बोलते दिये
°°°
रूंदी मिट्टी, पानी देकर, वह देती चाक चढ़ाय,
मिट्टी को देकर एक रूप नया मात रही मुस्काय।
चलती चक्की पर बड़े प्रेम से उंगली वह फिराती है,
हौले-हौले मिट्टी में वह एक नवजीवन गढ़ देती है।
परम संतोष भाव से एक-एक भाजन गढ़ती जाती है,
कभी घड़ा, कभी कुल्हड़, तो दिये कभी बनाती है।
रह जाये जो कुछ अक्र-वक्र, सहलाती है, दुलराती है,
देखकर अपनी संततियों को वह फूले नहीं समाती है।
जननी है वह तो सबको एक समान सुपूत बनाती है
ठोंक पीटकर मिट्टी के लोंदे को घड़ा वह बनाती है।
सूखकर छाया में जब आकार स्थिर हो जाता है,
आवे में पककर भाँड फिर पानी को भी धर लेता है।
उम्र की रेखाएँ मुखपर कहानी अपनी लिख जाती हैं,
दुख चाहे जितना हो, सृजन का सुख दे जाती है।
°°°
रूंदी मिट्टी, पानी देकर, वह देती चाक चढ़ाय,
मिट्टी को देकर एक रूप नया मात रही मुस्काय।
चलती चक्की पर बड़े प्रेम से उंगली वह फिराती है,
हौले-हौले मिट्टी में वह एक नवजीवन गढ़ देती है।
परम संतोष भाव से एक-एक भाजन गढ़ती जाती है,
कभी घड़ा, कभी कुल्हड़, तो दिये कभी बनाती है।
रह जाये जो कुछ अक्र-वक्र, सहलाती है, दुलराती है,
देखकर अपनी संततियों को वह फूले नहीं समाती है।
जननी है वह तो सबको एक समान सुपूत बनाती है
ठोंक पीटकर मिट्टी के लोंदे को घड़ा वह बनाती है।
सूखकर छाया में जब आकार स्थिर हो जाता है,
आवे में पककर भाँड फिर पानी को भी धर लेता है।
उम्र की रेखाएँ मुखपर कहानी अपनी लिख जाती हैं,
दुख चाहे जितना हो, सृजन का सुख दे जाती है।
