उजाले की चुभन

नहीं होती सहन, उजाले की चुभन,
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

नहीं चाहिए मुझे, उजाले की लपट,
जला दे जो मेरा, छोटा सा आशियाँ।
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

चुकाई है हमने, कीमत रोशनी की,
गरीबी को चिढ़ाती, सतरंगी रोशनियाँ।
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

फटे हैं वस्त्र, बेपर्दा करती निगाहें,
बेशर्म निगाहें या, उजाले का है क़ुसूर!
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

भरी थी महफिल, था प्रतिबद्ध मौन,
होता रहा चीर-हरण, पथरा गई निगाहें!
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

वो,जो, दिये जलाते हैं, रोशनी जुटाते हैं,
दिखता कहाँ उन्हें, चिराग तले अंधेरा घना!
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

दूभर ज़िंदगी जब, मांगने लगे मौत उधार,
रोक लो उजाले की बर्छी, छाने दो अंधकार!
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

आज भी न मिला कोई काम, दिन ढले जब करता बखान,
बुझती माँ की आशा की लौ, कहती है यही बस बार-बार!
लौटा दो मुझको, घना अंधेरा मेरा।
लौटा दो मुझको, मेरा अंधेरा घना।

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