आत्मनिष्ठ

शर्माजी, वर्माजी से फोन पर बातें कर रहे थे।

"आओ यार बहुत दिन हो गए मिले हुए।" ..... तभी उनका कुत्ता आ जाता है । "टॉमी, अभी जाओ उधर, देख नहीं रहे हो, अंकल से बात कर रहा हूँ। ....... ये टॉमी भी ना, बस पूछो मत, अपने मे ही उलझाए रखता है । कभी घुमाने ले जाओ कभी सहलाओ ! बच्चों की तरह नखड़े करता रहता है ।" पत्नी को पुकारते हैं, "अरे भई, दो इसको बिस्किट-विस्किट ।" हाँ वर्मा, तो मैं क्या कह रहा था, आओ ना कभी । टॉमी से मिलवाता हूँ । बहुत मिलनसार है । बिटिया ले आई थी स्टेट्स जाने से पहले । वह तो इसके बिना एक पल भी नहीं रह पाती थी । हमारा भी इसी के साथ टाइम पास हो जाता है । वो भाईसाब बाहर के आदमी को देखकर जो उछलता है ! ............. आओ ना, फिर मिल बैठकर बात करते हैं । .......... अरे भाई, मेरा क्या, पैमवे का काम तो चल ही रहा था, आजकल एक वेटलॉस हर्बल प्रॉडक्ट का भी काम शुरू कर दिया है। "

वर्माजी ने फोन कब काटा, शर्माजी को पता भी नहीं चला।

दूसरों की भावनाओं को समझने की फुर्सत भी किसे है!

https://youtu.be/CA1QzvNo71M

☝  इस लघुकथा को वीडियो रूप में देखने के लिए ऊपर दिए गए लिंक को क्लिक करें। 






My pick on Amazon

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...