दिये जलायें

आओ मिलकर दिये जलायें,
तम को मन से  दूर भगायें।
रह   जाये  ना कोई  कोना,
अबकी ऐसी अलख  जगायें।

दुनिया का यह कैसा मेला,
लेकर  के हाथों  में थैला,
फिरते   हैं सब  मारे-मारे,
ढूंढ  रहे हैं   बैठ किनारे।

जो   भी चाहे  मोती पाये,
तजकर आलस डूब लगाये।
आओ मिलकर दिये जलायें,
तम को मन  से दूर भगायें।

आनी-जानी   दुनिया फेरा,
किसका घर है किसका  डेरा,
आओ दिल में ज्योति जलायें,
अरमानों    के पंख लगायें।

जो   चाहे  आकर ले  जाये,
मिलजुल कर नवदीप जलाये।
आओ मिलकर  दिये जलायें,
तम  को मन  से दूर भगायें।

रात अमावस की  यह काली,
वरदानों     से भरनेवाली,
साफ-सफाई  का मौसम है,
विजयोल्लास का यह पर्व है।

आओ      तोरणद्वार    बनायें,
सुख-समृद्धि से घर को सजायें।
आओ   मिलकर  दिये जलायें,
तम   को मन  से दूर भगायें।


बोलते दिये

बोलते दिये
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रूंदी  मिट्टी,  पानी  देकर,  वह  देती   चाक  चढ़ाय,
मिट्टी को  देकर एक रूप नया  मात  रही  मुस्काय।

चलती चक्की पर बड़े प्रेम से उंगली वह फिराती है,
हौले-हौले मिट्टी में वह एक नवजीवन गढ़  देती  है।

परम संतोष भाव से एक-एक भाजन गढ़ती जाती है,
कभी घड़ा, कभी कुल्हड़, तो दिये  कभी  बनाती  है।

रह जाये जो कुछ अक्र-वक्र, सहलाती है, दुलराती है,
देखकर अपनी संततियों को वह फूले नहीं समाती है।

जननी है वह तो सबको एक समान सुपूत बनाती है
ठोंक पीटकर मिट्टी के लोंदे को घड़ा वह बनाती  है।

सूखकर  छाया  में  जब  आकार स्थिर हो जाता है,
आवे में पककर भाँड फिर पानी को भी धर लेता है।

उम्र की रेखाएँ मुखपर कहानी अपनी लिख जाती हैं,
दुख चाहे जितना हो, सृजन  का  सुख  दे  जाती  है।



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