रंगीन हुआ वीराना

विषय - चित्रलेखन
विधा - गीत

बड़े प्रेम से लिखकर पाती, तुमने  मुझे  बुलाया
इस निर्जन प्रदेश को किसने, रंगों  से  भरमाया …

धीरे-धीरे साँझ ढली  है,  चहक  रही  है  क्यारी
सपनों की बारात सजी है, महक उठी फुलवारी।
उमंगों की झंकार गुंजित,  प्रीत  छुपाकर  लाया …

धरनी अंबर के मिलने का,  शुभ  अवसर  लगता  है
बिना कहे कुछ भी सबकुछ तो, सुना हुआ लगता है।
दूर-दूर तक दिखे  नहीं  है,  किसी  जीव  की  छाया …

हर तरफ हैं रश्मियाँ पसरी, करतीं ज्यों अभिवादन
बंद आँखों से कर जरा तू,  तृप्ति  भरा  आस्वादन।
दुनिया की नजरों से बचकर, पुष्प  छुपाकर  लाया …

कितना सूना सा था पहले, धरती  का  यह  कोना
तुमने आकर बसा  दिया  है,  करके  जादू  टोना।
रंगों  से  आबाद  हो  गया,   सुंदर  कितनी  माया …

मेट्रो संस्मरण

⭐ संस्मरण ⭐

लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन वैशाली की ओर जाती हुई मेट्रो प्लेटफार्म पर लगती है बहुत से अन्य यात्रियों के साथ एक प्रौढ़ व्यक्ति का भी पदार्पण होता है। काले सूट में सज्जित व्यक्ति वकील भी हो सकता था और नहीं भी।

हाँ, इसलिए कि उन्होंने आते ही बुजुर्गों के लिये आरक्षित सीट पर कब्जा जमाये गैर अधिकृत युवा युगल में से युवक को उठने का इशारा कर दिया। अब चूँकि वह युवती के साथ बैठा था तो सोने का भी नाटक नहीं कर सकता था! इस तरह खिलखिलाते जोड़े को अलग करने की हिम्मत मैं नहीं कर सकता था, अतः यमुना बैंक स्टेशन से ही टुकुर-टुकुर देखता हुआ, कहानियाँ गढ़ रहा था।

नहीं, इसलिये संभव है कि सीट मिलते ही अपने चेहरे पर एक दैन्य का भाव ओढ़ लिया, जैसे कि युगल को अलग कर देने का अपराधबोध तिर आया हो! अपराधबोध से ग्रसित होना किसी वकील को भला शोभा देता है! युवक से आज हुई मूसलाधार बारिश से आई आफत के बारे में बातें करने लगा, इस बात से बिल्कुल बेपरवाह कि युवक की कितनी दिलचस्पी हो सकती थी उसकी दैन्य कथा में।

"देख रहे हैं मेरे कपड़े कैसे हो गये बारिश के कारण।" वैसे कपड़े तो उनके अच्छे भले थे, पता नहीं क्या दिखाना था!
- "हमारे मुहल्ले में तो आज नरक हो रखा है। लोग घरों की खिड़कियों से लटक कर निकल रहे थे। सड़क पर टखनों तक पानी था। कोई साधन नहीं, कोई रिक्शा नहीं, कुछ भी नहीं।"
- हाँ आज मौसम थोड़ा खराब तो है।" लड़के ने शिष्टाचारवश कहा।

कुछ ही दिनों पहले किसी का कहा याद आ गया। 'भाई साहब अब जाड़े में कहाँ बारिश होती है जी! पहले, (हमारे जमाने में) भाई साहब, (होंठ गोल कर बोलने का दिल्ली का पारंपरिक अंदाज) एक दो बार तो जरूर से वो बारिश होती थी, वो बारिश होती थी कि भाई साहब, बस पूछो ही मत…।'

दो स्टेशन बाद मैं उतरकर मैं चल पड़ता हूँ, अपने दफ्तर की ओर। सोचता जा रहा था, 'शायद पर्यावरण कुछ सुधरे एक दो दिनों के लिए'।

लघुकथा - लोकतंत्र के नाम पर

❄ लघुकथा - लोकतंत्र के नाम पर ❄

सुबह-सुबह ही भागता हुआ उस तथाकथित नामी गिरामी स्कूल में गुड़िया के दाखिले का पता करने गया था, जहाँ चार दिन पहले ही चार साल की गुड़िया, पत्नी तथा स्वयं का साक्षात्कार हुआ था। विद्यालय के सूचिपटल पर नाम तो था पर जन्म-प्रमाणपत्र सहित अन्य दस्तावेज व पैसे जमा करने के लिए दो ही दिन का समय दिया गया था, जिसके बढ़ने की कोई सम्भावना नहीं थी।

स्कूल से सीधा भागता हुआ नगरनिगम के दफ्तर में पहुँचा। देर तक प्रतीक्षा करने के बाद बाबू से मुलाकात हुई तो हलफनामे सहित कई अन्य औपचारिकताओं की फेहरिस्त थमा दी गई। उसकी असली चिंता तो समय को लेकर थी।  ख़ैर, कुछ सौ में द्रुत सेवा की बात बन गई। ......... शाम को बुलाया था।

जल्दबाजी में यू-टर्न पर लालबत्ती का ध्यान नहीं रख पाया। बहुत से अन्य लोगों की तरह वह भी मुड़ गया। परन्तु उसकी बदकिस्मती ........ ट्रैफिक सिपाही उसे रुकने का इशारा कर रहा था। उसके पास न तो समय था, न संसाधन ! जोखिम मोल ले ली। मोटरसाइकिल को तेजी से दाहिनी ओर से भगाने के चक्कर में सड़क पर उभर आये गड्ढे के कारण संतुलन खोकर विभाजक की रेलिंग से टकरा गया। हेलमेट तो गड्ढे के हिचकोले से ही उड़कर उस पार जा गिरा। ........ जख्म कनपटी पर लगा था  ....... ढेरों तमाशबीन ......... ! जितने मुँह, उतनी बातें !

देश गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियों में डूबा हुआ है ! संविधान के किस पृष्ठ पर लिखा हुआ है कि  सारी  गलती लोगों की ही होगी, पालकों की गलतियों का कोई हिसाब ही नहीं .........  !

एक समसामयिक हास्य-व्यंग्य

एक समसामयिक हास्य-व्यंग्य

होठों पर है मँहगी लाली
मुख से निकले सस्ती गाली।
किसी बात पर शर्म नहीं आती है
बेशर्म अदा बहुत अब भाती है।

पहन लिया पजामा ढीला
बनाकर प्लाजो रंगीला।
बुढ़िया जब ब्यूटीपार्लर से आती है
बुड्ढों की छाती छलनी कर जाती है।

देखो कितनी मस्त है
मोबाइल पर व्यस्त है।
बेटा-बेटी बहुत सुस्त हैं
माँ-बाप इसलिए चुस्त हैं।

तीर समुंदर नैवेद्य ले रहे
बाला संग धूप सेंक रहे।
कथनी-करनी होती सम नहीं
जब जैसी, तब तैसी, हर कहीं।

लगता है जैसे अँधेर है
कहते हैं पीढ़ी का फेर है।
देखो कितने दिन चलती है
एक दिन तो सबकी ढलती है।

संस्मरण - जगह मकानों में नहीं होते

जगह मकानों में नहीं होते

संस्मरण की जब भी बात चलती है, समूह के अधिकांश मित्रों की तरह ही, मेरी भी स्मृति में बचपन के अविस्मरणीय पल सजीव हो उठते हैं।

मेरे घर के पास ही हमारी पाठशाला थी। उसी पाठशाला में मुझसे दो दर्जा नीचे दो भाई साथ ही पढ़ते थे। उनका घर तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर था। उनसे मेरी निकटता की वजह यह भी थी कि उनकी दादी मेरी एक चाची की बुआ थी। इस नाते किसी भी खास तरह के आयोजनों में एक दूसरे के घरों में हम सभी का आना जाना लगा रहता था। दोनों भाइयों में बड़ा वाला मुझसे थोड़ा बड़ा और छोटा वाला मुझसे थोड़ा छोटा था। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि हम तीन भाई ही हों।

गर्मी के दिनों में शाम को जब दोनों भाई घरों को लौटते तो कई बार मैं भी उनके साथ ही हो लेता। दोपहर के लंच का उस समय रिवाज नहीं था। वे सुबह ही भोजन कर के आते थे और फिर शाम को लौटकर सुबह का ही बचा-खुचा खाकर तृप्त हो जाते थे। उनके घर की माली हालत भी ठीक नहीं थी। हालाँकि यह कोई वजह नहीं थी उनके लंच नहीं लाने की। उस वक्त का संभवतः यही रिवाज था।

उनकी आर्थिक स्थिति चाहे जो भी रही हो, मुझे उस पूरे परिवार में जो संभ्रांत संस्कार दिखे, वह बड़े-बड़े रईसों और धनाढ्यों में भी नहीं मिलता। ऐसा कोई कोई दिन नहीं रहा जब मैं बिना भोजन किये उस गरीब के घर से निकला होऊँ। उसके घर खाये कुरथी (कुल्थी) की दाल और भात का स्वाद आज भी ढूँढता रहता हूँ। इस संस्मरण को लिपिबद्ध करने का मेरा प्रयत्न भी उस नायाब स्वाद की तलाश ही है। इस दाल को सूखे आम की खटाई के साथ बनाया जाता था। मिर्च और आम के सम्मिश्रण का ताज़िंदगी आद आने वाला एक अनोखा स्वाद! कुल्थी भी क्या चीज है, करीब-करीब पत्थर की तरह ही सख्त एक दलहन जो पथरीली जमीन पर उगाया जा सकता है। आजकल पथरी के इलाज या कोलेस्ट्रॉल घटाने के उपाय के रूप में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कहते हैं दशरथ माँझी ने इसी दाल के पानी का इस्तेमाल पहाड़ तोड़ने के लिए भी किया था।

एक बात और भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि उस स्वाद को मैंने कभी खाते समय शायद नहीं महसूस किया होगा! पहली बार उस स्वाद का एहसास वर्षों बाद तब हुआ था, जब एक शहर में रहने वाले रिश्तेदार ने एक शाम का आश्रय तो दिया था पर भोजन के लिये निकट के रेस्टोरेंट का पता बता दिया था। सच ही कहा गया है, जगह घर में नहीं होता, दिल में होता है!

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...