दोहे - सत्पथ

सत्पथ

मिथ्या से बचकर रहो, सच का डालो हार।
सच पर चलने के लिए, दो त्याग अहंकार।।

सत्यनिष्ठा औ प्रतिज्ञा, हो हिम्मत दरकार।
मृत्यु है एकबार ही,  कभी न  डरना  यार।।

बातें सच की सब करें, सच की चलें न राह।
बातें सब हँसकर करें,  मन में रखकर डाह।।

सच है अब कम हो गई,  सच की  पैदावार।
आज सभी को चाहिए, सुवर्ण, बँगला कार।।

बातें करते हैं सभी,  सारी  अच्छी बात।
मौका मिलते ही करें, भीतर से आघात।।

सच पर चलने की सजा, कठिन बहुत है यार।
सतयुग में भी  देखिए,  बिखर  गया  परिवार।।

राजा बलि का दोष क्या, दानी था वह वीर।
प्रभु वामन बन आ गये, कृत्य न था गंभीर।।

सतयुग में सत् चुक गया, कलयुग की क्या बात।
पग-पग   पर   है   परीक्षा,   बड़े-बड़े   आघात।।

हर  युग  खाईं  ठोकरें,  मानी  कभी  न  हार।
सच की जिद है आज भी, तुम भी मानो यार।।

दुर्गम राह भले सही, श्रेय  परम्  संतोष।
कुंदन निखरे आग से, यही बने परितोष।।

चुनावी दोहे

मिल सकता अवसर पुनः, खूब मचाना लूट।
बार-बार जो भज सको,  वही  पुराना  झूठ।।

झाँसा-पट्टी  खा   गये,   भूल गये  इतिहास।
चल पड़ा फिर रिमोट से, सत्ता का परिहास।।

मान-मनौव्वल शुरु हुआ, कौन बने सिरमौर।
आगे की  अब  सोचिये,  आया  कैसा  दौर।।

लो जी अब तो हो गये,  हम भी हैं निरपेक्ष।
मन की बात मत करना, अर्थ लगा सापेक्ष।।

जीत मिली पर खुश नहीं,  कैसा आया काल।
खुद के  बुने  उलझ  गये,  वादों  के  जंजाल।।

संभव है हर बार ही, झोंक सको तुम धूल।
कुछ दिनों के बाद ही, जनता जाती भूल।।

माफ किया हमने तुझे, मत करना फरियाद।
भूल गये सब लोभ में,  रहा न कुछ भी याद।।

छोटी-मोटी बात पर,  नाप  दिया  सरकार।
आगे की तो बात क्या, शुरू अभी तकरार।।

कीमत मत की भूलकर,  बेच  दिया  बेमोल।
अपनी किस्मत आप ही, रखकर डंडी तोल।।

चक्र घूम रथ का  गया,   ऐसा  चला  कुचक्र।
अर्द्ध-सत्य ने फिर किया, राह काल का वक्र।।

नक्कारे की चल पड़ी, उल्टी सीधी चाल।
बल्ले-बल्ले हो रही ,  ठोंको  देकर  ताल।।

सिक्का खोटा चल गया, चहक रही मुस्कान।
इतिहास मगर कह रहा,  फीकी  है पकवान।।

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