छलावा

कहाँ कुछ बदला है!
आज भी युवा चिंतित है
प्रेमपत्र नहीं लिखता है
नौकरियों की दौड़ लगाता है।
युवतियाँ सशंकित हैं
जल्दी घर लौटने के दबाव झेलती
घर और बाहर के काम निबटाती हैं।
हर बार बदलाव का बवंडर उठता है
और फुस्स हो जाता है
जड़ जाता है दो-चार गालियाँ!
पिटे हुए गालों को सहलाते हुए
याद करता है कंधों पर पड़े बोझ को
और लगाने लगता है फिर से दौड़
लगाने लगता है जुगाड़
शायद इसबार लग जाए!
भूख, गरीबी और असुरक्षा के बीच
कितना संयम दिखलाता है युवा!
समय छलावे की तरह आता है
गुजर जाता है, कुछ और जख्म देकर
और वह भागता रहता है
हाँफता हुआ दौड़ता रहता है।

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