एक ख़त क्या आया, पूरे गाँव में शोर हो गया! इससे पहले कि वह पत्र उसके पताधारक अर्थात् पीताम्बर मिश्र को प्राप्त होता, गाँव भर को पता चल गया!
अब सभी इस बात का पता लगाने को व्यग्र हो उठे थे कि पीताम्बर के पिता श्री परशुराम मिश्र जो कि महीने भर पहले ही शहर के अस्पताल से अचानक गायब हो गये थे, के इस तरह लापता होने का क्या रहस्य था। … और यह भी कि सबसे सही अटकल किसने लगाई!
पीताम्बर को पत्र घर पर नहीं दिया गया। कालिदास आम पेड़ के नीचे एक बिनबुलाई पंचायत सी लग गई। पुत्र की सहमति से पिता के पत्र को उनके अभिन्न मित्र लिकड़ू काका ने खोला और गणेश पंडित को पढ़ने को दिया।
"… बड़ी उम्मीद लेकर आया था, बाबा, दादा, काका, चाचा बनकर सबके साथ जीवन के आखिरी पल बिताने! अकेला उस दिन नहीं हुआ जब शकुंतला छोड़कर कर चल बसी थी, …. उस समय उम्मीदें शेष थीं। अस्पताल के बिस्तर पर सात-सात दिन तक किसी अपने की प्रतीक्षा ने शायद उस उम्मीद की हत्या कर दी। … चलो माफ किया, माफी मांगता भी हूँ। अब तक जो हुआ सो हुआ… आगे मेरे लिए किसी भी प्रकार की परेशानी मत उठाना। सारी जिम्मेदारियों से बरी कर दिया। कोई क्रियाकर्म करने की आवश्यकता नहीं है। शकुंतला ने जीते जी कार्तिक उद्यापन के समय अपने साथ मेरे भी अंतिम संस्कार करा डाले थे, पंडित जी और समस्त ग्राम वासी साक्षी होंगे। …
एक भयावह सन्नाटे ने पूरे चौपाल को घेर लिया था।