट की भूख तो बुझ सकती है
मन की भूख मगर कहाँ मिटती है!
भीख मांग कर काम चलाते
हाथ पैर कभी न डुलाते।
इनकी भूख तो मिट जाती है
चंद सिक्कों पर टल जाती है।
पर हवश जो देखो उनकी
भूख कहाँ बुझती इनकी।
ठूंस-ठूंस कर करें इकट्ठा
हक मार कर करते ठट्ठा।
मंदिर, मस्जिद के राह पर
मेट्रो या स्टेशन के बाहर
करुणा के धागे तार-तार
कूड़ेदान पर जुटते बेजार।
हाथ तभी तो फैलता है
भरोसा चुक जब जाता है।
एक रोटी मांगता है
दूसरा वोट ले जाता है।
कोई घपले कर डकारता है
कोई भूखे पेट सो जाता है।
समस्या वहीं की वहीं
समाधान कुछ भी नहीं।

सहारा

एक गट्ठर सिर पे डाल
घूम रहा गली-गली
गले फाड़ आवाजें करता
मोलभाव और हुज्जत हवाले सहता
दो वक्त रोटी की खातिर
कितने सारे पापड़ बेलता।
खड़ा दिवाकर ऊपर
गुस्से में होकर लाल
हालत और भी करता बदहाल
पसीने से हुआ बुरा हाल।
भेजो अब तो एक टुकड़ा बादल का
मिले तो कहीं एक कोना छाँह का
मिले सहारा उसको
जो बने सहारा खुद का
वो जो दीन-हीन
दुखी और दमित हैं।
निराश नहीं होना खुद से कभी
रुक न जाना कभी।
फेरीवाले का प्रण देखो
अभी इधर, कभी किधर
यात्रा है निरंतर।
जो दुत्कार दिया किसी ने
तो कभी किसी ने प्यार दिया
उम्मीद का दिया ले कर
आशा की लौ को कभी 
मद्धम न होने दिया
क्योंकि इस दुनियाँ में
जो हार गया स्व से
उसका कौन सहारा है!

उड़ान

लगाकर पंख अरमानों के
भर तू ऊँची उड़ान
बन अभय न डर
लहरा के आसमान में
जी भर के ले तू
लय भरी उड़ान
गुणों की खान तू
ले रस की उड़ान
छेड़ सुरों की तान
ले कला की उड़ान।
न आयेंगे दिन ये बारबार
ले सम्हाल जो है आज
कल के लिए न छोड़ देना आज
कल के लिए न रोना कभी
खुल के जी ले
कर ले तू मन की सभी
मगर न छोड़ना कभी
सपनों की उड़ान

लेनदेन कुछ परिहास

इस दुनियाँ में व्यापार ही व्यवहार है। लेनदेन का ही कारोबार है। उपहार की प्रत्याशा में उपहार दिए जाते हैं। कार्यक्रम समाप्त होते न होते लिफाफों के वजन तौले जाते हैं। अगर कम पड़े तो मेजबान की खीझ अगले दिन .....। दूसरी तरफ शगुन के हिसाब से प्लेट को भी खूब तौल कर, उलट पलट कर देख लिया जाता है। अब इन दो कारोबारियों के बीच रिश्ते-नाते त्राहिमाम न करें तो क्या करें। शुक्र है, दुनियाँ फिर भी चल ही रही है।
नोट लेकर वोट दिए जाते हैं और वोट खरीद कर पूरे पांच साल तक उसकी कीमत वसूल की जाते है। कुसूर किसका ? सभी फन्ने खाँ बने बैठे है ! ‘को बड छोट कहत अपराधू’ । बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय ! अपना-अपना भोग है, भाई।
औलाद नालायक ! काम के न काज के दुश्मन अनाज के ! संतानों को पता है, अपना बुढ़ापा निरापद करने के ये चोंचले हैं ! ‘प्यार लुटाओ तो जानवर भी दुम हिलाते नहीं थकते। अपनी गलती की सजा आप भुगतो। हमें क्यों भगत सिंह बनाने पर तुले हो निखट्टुओ, खुद तो सुभाषचंद्र बोस बन कर दिखाओ। स्वयं तो सी.वी. रामन बने नहीं हमें इंजीनियर बनाने के लिए सुबह से चिल्लाते फिरते हैं।’
आभासी दुनियाँ भी कोई अछूती नहीं ! यहाँ भी तो लाइक के बदले लाइक और टिपण्णी के बदले ही टिप्पणी मिलती है ! कोई नहीं पूछता, आपने कितना लिखा और क्या लिखा ! फिर भी प्रकाशन से तो बेहतर है, 10-20 लोग तो पढ़ ही लेते हैं, अगर रचना कम शब्दों की हो तो ! वर्ना, पूरी की पूरी उपन्यास 'बरेली की बर्फी' की तरह पहले पाठक का इंतजार करती हुई, प्लेटफार्म के बुकस्टाल पर धूल ही फांकती न रह जाए !

आहुति


मिल जाए जो अचानक
मुड़कर कहाँ देखता है!
अधिकारों की बात चले तो
छीन कर ले लेता है।
अपनी मेहनत के बलबूते
संसार नया रचता है।
जीवन के इस महायज्ञ में
कर तिरोहित कुंठाओं को
आलस और तंद्रा की हवि देकर
ज्ञान उपार्जन वह करता है
पड़ गई अगर जरूरत
राष्ट्रहित सर्वोपरि जान
संकोच और सुविधाओं को तज
कर देता है सर्वस्व बलिदान।
तप-त्याग है जिसका सम्बल
धीरज और धरम का थामे परचम।
तरुणाई वही सबल
जिसके होते सपने अपने।
आन पड़े जब जरूरत
दे आहुति स्व की हँसकर।
मर्यादा की रक्षा में जो दे प्राण
पुरुषोत्तम वही महान।

आत्मा की विजय

अचानक सीने में भयानक जलन और पेट में मरोड़ शुरू हो गया। कुछ भी समझ में न आया। गिरने-गिरने को
हो आया। बड़ी मुश्किल से मोटरसाइकिल को सड़क के किनारे किया। स्टैंड भी नहीं गिरा पाया। लुढ़क जाने
दिया। घुटनों के बल जमीन पर ही बैठ गया।

. ...... .. उल्टी के अंतिम दौर के बाद मरोड़ जब बर्दास्त के लायक हो गई, वह सोचने लगा कि ऐसा क्या हो
गया था उसके साथ ! अगर कोई बीमारी थी तो अब से पहले तो कभी पता भी नहीं चला!

तभी थोड़ी ही देर पहले देखी हुई दुर्घटना के बाद वाली घटना उसके जेहन में एक चलचित्र की तरह घूम गए। रात
के अँधेरे में अपनी ही मोटरसाइकिल की रौशनी में उसने एक दुसरे मोटरसाइकिल सवार को गिरा पड़ा देखा था।
उसने देखा था   .........

सड़क किनारे झुरमुटों के पास औंधे मुँह लुढ़का एक खून से लथपथ युवक शायद अभी भी जिंदा था। सिर से खून
बह रहा था। पास ही उसका थैला पड़ा था मोटरसाइकिल भी कुछ ही दूरी पर गिरी हुई दीख रही थी। बेहद भयानक
दृश्य था। किसी तरह हिम्मत जुटाकर राजेश ने उसके पॉकेट तलाशे शायद कोई पहचान मिल जाये ! .........  मिला
भी ! उसने थैले को भी न जाने क्यों देख लिया ! ‘......... लगता है, आज ही पगार मिली थी, पूरे पचास हजार नकद
एक लिफाफे में, इसके अलावे बटुए में भी अच्छी खासी राशि और कार्ड, दो महगे मोबाइल, सोने की अंगूठी और
भी कुछ सामान।’ ......... जाग गया शैतान और सारी मानवता भूल वह थैला और बटुआ संभाल, इससे पहले कि
कोई और राहगीर आ धमकता, वह वहाँ से निकल पड़ा।

परन्तु उसकी आत्मा को शायद यह बर्दाश्त नहीं हुआ। .........  किसी तरह वह उठा, मोटरसाइकिल सीधी की और
वापिस मुड़ गया उसी रास्ते पर। आत्मा ने शैतान पर विजय पा ली थी।

विक्रमी संवत 2075

नववर्ष - विक्रमी संवत 2075

नव तरु पल्लव
मधुर आम्र मंजरी
गदरा गए पलाश
बदल गए कलेवर
गुलमोहर मनोहर झूमे
मादक लगे अमलतास
धरती का श्रृंगार नया
धवल हो गया चंद्र रवि
नवरात्री का आरम्भ है
नववर्ष का प्रारम्भ है
खुशियों का अम्बार हो
नूतन  उत्साह हो
दूर हों कलुषित विचार
मृदुल हों सवर्त्र उद्गार
आनंद अमृत रसधार हो
नव संवत्सर
विक्रमी संवत 2075

अनुपम श्रीगणेश हो

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...