सूचना संचार क्रांति

बिट-बाइट और अभिकेंद्रित परिपथ का चमत्कार
बदल दिया सबकुछ ऐसा अद्भुत यह आविष्कार।

सूचना सम्पर्क की अब तो बह रही बयार
टेलीफोन समा गये मुट्ठी में होकर बेतार।

बेकार हो रहे हैं देख लो, पुराने सभी तंत्र
स्मार्ट होने लगे हैं छोटे-बड़े घर के सारे यंत्र।

बुक करो, गाड़ी बुलाओ या फिर मंगाओ सामान
ऑनलाइन हो गया सबकुछ, कितना है आसान।

इंटरनेट का फैल गया यह मायावी जाल
अच्छा है कि बुरा, उलझन भरा है काल।

कॉल, विडिओ या चैटिंग में अबाल-वृद्ध मस्त
पल में इधर की उधर तो अफवाहों से भी पस्त।

सूचना और ज्ञान-सुलभ बन गया है संसार
अफवाहों की भी लेकिन भरपूर है पैदावार।

सूक्ष्म तरंगों से प्रवाहित अब विचार होने लगे हैं
सिमट रही है दुनिया, लोग करीब आने लगे हैं।


जमाना कितना बदल गया है

जमाना कितना बदल गया है

मां ने कहा,  पढ़ लिया करो
बेटा कूदने को छत पर चला गया।
बाप ने कहा, वक्त पर घर आ जाया करो
बेटी घर छोड़ कर चली गई।
ना जाने, क्यों! मगर ऐसा ही हो गया है
वक्त को मानों पंख लग गया है।
कल ही तो बेटा छोड़ कर गया था
आज ही बाप का कूल्हा खिसक गया है।
कल ही पाँव फिसले थे उनके
आज ही कूड़ेदान पर फेंककर चले गये हैं।

समय

❆ समय ❆

रे समय, तू भागता कहाँ है, छोड़कर मुझको इस समर में
ले चल, मुझको भी साथ, मत छोड़ अकेला इस समुंदर में

देखे हैं, कितने ही खेल निराले, इस जगत में जाने-अनजाने
झूठे सारे रिश्ते-नाते, आडम्बर हैं चाल-चलन नये या पुराने।

तू ही कर्ता-धर्ता है, और सच क्या है, एकमात्र तू ही जानता है
कर्म भी उसी का फलता है जग में, जो समय को पहचानता है।

छोड़ हमें बीच मँझधार में, रण से भागकर कहाँ तू सोता है
बाकी है काम अभी, इसीलिए प्रतिदिन तुम्हारा आना होता है।

देखा नहीं, पेशानी पर अपने, रेखाएं कितनी मैंने खींच रखी हैं
बंजरों में बाग लगाये, अभेद्य चट्टानें कितनी ही दरका रखी हैं।

किंतु अब जी घबराता है, मौसम यहाँ का बदलने लगा है
मजदूर भूख से मरता है, किसान आत्महत्या करने लगा है।

ससुराल

दुल्हन के वेश में सजी, भरी भरकम जोड़े से ढकी वह गाड़ी में अब अकेली रह गई थी। ननद की बेटी, चुनियाँ, जो रास्ते भर उसे चिकोटी काटती आई थी, वह भी, कब की उतर कर भाग गई थी। राजेश, भला घर के पास, इतने लोगों के सामने अपनी पत्नी के पास कैसे बैठ सकता था ! कितनी तौहीनी की बात होती ! ....... ‘वो देखो, शादी के पहले दिन से ही पत्नी से चिपका बैठा है! क्या ज़माना आ गया है ! जरा भी सब्र नहीं होता !’ ………
कुछ औरतें, कुछ बच्चे, बच्चियाँ कभी-कभी उसे घूंघट में से झाँक भी जाते, बिना उसकी कोई मर्जी जाने! मानों वह कोई सामान हो, उसकी मर्जी का क्या ! हाँ, सबको इस बात की तो जरूर उत्सुकता है कि जाने कि सामान क्या-क्या आया है ! सारे घर वाले भी इसी व्यवस्था में लगे हुए हैं कि सामानों को यथाशीघ्र कायदे से रखा जाये ताकि सभी लोग बिना किसी दिक्कत के देख सकें। ......... आखिर इतना सारा सामान मिला भी तो है। पूरे गाँव में आजतक किसी को भी इतना दहेज़ नहीं मिला होगा! पूरा ट्रक भर कर, हर तरह का सामान दिया था उसके पिता ने। शायद तभी ट्रक के उन सामानों की तो पूछ हो रही थी, मगर मुरझाये, बासी फूलों लटके कार में बैठी नई-नवेली दुल्हन, अपने ससुराल के दरवाजे पर पहुँच कर भी, अभी तक परिक्षण और द्वार छेकाई की रश्म का इंतजार कर रही थी। कोई नहीं था जो उसका हालचाल भी पूछे या जाने कि उसे किसी चीज की जरूरत तो नहीं ......... !

अबला नहीं

अबला नहीं
प्रबला है वह
देखो कैसे पीट-पीटकर
चट्टानों को तोड़ रही।
फौलादी इरादे हैं
पत्थर को पीटकर
पालती है पेट।
ठक-ठक की आवाज ही संगीत बन
सुलाती है गोद में प्यारी बिटया।
दूध की धार
और पसीने की मार
एकसाथ 
जिम्मेदारियों का निर्वहन
गजब का देखो संतुलन।
लगन और रवानी से
दरक कर पत्थर कठोर भी
मातृत्व के अनुशासन की चोट से
लेता है मनचाहा आकार।
कर्म के संतोष की आभा से अनुप्राणित
यंत्रवत सहजता से सृजन
गृहस्थी के सारे काम कर सहज
जब तुम मुस्काती हो
सृष्टि की धुरी सबल बन जाती हो।
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भूख

भूख नहीं एक बीमारी है
जो सोच पर भी भारी है।
पेट की भूख तो बुझ सकती है
मन की भूख मगर कहाँ मिटती है!
भीख मांग कर काम चलाते
हाथ पैर कभी न डुलाते।
इनकी भूख तो मिट जाती है
चंद सिक्कों पर टल जाती है।
पर हवश जो देखो उनकी
भूख कहाँ बुझती इनकी।
ठूंस-ठूंस कर करें इकट्ठा
हक मार कर करते ठट्ठा।
मंदिर, मस्जिद के राह पर
मेट्रो या स्टेशन के बाहर
करुणा के धागे तार-तार
कूड़ेदान पर जुटते बेजार।
हाथ तभी तो फैलता है
भरोसा चुक जब जाता है।
एक रोटी मांगता है
दूसरा वोट ले जाता है।
कोई घपले कर डकारता है
कोई भूखे पेट सो जाता है।
समस्या वहीं की वहीं
समाधान कुछ भी नहीं।

सहारा

एक गट्ठर सिर पे डाल
घूम रहा गली-गली
गले फाड़ आवाजें करता
मोलभाव और हुज्जत हवाले सहता
दो वक्त रोटी की खातिर
कितने सारे पापड़ बेलता।
खड़ा दिवाकर ऊपर
गुस्से में होकर लाल
हालत और भी करता बदहाल
पसीने से हुआ बुरा हाल।
भेजो अब तो एक टुकड़ा बादल का
मिले तो कहीं एक कोना छाँह का
मिले सहारा उसको
जो बने सहारा खुद का
वो जो दीन-हीन
दुखी और दमित हैं।
निराश नहीं होना खुद से कभी
रुक न जाना कभी।
फेरीवाले का प्रण देखो
अभी इधर, कभी किधर
यात्रा है निरंतर।
जो दुत्कार दिया किसी ने
तो कभी किसी ने प्यार दिया
उम्मीद का दिया ले कर
आशा की लौ को कभी 
मद्धम न होने दिया
क्योंकि इस दुनियाँ में
जो हार गया स्व से
उसका कौन सहारा है!

उड़ान

लगाकर पंख अरमानों के
भर तू ऊँची उड़ान
बन अभय न डर
लहरा के आसमान में
जी भर के ले तू
लय भरी उड़ान
गुणों की खान तू
ले रस की उड़ान
छेड़ सुरों की तान
ले कला की उड़ान।
न आयेंगे दिन ये बारबार
ले सम्हाल जो है आज
कल के लिए न छोड़ देना आज
कल के लिए न रोना कभी
खुल के जी ले
कर ले तू मन की सभी
मगर न छोड़ना कभी
सपनों की उड़ान

लेनदेन कुछ परिहास

इस दुनियाँ में व्यापार ही व्यवहार है। लेनदेन का ही कारोबार है। उपहार की प्रत्याशा में उपहार दिए जाते हैं। कार्यक्रम समाप्त होते न होते लिफाफों के वजन तौले जाते हैं। अगर कम पड़े तो मेजबान की खीझ अगले दिन .....। दूसरी तरफ शगुन के हिसाब से प्लेट को भी खूब तौल कर, उलट पलट कर देख लिया जाता है। अब इन दो कारोबारियों के बीच रिश्ते-नाते त्राहिमाम न करें तो क्या करें। शुक्र है, दुनियाँ फिर भी चल ही रही है।
नोट लेकर वोट दिए जाते हैं और वोट खरीद कर पूरे पांच साल तक उसकी कीमत वसूल की जाते है। कुसूर किसका ? सभी फन्ने खाँ बने बैठे है ! ‘को बड छोट कहत अपराधू’ । बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय ! अपना-अपना भोग है, भाई।
औलाद नालायक ! काम के न काज के दुश्मन अनाज के ! संतानों को पता है, अपना बुढ़ापा निरापद करने के ये चोंचले हैं ! ‘प्यार लुटाओ तो जानवर भी दुम हिलाते नहीं थकते। अपनी गलती की सजा आप भुगतो। हमें क्यों भगत सिंह बनाने पर तुले हो निखट्टुओ, खुद तो सुभाषचंद्र बोस बन कर दिखाओ। स्वयं तो सी.वी. रामन बने नहीं हमें इंजीनियर बनाने के लिए सुबह से चिल्लाते फिरते हैं।’
आभासी दुनियाँ भी कोई अछूती नहीं ! यहाँ भी तो लाइक के बदले लाइक और टिपण्णी के बदले ही टिप्पणी मिलती है ! कोई नहीं पूछता, आपने कितना लिखा और क्या लिखा ! फिर भी प्रकाशन से तो बेहतर है, 10-20 लोग तो पढ़ ही लेते हैं, अगर रचना कम शब्दों की हो तो ! वर्ना, पूरी की पूरी उपन्यास 'बरेली की बर्फी' की तरह पहले पाठक का इंतजार करती हुई, प्लेटफार्म के बुकस्टाल पर धूल ही फांकती न रह जाए !

आहुति


मिल जाए जो अचानक
मुड़कर कहाँ देखता है!
अधिकारों की बात चले तो
छीन कर ले लेता है।
अपनी मेहनत के बलबूते
संसार नया रचता है।
जीवन के इस महायज्ञ में
कर तिरोहित कुंठाओं को
आलस और तंद्रा की हवि देकर
ज्ञान उपार्जन वह करता है
पड़ गई अगर जरूरत
राष्ट्रहित सर्वोपरि जान
संकोच और सुविधाओं को तज
कर देता है सर्वस्व बलिदान।
तप-त्याग है जिसका सम्बल
धीरज और धरम का थामे परचम।
तरुणाई वही सबल
जिसके होते सपने अपने।
आन पड़े जब जरूरत
दे आहुति स्व की हँसकर।
मर्यादा की रक्षा में जो दे प्राण
पुरुषोत्तम वही महान।

आत्मा की विजय

अचानक सीने में भयानक जलन और पेट में मरोड़ शुरू हो गया। कुछ भी समझ में न आया। गिरने-गिरने को
हो आया। बड़ी मुश्किल से मोटरसाइकिल को सड़क के किनारे किया। स्टैंड भी नहीं गिरा पाया। लुढ़क जाने
दिया। घुटनों के बल जमीन पर ही बैठ गया।

. ...... .. उल्टी के अंतिम दौर के बाद मरोड़ जब बर्दास्त के लायक हो गई, वह सोचने लगा कि ऐसा क्या हो
गया था उसके साथ ! अगर कोई बीमारी थी तो अब से पहले तो कभी पता भी नहीं चला!

तभी थोड़ी ही देर पहले देखी हुई दुर्घटना के बाद वाली घटना उसके जेहन में एक चलचित्र की तरह घूम गए। रात
के अँधेरे में अपनी ही मोटरसाइकिल की रौशनी में उसने एक दुसरे मोटरसाइकिल सवार को गिरा पड़ा देखा था।
उसने देखा था   .........

सड़क किनारे झुरमुटों के पास औंधे मुँह लुढ़का एक खून से लथपथ युवक शायद अभी भी जिंदा था। सिर से खून
बह रहा था। पास ही उसका थैला पड़ा था मोटरसाइकिल भी कुछ ही दूरी पर गिरी हुई दीख रही थी। बेहद भयानक
दृश्य था। किसी तरह हिम्मत जुटाकर राजेश ने उसके पॉकेट तलाशे शायद कोई पहचान मिल जाये ! .........  मिला
भी ! उसने थैले को भी न जाने क्यों देख लिया ! ‘......... लगता है, आज ही पगार मिली थी, पूरे पचास हजार नकद
एक लिफाफे में, इसके अलावे बटुए में भी अच्छी खासी राशि और कार्ड, दो महगे मोबाइल, सोने की अंगूठी और
भी कुछ सामान।’ ......... जाग गया शैतान और सारी मानवता भूल वह थैला और बटुआ संभाल, इससे पहले कि
कोई और राहगीर आ धमकता, वह वहाँ से निकल पड़ा।

परन्तु उसकी आत्मा को शायद यह बर्दाश्त नहीं हुआ। .........  किसी तरह वह उठा, मोटरसाइकिल सीधी की और
वापिस मुड़ गया उसी रास्ते पर। आत्मा ने शैतान पर विजय पा ली थी।

विक्रमी संवत 2075

नववर्ष - विक्रमी संवत 2075

नव तरु पल्लव
मधुर आम्र मंजरी
गदरा गए पलाश
बदल गए कलेवर
गुलमोहर मनोहर झूमे
मादक लगे अमलतास
धरती का श्रृंगार नया
धवल हो गया चंद्र रवि
नवरात्री का आरम्भ है
नववर्ष का प्रारम्भ है
खुशियों का अम्बार हो
नूतन  उत्साह हो
दूर हों कलुषित विचार
मृदुल हों सवर्त्र उद्गार
आनंद अमृत रसधार हो
नव संवत्सर
विक्रमी संवत 2075

अनुपम श्रीगणेश हो

…इंतजार

…इंतजार

दया और करुणा के प्रतिदान में
देवी बना कर सजा दिया
देखी नहीं दुर्दशा
दासी बना दिया।
जन्म दिया था पुत्र को
पुरुष उसको बना दिया।
कोख का अंधेरा फैलकर
चहारदिवारी में सिमट गया
चांदनी सिकुड़ने लगी
रोशनियों पर पहरा बिठा दिया।
सुरक्षा के नाम पर
मर्तबान बना दिया।
सोन चिरैया हो गई कैद
सोने के पिंजरे में।
अब फड़फड़ाते हैं पंख
और करती हूंँ इंतजार …!
यह इंतजार ही नियति बनकर रह गई
एक अदद औरत की पहचान बन गई
इंतजार …प्रेम का
… प्रकाश का
… मुक्ति का।

हक की बात

हक की बात

जब भी मुक्ति की बात की
परिधानों पर सवाल उठाया।
जब भी आजादी की बात की
उछाल दिया परिवार और तलाक का जुमला।
अपनी मर्जी की जब बात की
उच्छृंखलता का इल्जाम लगा दिया।
अस्मिता की जब गुहार लगाई
उकसावे का आरोप लगाया।
जब-जब बेड़ियाँ तोड़नी चाही
आभूषणों का सवाल उठाया।
रिश्ते-नातों के दम पर
बदनियती का दाग छुपाया।
सम्मान चाहा हमने जब
सामान बना डाला।
सौंदर्य की आकांक्षा को
विज्ञापन में सजाकर
बाजार के हवाले कर डाला।
हमने पुरुषों की बातें कीं
नारी को ही सम्मुख खड़ा कर डाला।
छोड़ क्यों नहीं देते यह जिम्मा
हमें क्या, कब, कितनी और कैसी चाहिए!
नारीत्व हम से है
इसको परिभाषित करने का हक
हमारा है, हमें चाहिए … बस।

नियम से आबद्ध

नियम से आबद्ध

सात रंगों के घोड़ों पर सवार
समुंदर से निकल वह आता है प्रच्छन्न
आनंद की सौगात लिए
उजाले बाँटता है
घास पर पड़ी ओस की बूंदों को
सहेज लेता है
दिन भर अटखेलियाँ करता है बादलों के साथ।
सर्वत्र भर देता है
ऊर्जा और जोश।
प्रफुल्लित हो उठता है
छोटा सा बच्चा
फैलाता है नन्हीं बाहें
कितनी आतुरता दिखलाता है!

कंधे से कंधा मिला कर चलता है
युवा श्रमिक।
बुढ़ापे की मायूसी
उसे रोक लेना चाहती है।
मगर उसे तो जाना ही होगा
नियम से बंधा है वह।
जाएगा तभी तो आएगा
और मिल पाएगा
प्रतीक्षा में रत ओस की बूंदों से
नन्हीं किलकारियों से
युवा उम्मीदों से
और छोड़ जाएगा जर्जर काया
सख्त नियम से आबद्ध।

यात्रा संस्मरण - सुनामी की याद

सन् 2004, दिसंबर महीने की 26 तारीख। चेन्नई, 1996 तक मद्रास नाम से ही जाना जाता था। जब उत्तरी भारत ठंढ में सिकुड़ना शुरू कर देता है, तब दक्षिण में अगर लौटती मानसून की झड़ी न लग जाये तो मौसम इतना खुशनुमा हो जाता है कि भ्रमण के लिए आदर्श समय बन जाता है। यही वह समय है, जब वहाँ आर्द्रता तथा गर्मी भी कम होती है।

उस खास तिथि का जिक्र खुशनुमा होने की वजह से कतई नहीं कर रहा बल्कि इसके साथ बाबस्ता हादसा, जिसकी वजह से वह सुहानी सुबह, इस कदर भयावह हो उठी कि कुछ अंतराल के बाद किसी न किसी कारण से विध्वंशक स्मृतियाँ ताजा हो उठती हैं, रोंगटे खड़े हो जाते हैं, अंतरात्मा सिहर उठती है और सर्वशक्तिमान ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।

हमारे विभाग का मुख्यालय तथा प्रशिक्षण केंद्र चेन्नई में अवस्थित है। मौसम सही होने की अपेक्षा में दिसंबर से मार्च के दौरान ही वहाँ का दौरा हम सभी पसंद किया करते हैं। एक लम्बे प्रशिक्षण के सिलसिले में, शायद डेढ़ महीने का रहा होगा, चेन्नई गया हुआ था। प्रशिक्षण केंद्र पर ही ठहरने की व्यवस्था थी। सप्ताहांत की दो दिनों की छुट्टियों में अपना रूम पार्टनर शुक्रवार की शाम में ही बस से बंगलोर, अब बंगलुरु, चला गया था।

रविवार रात में अपने एक सहकर्मी का जन्मदिवस था। इस सिलसिले रात के डेढ़ बजे तक जमकर पार्टी हुई थी। बेसुरे गाने गए और भोंडे नाच नाचे गए। इनसे भी बढ़कर कुछ यारों ने तो इंतजाम भी कर लिया प्रतीत होता था। कम से कम अतिरिक्त जोश देख कर तो ऐसा ही प्रतीत होता था ! स्वाभाविक था कि सुबह देर से नींद खुली।  कुछ लोगों के साथ मिल कर तय हुआ था कि तड़के उठकर माउन्ट रोड से मरीना बीच तक सुबह की सैर पर चलेंगे। यदाकदा हम ऐसा ही किया भी करते थे। साढ़े छः से कुछ ही पहले जब चाय और अखबार के साथ कैंटीन वाले लड़के ने घंटी दबाई तो अलसाया सा उठकर दरवाजा खोला और ले आया।

जैसे ही कप में डाल कर कुर्सी पर बैठा कि दरवाजे से किट-किट की आवाज आने लगी। ऐसा लगा जैसे पंकज बंगलोर से लौट आया हो। दरवाजा खोला, कहीं कुछ नहीं था, एक भयानक सन्नाटे का एहसास हो रहा था। बंद कर दिया और फिर कुर्सी पर बैठा। इस बार कुर्सी हिलती सी प्रतीत हुई। मैं मन ही मन मुस्कुराया, ‘शायद नींद ठीक से नहीं आई, या फिर लगता है रक्तचाप बढ़ गया है’! अचानक सातवें माले से जयाकोडी मैडम के शेरू के बहुत तेज आवाज में भौंकने की आवाज सुनाई पड़ी। फिर गलियारे से भागते कदमों की आहटें सुनाई पड़ने लगीं। थोड़ी ही देर में माजरा समझ में आ गया था। ...... यह भूकंप का झटका था।

15 मिनट से आधे घंटे के भीतर सभी फिर से एकबार कॉमन रूम में एकत्रित होते हैं। टी.वी.पर अतिरंजित रिपोर्ट देखने के लिए तथा एक दुसरे की खिंचाई करने के लिए। सबसे मजेदार तो यह था कि सभी ने एक दुसरे को छत की ओर भागते हुए देख लिया था। मतलब किसी ने किसी को नहीं देखा था, मगर प्रमाणित करने की होड़ सी लग गई थी। मोबाईल आ चुका था, सबों ने अपने घरों को कुशलक्षेम भेजे और लिए। जिसके पास मोबाइल नहीं भी था, दूसरों का इस्तेमाल किया या रिसेप्शन पर बने पी.सी.ओ. का इस्तेमाल किया।

थोड़ी ही देर में झटका और उत्तेजना ख़त्म हुई और सभी अपनी तैयारियों में जुट गए। नाश्ता साढ़े आठ बजे से और 10 बजे से प्रशिक्षण कक्षा। मेरी चिंता बस अब पंकज को लेकर थी, जो नौ बजे तक आ गया तो उस ओर से भी निश्चिन्त हो गया था। मगर वही यह खबर लेकर भी आया कि बाहर बहुत तबाही हुई है। कितनी, इसका अंदाजा न उसे था, न मुझे, न हमारे सहमर्मियों में से किसी और को ही। जीवन में पहली बार ‘सुनामी’ शब्द सुना, जिसका शाब्दिक अर्थ भी उस दिन से पहले कहाँ पता था ! कुछ तो भाषाई अज्ञान और कुछ स्थानीय संबधों का अभाव या फिर प्रबंधन का चातुर्य, हम कुछ हद तक विध्वंश को लेकर बेखबर ही रहे। शाम को एकबार फिर मरीना जाने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा इसलिए कि कोई भी बस, ऑटो उधर नहीं जा रही थी और विवेकानंद मार्ग पर से ही पुलिस ने हमें पैदल भी मरीना बीच की ओर जाने से रोक दिया। अभी तक भी सिर्फ इतना ही पता लग पाया कि समुद्र का पानी शहर के नालों में से होकर घुस आया था, जिससे गलियों में पानी भर गया था।

वस्तुस्थिति का अंदाजा तो अगली सुबह के अख़बार और लोगों से मुलाकात के बाद लगा। रिक्टर पैमाने पर नौ के आसपास का भूकंप सुमात्रा के पश्चिमी किनारे (इंडोनेशिया) पर भारतीय तथा वर्मा भूगर्भीय प्लेटों के बीच टक्कर के परिणामस्वरूप आया था, जिसका पश्चातवर्ती प्रभाव सुनामी लहरों के रूप में आया। सौ फीट से भी ऊँची सागर की लहरों ने किनारों की मर्यादा को ध्वस्त कर दिया और हिन्दू अखबार के अनुसार 135 लोग तो सिर्फ चेन्नई शहर में ही काल कवलित हो गए। मछलीपट्नम, मायलापुरम, केरल के तटीय हिस्सों . . . . . . . .  . ओफ्फ . . . . . . . . . । एक सौ अट्ठारह के करीब लोग तो शायद मरीना बीच पर ही रेहड़ियाँ लगाने वाले या सुबह की सैर करने वाले थे जो मौत की दौड़ में रेत पर भागते हुए सुनामी नामक दैत्य से हार गए और लौटती लहर के साथ याद बनकर मरीना बीच की चमकती बालुकाराशि पर एक लुढ़कती पुढ़कती लाश बनकर रह गए।

इसप्रकार थी मौत की वह ठंढी सी झुरझुरी, जो हमने अगली सुबह महसूस की। अगर यथानिर्धारित कार्यक्रमानुसार हम समुद्र तट पर होते तो. . . . . . . .  . । ईश्वर की मर्जी के आगे भला किसका जोर चला है, चाहे जिस रूप में जिसे बचा ले या जिसे बुला ले . . . . . . . . ।

ग़ज़ल

.
कैसे भुला दूँ इतिहास की उन बाजियों की बात
किसको सुनाऊँ अंतर्तम की तन्हाइयों की बात ।

यूँ तो मारे फिरते हैं बहुत चाहने वाले  मेरे  भी
कौन करेगा मगर यहाँ मेरी सिसकियों की बात ।

जुर्म में है मुब्तला जब शहर का  कोतवाल  ही
कौन सुनेगा फिर यहाँ उन साजिशों की  बात ।

नजीरें हैं बहुत  हैं  दर-पेश  दीन-ओ-धरम  की
करता है नहीं कोई असल गुनहगारों की बात ।

जी करता है 'सुन' बन जाऊं फिर क्यों ना बच्चा
करता रहूँ भर दिन यूँ  ही  नादानियों  की  बात।

सृष्टि

सृष्टि का अनुपम विधान
हर मौसम आता है आता है
रूप बदल कर
एक नया परिधान लेकर
कभी तपती धरती
स्वेद रसधार बहती
तो कभी सघन सर्दी
ठिठुरते हाथ और पाँव
गहन छटा निराली लेकर
आती बरसात मतवाली
शरद, पतझड़ और बसंत
अनुपम, मनभावन धरा का कलेवर
नियंता का मोहक अनुशासन
लय, गति, अविरल
युग-युगांतर, कालखंड
आबद्ध,  निमग्न, आलिंगन
पुष्पवेणि, तरुकुंज सरिता तीर सजाकर
उद्दीप्त, आह्लाद, मुस्कान मधुर
जीवन का यह चक्र अविरल।

मार्च का शतरंज

दुनियाँ निराली
इसके खेल निराले ।
गज़ब है यह
शतरंज का खेल ।
ना जाने कब शह मिले
और कब हो जाए मात ।
मार्च के महीने में देखो
कैसी तेज चाल !
बनी हुई सड़क को
घिस कर रुखड़ा बनाते हैं
फिर उसपर हल्के से
तारकोल से काम चलाते हैं ।
देख लेंगे बाकी भी
बस बिल यह पास हो जाये ।
अपने-अपने कायदे हैं
अपनी-अपनी चाल ।
साल भर संचिकायें खाती हैं धूल
मगर देखो अब कैसी
चल रही दुलकी चाल !
सारे रुके पड़े बजट का
चंद दिनों में होता बंटाधार।
अवसर बन गया देखो
आपसी प्यार मुहब्बत के इजहार का !
किसी को शिकायत नहीं
किसी की फरियाद नहीं ।
अपना हिस्सा है
अपना लक्ष्य है
अपनी साझेदारी है
सब मिलीभगत का खेल है ।
आज काली है
कल उजला होगा ।
वजीर चूक जाए तो
प्यादा बन वजीर

देखो कैसे इतराये

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...