अंतिम प्रिया

अंतिम प्रिया

कितना करती हो मुझसे तुम प्यार प्रिये
यह जीवन है तुम्हारा ही उपहार प्रिये।
जन्म के साथ ही तुमसे जुड़ गया था नाता
जो भी आया इस जग में एक दिन है जाता।
बचपन खेल तमाशा, सपने जवानी के
घर-परिवार, डगमग पाँव बुढ़ापे के।
मोह-माया, झूठे सब जग के रिश्ते नाते
एक दिन तो पंछी सबको तजकर जाते।
प्रेम सरिता नयनों में बसाये फिरते
बनकर जोगी हर घाट में धूनी रमाते।
मनमोहक मनभावन कल्पना की मूरत
हरपल छाये आँखों में बस तेरी सूरत।
कितनी शीतल, निर्मल, कोमल, मधुर सी
अविरल प्रेरणा, उन्मुक्त चेतना पंख सी।
कटु सच है, पर कहाँ होता सबको पता
आने से पहले प्रिये बस इतना देना जता।
गठरी बांध सारे मायाजाल कर तिरोहित
तेरे आलिंगन को लेकर पुष्प संयोजित।
शपथ है विलम्ब नहीं बिलकुल करूंगा
प्रिये, चिर काल के लिये तेरा वरण करूंगा।

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