आत्मनिष्ठ

शर्माजी, वर्माजी से फोन पर बातें कर रहे थे।

"आओ यार बहुत दिन हो गए मिले हुए।" ..... तभी उनका कुत्ता आ जाता है । "टॉमी, अभी जाओ उधर, देख नहीं रहे हो, अंकल से बात कर रहा हूँ। ....... ये टॉमी भी ना, बस पूछो मत, अपने मे ही उलझाए रखता है । कभी घुमाने ले जाओ कभी सहलाओ ! बच्चों की तरह नखड़े करता रहता है ।" पत्नी को पुकारते हैं, "अरे भई, दो इसको बिस्किट-विस्किट ।" हाँ वर्मा, तो मैं क्या कह रहा था, आओ ना कभी । टॉमी से मिलवाता हूँ । बहुत मिलनसार है । बिटिया ले आई थी स्टेट्स जाने से पहले । वह तो इसके बिना एक पल भी नहीं रह पाती थी । हमारा भी इसी के साथ टाइम पास हो जाता है । वो भाईसाब बाहर के आदमी को देखकर जो उछलता है ! ............. आओ ना, फिर मिल बैठकर बात करते हैं । .......... अरे भाई, मेरा क्या, पैमवे का काम तो चल ही रहा था, आजकल एक वेटलॉस हर्बल प्रॉडक्ट का भी काम शुरू कर दिया है। "

वर्माजी ने फोन कब काटा, शर्माजी को पता भी नहीं चला।

दूसरों की भावनाओं को समझने की फुर्सत भी किसे है!

https://youtu.be/CA1QzvNo71M

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बेदिल दिल्ली

धूल, धुँए और धुंध में लिपटी
एक शहर दिल्ली है।
हर पल की आपाधापी है
बिना बात की मारामारी है।
फितरत नहीं हद में रहना
हर तरफ कोलाहल है।
वाहनों की रेंगती कतार है
पर्वताकार कूड़ों के अंबार हैं।
कभी कंधे टकराने को लेकर
तो कभी हार्न पर अकड़ जाती है।
छोटी-छोटी बात पर
असीम हाहाकार है।
कितना नाज था कभी
दिल वालों की दिल्ली पर!
आज दिल्ली की बेदिली
हर पल जलाती है।
दिल्ली वालों मदद मत माँगना
चलती कार में अस्मत का व्यापार है।
बीच सड़क पर कूड़ा डाल
घर अपने चमकाते रहना।
माता-पिता को छोड़ निरूपाय
पहाड़ों की सैर को जाना।
भरोसा किसी पर मत करना
अपनों का हिसाब बहुत बुरा है।

वतन_के_लिए

नमन  तुम्हें  देश  के  वीरों, 
                    ऋणी  तुम्हारा  देश  है।
मिट गये तुम देश की खातिर,
                    आज का यह संदेश है।

माँ की गोदी कितनी उजड़ी,
                    सूनी कितनी माँग हुई।
बहन देखती रह गईं राह,
                    गली गाँव की सून हुई।

आते जाते पूछें राही,
              किस घर का वह वासी था।
पत्थर एक लिखा सरहद पर,
                  वह बस भारतवासी था। ----------

देकर हमको आजादी वह,
                     देखो हो गुमनाम रहा।
अपना फर्ज निभाकर वह तो,
                  बनकर सदा अनाम रहा।

मातृभूमि पर करे निछावर,
                     नसीब नहीं सभी पाते।
देशहित में जी लें जो यहाँ,
                  कम नहीं कर्तव्य निभाते। ---------

साफ-सफाई और सुरक्षा,
                आचरण सही हो जिसका।
कहाँ महत्व कम हुआ उसका,
             बचा विरल गुण यह किसका।

आज तिरंगा बोल रहा है,
                अब लेकर आगे जाओ।
कठिन तपस्या का यह फल है,
                समुचित है मोल चुकाओ। ---------

अपनी हिंदी

अपनी हिंदी

अनुपम अपनी अभिलाषा
गूढ़ बहुत संघर्षों की गाथा
भावों की धारा अविरल है, अपनी यह हिंदी भाषा।

विविधता के कितने रंग सजाये
हर बोली का यह मान बढ़ाये
सरस और सरल कितनी है, अपनी यह हिंदी भाषा।

जन-मन की अभिव्यक्ति हिंदी
देश की बहुल-संस्कृति है हिंदी
मेल जोल की गंगा जमुनी है, अपनी यह हिंदी भाषा।

सदियों की दासता के विरुद्ध
जन-गण का जब छिड़ा महायुद्ध
मुक्ति का मार्ग बन गई है, अपनी यह हिंदी भाषा।

तुलसी की चौपाई, मीरा के पद
दोहे कबीर के या रसखान हों
प्रेम और सद्भाव अनुपूरित है, अपनी यह हिंदी भाषा।

अलंकार के, श्रृंगार के अद्भुत
ओज सोज से भरी हुई है
प्रवाहमयी और प्रांजल है, अपनी यह हिंदी भाषा।

दिवस चौदह माह सितंबर
सन् उन्नीस सौ उन्चास
घोषित हुई जब राजभाषा है, अपनी यह हिंदी भाषा।

हिंदी चंदन, हिंदी वंदन
हिंदी नवयुग का है अभिनंदन
नमन और मनन दिल से है, अपनी यह हिंदी भाषा।

लघुकथा - यम सा नियम

सेठ जमनालाल भोजन कर रहे हैं । आमतौर पर घर में सब से पहले भोजन वही करते हैं। घर वालों ने उन्हें इतना सम्मान दे रखा है कि दोपहर का या रात्रि का भोजन हो, शुरुआत उनसे ही होती है। आखिर घर के सबसे बुजुर्ग जो ठहरे। चार पुत्रों, बहुओं और पोते-पोतियों से भरा यह घर पूरे मोहल्ले में एक आदर्श परिवार है, आज के समय में। 

एकदम सधी हुई और नियमित दिनचर्या है सेठ जी की। गिनती की तीन चपातियाँ, कम तेल-मसालों में बनी हुई सब्जी और साथ में थोड़ा सा दूध। रात में सामान्यतः यही कुछ उनका आहार है। दिल की बीमारी के कारण परहेज से ही रहते हैं। घर वालों को भी आदत सी पड़ गई है। सबकुछ नियमानुसार चल रहा है। यांत्रिक सी जीवनचर्या कभी-कभी उबाऊ भी लगती है। बहू ने खाना दिया, उन्होंने सिर झुकाकर खाना शुरु किया और कमरा खाली। खाना ख़त्म होते न होते उनकी दवाइयाँ हाजिर। कोई मान-मनुहार नहीं, कमी-बेसी की कोई गुंजाईश नहीं। 

परंतु आज सब्जी कुछ खास लग रही है। उनको इच्छा हो रही है कि एक चपाती और ले लें। ‘काश कि आज बहू ही पूछ ले।’ पत्नी, गठिया के कारण कम ही इधर-उधर करती है, शायद आ जाए और पूछ बैठे, पुराने दिनों की तरह। जब, ‘हो गया’ कहने के बाद भी वह चपाती लेकर जरूर आती थी और उनके हाथ धोने तक खड़ी रहती थी। और नहीं तो उनके प्यारे पोते-पोतियों में से ही कोई आ निकले .......। सोचने लगे, ‘बोल दूंगा, लेता तो नहीं, मगर तुम्हारा आग्रह है तो मानना ही पड़ेगा’। 

जैसे ही उन्होंने सिर उठाया, अपनी प्यारी पोती अंशु को सामने पाया। एक स्मित सी मुस्कान तिर आई। पोती ने मुट्ठी खोल कर दाहिनी हथेली को सामने कर दिया जिसमें दवाएँ हैं। कुछ भी नहीं कहा, सूनी हो गई आँखों से पोती के मासूम चेहरे को निहारते हुए अपनी बाईं हाथ से दवाइयाँ उठा लीं।

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...