मिल जाए जो अचानक
मुड़कर कहाँ देखता है!
अधिकारों की बात चले तो
छीन कर ले लेता है।
अपनी मेहनत के बलबूते
संसार नया रचता है।
जीवन के इस महायज्ञ में
कर तिरोहित कुंठाओं को
आलस और तंद्रा की हवि देकर
ज्ञान उपार्जन वह करता है
पड़ गई अगर जरूरत
राष्ट्रहित सर्वोपरि जान
संकोच और सुविधाओं को तज
कर देता है सर्वस्व बलिदान।
तप-त्याग है जिसका सम्बल
धीरज और धरम का थामे परचम।
तरुणाई वही सबल
जिसके होते सपने अपने।
आन पड़े जब जरूरत
दे आहुति स्व की हँसकर।
मर्यादा की रक्षा में जो दे प्राण
पुरुषोत्तम वही महान।
मुड़कर कहाँ देखता है!
अधिकारों की बात चले तो
छीन कर ले लेता है।
अपनी मेहनत के बलबूते
संसार नया रचता है।
जीवन के इस महायज्ञ में
कर तिरोहित कुंठाओं को
आलस और तंद्रा की हवि देकर
ज्ञान उपार्जन वह करता है
पड़ गई अगर जरूरत
राष्ट्रहित सर्वोपरि जान
संकोच और सुविधाओं को तज
कर देता है सर्वस्व बलिदान।
तप-त्याग है जिसका सम्बल
धीरज और धरम का थामे परचम।
तरुणाई वही सबल
जिसके होते सपने अपने।
आन पड़े जब जरूरत
दे आहुति स्व की हँसकर।
मर्यादा की रक्षा में जो दे प्राण
पुरुषोत्तम वही महान।