दोहा एकादसी
कौन यहाँ अब पूछता, सुनकर करुण पुकार।
मानवता है चुक गई, अजब हुआ संसार।।१
मानवता है चुक गई, अजब हुआ संसार।।१
मानवता के नाम पर, ऊँची बनी दुकान।
सच को झूठ बना रहे, फीके हैं पकवान।।२
सच को झूठ बना रहे, फीके हैं पकवान।।२
दया, कृपा और करुणा, बनी किताबी बात।
पर पीड़ा में ढूंढते, अब तो शह औ मात।।३
पर पीड़ा में ढूंढते, अब तो शह औ मात।।३
किसको फुर्सत है यहाँ, मिलने की हर रोज।
पर्व-त्योहार पर नहीं, ले पाते अब खोज।। ४
पर्व-त्योहार पर नहीं, ले पाते अब खोज।। ४
पक्के बने मकान ज्यों, मन भी हुआ कठोर।
हर तरफ है मचा हुआ, खींचतान पुरजोर।।५
हर तरफ है मचा हुआ, खींचतान पुरजोर।।५
कुटिल है देखो कितनी, उनकी सारी चाल।
बनता काम बिगाड़ के, खुश हो कूदें डाल।।६
बनता काम बिगाड़ के, खुश हो कूदें डाल।।६
बेटे की ही चाह में, कन्या देत उजाड़।
निर्धन घर ममता मिले, बिटिया हुई पहाड़।।७
निर्धन घर ममता मिले, बिटिया हुई पहाड़।।७
मात-पिता को त्याग कर, खुश हैं श्रवण कुमार।
नीर नहीं जब नयन में, किसे कहें परिवार।।८
नीर नहीं जब नयन में, किसे कहें परिवार।।८
वाणी मधुर कहाँ मिले, बहुत बुरा है हाल।
निर्मम कड़वे बोल हैं, नोचें अपनी खाल।।९
निर्मम कड़वे बोल हैं, नोचें अपनी खाल।।९
बातें बनकर रह गईं, दिखे कहाँ इंसान।
बीत अनेक वर्ष गये, मिले न साधु सुजान।।१०
बीत अनेक वर्ष गये, मिले न साधु सुजान।।१०
बीच सड़क चोटिल हुआ, पड़ा रहा इंसान।
खींच सेल्फी चल दिये, कितने हैं नादान।।११
खींच सेल्फी चल दिये, कितने हैं नादान।।११