अश्रु-तर्पण
दादी के देहावसान की खबर देवदत्त को बिलकुल भी अप्रत्याशित नहीं लगी। पिछले कुछ दिनों से जैसे घर भर को इसी का इंतजार था। वैसे, मौत किसी की भी हो, तकलीफ तो होती ही है ! और फिर यह तो अपनी दादी का मामला था, जो उसे बहुत प्रिय थी।
उम्र नब्बे से कम तो बिल्कुल भी नहीं। कूल्हे की हड्डी चटख जाने से बिछावन पर ही पड़ी रहती थी। उस पर से वह सात बेटों की माँ ठहरी। बेटों में से कई तो अवकाश प्राप्त कर घर वापसी कर चुके थे। यह अलग बात है कि पूर्व में, मंझला (दूसरे क्रम वाला) बेटा, जो कि राज्य पुलिस में सिपाही था, कहा करता था कि सेवा से अवकाश के बाद वह घर-गृहस्थी संभाल लेगा, लंगर-भेड़ें (पूंछों वाली भेड़ों की प्रजाति) पालेगा, माता-पिता की सेवा करेगा और भी न जाने क्या-क्या ! गृहस्थी तो खूब संभाली, एक की सात कर दी। “अच्छा हुआ, ऐसी बिखरी हुई गिरस्ती देखने से पहले ही वे स्वर्ग सिधार गए। करमजली मैं ही रह गई थी ऐसे दुर्दिन देखने को ! अपना-अपना भोग है, भोगना ही पड़ेगा।” जोगरानी देवी कहती हुई आत्मा से बिलख पड़ती।
वह भी जानता था और सभी परिजन भी कि दिल्ली से वहाँ तक पहुँचने में डेढ़ दिन से काम न लगेंगे। वह भी तब, जब गाड़ी सीधी उसकी मर्जी से खुले, चले और पहुंचे। दिल्ली से बिहार के सुदूर हिस्से के लिए जाने वाली गाड़ियों की हालत तो कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। जरूरत पर आरक्षण मिलने का तो सवाल ही नहीं और सामान्य डिब्बे में तिल भर धरने को जगह नहीं। तब तक मिट्टी (लाश) को घर पर रखना उचित नहीं होगा। यह बात दीगर थी कि बाप की मृत्यु के बाद एक खूँट का वारिस तो वह था, लेकिन पोते के लिए दादी की लाश को रोके रखना कहीं से भी व्यावहारिक नहीं थी।
मुश्किल से एक महीने हुए होंगे, जब वह दादी को मिलने पत्नी सुजाता सहित गया था। उनकी खाट पर बैठकर, फूट-फूटकर कर रोया था, जबकि उसकी पत्नी देवरानियों के साथ इधर-उधर के हाल-चाल लेने में व्यस्त थी। दादी ने कहा था, “आत्मा में तकलीफ है”। जीने की लालसा समाप्त हो चुकी थी। छोटी चाची कुछ खिलाने -पिलाने को जोर डालती तो भरपूर गालियाँ देती। देवरानियों की मंडली सहित जैसे ही सुजाता पहुँची तो दादी ने कहा था, “मुझसे मिलने आई थी कि अपनी बहनों से! ख़ैर कोई बात नहीं, देखो मेरा पोता, मेरा अपना, कलेजे का टुकड़ा, मेरे लिए कितना रोया!
शायद पोते से अश्रु-तर्पण पाकर दादी की आत्मा तृप्त हो गई थी, इसीलिए आज उनकी मृत्यु की खबर, मुक्ति की खबर बनकर रह गई।
भाग - 2
पति की मृत्यु के बाद घर संभाल नहीं पाईं जोगरानी देवी। एक आँगन, एक चूल्हा, जिसकी मिसालें दी जाती थीं जिले-जवार में, बिखर गया। ऐसा लगा, मानों बेटे-बहू इसी दिन का इंतजार कर रहे थे।
सभी को लग रहा था, ‘संयुक्त परिवार को चलाने की जिम्मेदारी अकेले उनके ही कंधों पर क्यों रहे’! किसी को लग रहा था, ‘मेरा परिवार छोटा है, बँटवारा हो जाये तो वारे-न्यारे हो जाएँ’। किसी को लगता, ‘हमारी कमाई से ही घर चले और मर्जी से भोजन तक नहीं मिले’! ‘चाय, दूध, साबुन-तेल अपना ही करना है तो एक घर का राग अलापने का क्या लाभ’!
जिस तरह जीभ के चटोरे स्वास्थ्य के हित-अनहित को भूल जाते हैं; उसी तरह संयुक्त परिवार के लाभ को पूरी तरह से बिसर सातों बेटे अपने-अपने नफा-नुकसान की सोच रहे थे। एक बार भी नहीं याद आ रहा था कि पत्नी, बच्चों की बर-बीमारी से पूरी तरह बेफिक्र होकर वे बाहर रह कर कमाई करते रहे। शायद ही कभी ऐसा अवसर आया हो जब कोई बच्चा बीमार पड़ा हो और उसका इलाज कराने के लिए बाप को छुट्टियाँ करनी पड़ी हो या किसी बहू को प्रसव के लिए या उसके उपरांत आराम के लिए मायके की शरण लेनी पड़ी हो ! बच्चों के पाठशाला या महाविद्यालय में दाखिले का सवाल हो, उनकी पुस्तकों का जुगाड़ हो, बेटियों की शादी के लिए लड़का ढूँढना हो और सबसे बढ़कर अगर किसी की बाहर में किसी से ठन गई हो तो, पता ही नहीं चल पाता किसकी समस्या थी और किसने समाधान कर दिया।
वैसे, बूढ़े मालिक अर्थात् काका जी, जोगरानी देवी के पति को बाहर और घर के लोग क्रमशः इन्हीं नामों से पुकारते थे, को अंदरखाने चल रही इस विघटन का अंदाजा हो गया था। शायद इन्हीं अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाने के प्रयास में उलझ कर रक्तचाप का शिकार हो गये। कुछ दिनों तक बहुत तीमारदारी हुई, फिर धीरे-धीरे संस्कारों को बोझ हल्का होना शुरू हो गया और बूढ़े मालिक, जिनके रौब का लोहा सारे कुटुंब मानते थे, इलाज के लिए अपने ही संसाधनों के मुहताज हो गये। एक ऐसी अवस्था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की थी। नतीजा हुआ कि उन्होंने दवाएं लेनी बंद कर दीं। जोगरानी देवी समझातीं तो बुरी तरह झिड़क देते। और एक दिन, चलते-फिरते ही, बल्कि काम-काज करते हुए, गेहूँ की भूसियाँ उड़ाते हुए, खाँसी का एक दौरा पड़ा और आतंरिक श्राव के कारण बूढ़े मालिक सबसे बड़े मालिक से मिलने को प्रस्थान कर गए।
भाग - 3
पति की मृत्यु के उपरांत सदमे से उबरने में देवरानी देवी ने बहुत वक्त नहीं लगाया। भरा-पूरा घरबार तो था ही, पुत्रों, पुत्रवधुओं, पोतों, पोतियों से भरे घर में उनका मान और भी बढ़ गया था। शाम के वक्त उनके सिरहाने मानों मजमा सा लग जाता था। कभी किसी को लाड़ कर देतीं, कभी किसी को फटकार देतीं। जैसे उनके पास खुशियों का कोई खजाना छुपा होता था, जो भी आ गया निहाल हो गया।
ज्यादा दिन नहीं लगा, दो-एक बेटों को चूल्हा-चौका अलग करने की जल्दी सवार हो गई। शायद पाप सभी के मन में था, कोई अधिक मुखर था तो कोई लोक-लज्जा के भय से थोड़ा संकोच कर रहा था। यहाँ तक कि देवरानी देवी ने भी दम दिखा दिया और एक हिस्से का दावा कर दिया। पंचों को हँकार दिया गया और फिर बंदर-बाँट शुरू हुआ। कभी मोल-भाव से तो कभी गुल्ली-पेल किया गया। आठवाँ भाग तो नहीं मगर देवरानी देवी के हिस्से में आया पाँच कट्ठे का एक खेत जो कि उनकी मृत्यु के बाद उनके सबसे छोटे बेटे को और एक कमरा जो कि मृत्यु पश्चात् मंझले को मिलना तय हुआ। पठारी इलाके की बिखरी हुई जोत, अगर सात नहीं तो हर खेत में कम से कम तीन से चार मेड़ें पड़ ही गईं। बड़े बेटे ने उनके भोजन भात की जिम्मेदारी ली। चौथे क्रम के बेटे ने, जो कि नौकरी के सिलसिले में दूर शहर में नौकरी कर रहा था, अपने बड़े बेटे की पढाई छुड़ाकर हिस्सा लेने के लिए घर भेजना श्रेयस्कर समझा।
बहुत शोर-शराबे के साथ चला यह बँटवारे का मामला भी शांत होने को आ ही चला था कि बकरी की रस्सी में फंसकर देवरानी देवी गिर पड़ीं और कूल्हे की हड्डी चटख गई। बड़के ने पुत्र धर्म का निर्वहन किया और इलाज व सेव्-सुश्रुषा में किसी प्रकार की कोताही नहीं की। परन्तु वह, या तो पकी उम्र में अपने बढ़ते रुतबे को शायद पचा नहीं पा रही थी या सही में ऐसा ही होता होगा, बुढ़ापे में बचपना आने लगता है, किसी तरह महीना भर प्लास्टर में रही और हटाने की जिद करने लगी। एकदिन बेटे की अनुपस्थिति में अपनी देवरानी के बेटे को बुला लिया जो झोला छाप डॉक्टरी करता था और पत्थर से हो रहे पैर पर पड़ रहे मनों के बोझ से छुटकारा पा लिया। नतीजा हुआ कि कुछ दिनों के बाद किसी तरह से अपनी अदम्य जिजीविषा के दम पर लाठी के सहारे खड़ी तो हो गई पर दाहिने पैर की शक्ति जाती रही। दर्द और मालिश का कभी न छूटने वाला साथ होकर रह गया।
भाग - 4
नवें दिन देवदत्त ने दिल्ली से पूर्व एक्सप्रेस से अपनी यात्रा प्रारम्भ की। सोचा था ग्यारह से बारह बजे तक गाँव पहुँच जायेगा, फिर हजामत बाल भी हो जायेगा। परंतु जब पटना सिटी में ही ग्यारह बज गए तो उसने अपना रेजर निकाला और बेसिन के पास चला गया और खुद से ही धीरे-धीरे बाल बनाने लगा। वह जानता था अगर कल की तिथि में किसी ने उसे बालों सहित देख लिया तो एक नया ही मोर्चा खुल जायेगा और मुकाबले की स्थिति में वह बिलकुल भी नहीं था। परंतु खुद से बाल बनाने का उसका निर्णय शायद पाखंड के खिलाफ उसका पहला मोर्चा था जो बाहर से तो किसी को नहीं दीख रहा था पर आने वाले दिनों में महती भूमिका निभाने वाला था। वह सोच रहा था लोग पूछेंगे, ‘चलती गाड़ी में छौर-कर्म कैसे करा लिया’? ‘दनकौर स्टेशन पर गाड़ी डेढ़ घंटे के लिए रुकी हुई थी, वहीँ प्लेटफॉर्म के ठीक पीछे नाइ था, दौड़कर यह काम करा लिया। सोचा देर हो ही रही है।’ अपने संभावित उत्तर को लेकर वह आश्वस्त हो गया था।
शाम ढले ही वह गाँव पहुँच सका। एकदम जश्न का सा माहौल था। अपने हिस्से के रूपये जाते ही चाचा के जिम्मे लगाए। ऐसा लगा मानों अब जाकर दादी का कर्ज उतर गया।
सात चूल्हों में बँटवारे के बाद परिवार में वह दम तो नहीं रह गया था, पर दिखावा भरपूर किया गया कि काका जी से कम धूम-धाम न हो क्रिया-कर्म में। पंच मेल मिठाइयाँ बनीं। गोदान समेत पंडित और महापात्र की भरपूर खातिरदारी की गई। दशकर्म के दिन से लेकर तेरहवीं तक भरपूर तमाशा हुआ। हर बात पर यही होता था कि काका जी का तो इस तरह से हुआ था। मरने के बावजूद भी पति की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही थीं देवरानी देवी।
आज मृतका की हर छोटी-बड़ी इच्छा का ध्यान रखा जा रहा था। वहीँ, जब शय्या-संगिनी हुई थी, किसी ने भी यह जानने की चेष्टा नहीं की कि उनकी आत्मा को कौन सा कष्ट था ! बहुएं सेवा का पुण्य प्रताप लूट रही थीं। साफ़-सफाई कर के नहा धोकर आँगन में बैठ जातीं बताने को कि जितनी सेवा उनकी हो रही थी, उतनी गाँव में किसी की नहीं हुई। किसी को भी यह ख्याल नहीं आ रहा था कि एक व्हील चेयर और शौचालय बन जाने से उनके आत्म सम्मान की कितनी रक्षा हो सकती थी।
दादी के देहावसान की खबर देवदत्त को बिलकुल भी अप्रत्याशित नहीं लगी। पिछले कुछ दिनों से जैसे घर भर को इसी का इंतजार था। वैसे, मौत किसी की भी हो, तकलीफ तो होती ही है ! और फिर यह तो अपनी दादी का मामला था, जो उसे बहुत प्रिय थी।
उम्र नब्बे से कम तो बिल्कुल भी नहीं। कूल्हे की हड्डी चटख जाने से बिछावन पर ही पड़ी रहती थी। उस पर से वह सात बेटों की माँ ठहरी। बेटों में से कई तो अवकाश प्राप्त कर घर वापसी कर चुके थे। यह अलग बात है कि पूर्व में, मंझला (दूसरे क्रम वाला) बेटा, जो कि राज्य पुलिस में सिपाही था, कहा करता था कि सेवा से अवकाश के बाद वह घर-गृहस्थी संभाल लेगा, लंगर-भेड़ें (पूंछों वाली भेड़ों की प्रजाति) पालेगा, माता-पिता की सेवा करेगा और भी न जाने क्या-क्या ! गृहस्थी तो खूब संभाली, एक की सात कर दी। “अच्छा हुआ, ऐसी बिखरी हुई गिरस्ती देखने से पहले ही वे स्वर्ग सिधार गए। करमजली मैं ही रह गई थी ऐसे दुर्दिन देखने को ! अपना-अपना भोग है, भोगना ही पड़ेगा।” जोगरानी देवी कहती हुई आत्मा से बिलख पड़ती।
वह भी जानता था और सभी परिजन भी कि दिल्ली से वहाँ तक पहुँचने में डेढ़ दिन से काम न लगेंगे। वह भी तब, जब गाड़ी सीधी उसकी मर्जी से खुले, चले और पहुंचे। दिल्ली से बिहार के सुदूर हिस्से के लिए जाने वाली गाड़ियों की हालत तो कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। जरूरत पर आरक्षण मिलने का तो सवाल ही नहीं और सामान्य डिब्बे में तिल भर धरने को जगह नहीं। तब तक मिट्टी (लाश) को घर पर रखना उचित नहीं होगा। यह बात दीगर थी कि बाप की मृत्यु के बाद एक खूँट का वारिस तो वह था, लेकिन पोते के लिए दादी की लाश को रोके रखना कहीं से भी व्यावहारिक नहीं थी।
मुश्किल से एक महीने हुए होंगे, जब वह दादी को मिलने पत्नी सुजाता सहित गया था। उनकी खाट पर बैठकर, फूट-फूटकर कर रोया था, जबकि उसकी पत्नी देवरानियों के साथ इधर-उधर के हाल-चाल लेने में व्यस्त थी। दादी ने कहा था, “आत्मा में तकलीफ है”। जीने की लालसा समाप्त हो चुकी थी। छोटी चाची कुछ खिलाने -पिलाने को जोर डालती तो भरपूर गालियाँ देती। देवरानियों की मंडली सहित जैसे ही सुजाता पहुँची तो दादी ने कहा था, “मुझसे मिलने आई थी कि अपनी बहनों से! ख़ैर कोई बात नहीं, देखो मेरा पोता, मेरा अपना, कलेजे का टुकड़ा, मेरे लिए कितना रोया!
शायद पोते से अश्रु-तर्पण पाकर दादी की आत्मा तृप्त हो गई थी, इसीलिए आज उनकी मृत्यु की खबर, मुक्ति की खबर बनकर रह गई।
भाग - 2
पति की मृत्यु के बाद घर संभाल नहीं पाईं जोगरानी देवी। एक आँगन, एक चूल्हा, जिसकी मिसालें दी जाती थीं जिले-जवार में, बिखर गया। ऐसा लगा, मानों बेटे-बहू इसी दिन का इंतजार कर रहे थे।
सभी को लग रहा था, ‘संयुक्त परिवार को चलाने की जिम्मेदारी अकेले उनके ही कंधों पर क्यों रहे’! किसी को लग रहा था, ‘मेरा परिवार छोटा है, बँटवारा हो जाये तो वारे-न्यारे हो जाएँ’। किसी को लगता, ‘हमारी कमाई से ही घर चले और मर्जी से भोजन तक नहीं मिले’! ‘चाय, दूध, साबुन-तेल अपना ही करना है तो एक घर का राग अलापने का क्या लाभ’!
जिस तरह जीभ के चटोरे स्वास्थ्य के हित-अनहित को भूल जाते हैं; उसी तरह संयुक्त परिवार के लाभ को पूरी तरह से बिसर सातों बेटे अपने-अपने नफा-नुकसान की सोच रहे थे। एक बार भी नहीं याद आ रहा था कि पत्नी, बच्चों की बर-बीमारी से पूरी तरह बेफिक्र होकर वे बाहर रह कर कमाई करते रहे। शायद ही कभी ऐसा अवसर आया हो जब कोई बच्चा बीमार पड़ा हो और उसका इलाज कराने के लिए बाप को छुट्टियाँ करनी पड़ी हो या किसी बहू को प्रसव के लिए या उसके उपरांत आराम के लिए मायके की शरण लेनी पड़ी हो ! बच्चों के पाठशाला या महाविद्यालय में दाखिले का सवाल हो, उनकी पुस्तकों का जुगाड़ हो, बेटियों की शादी के लिए लड़का ढूँढना हो और सबसे बढ़कर अगर किसी की बाहर में किसी से ठन गई हो तो, पता ही नहीं चल पाता किसकी समस्या थी और किसने समाधान कर दिया।
वैसे, बूढ़े मालिक अर्थात् काका जी, जोगरानी देवी के पति को बाहर और घर के लोग क्रमशः इन्हीं नामों से पुकारते थे, को अंदरखाने चल रही इस विघटन का अंदाजा हो गया था। शायद इन्हीं अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाने के प्रयास में उलझ कर रक्तचाप का शिकार हो गये। कुछ दिनों तक बहुत तीमारदारी हुई, फिर धीरे-धीरे संस्कारों को बोझ हल्का होना शुरू हो गया और बूढ़े मालिक, जिनके रौब का लोहा सारे कुटुंब मानते थे, इलाज के लिए अपने ही संसाधनों के मुहताज हो गये। एक ऐसी अवस्था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की थी। नतीजा हुआ कि उन्होंने दवाएं लेनी बंद कर दीं। जोगरानी देवी समझातीं तो बुरी तरह झिड़क देते। और एक दिन, चलते-फिरते ही, बल्कि काम-काज करते हुए, गेहूँ की भूसियाँ उड़ाते हुए, खाँसी का एक दौरा पड़ा और आतंरिक श्राव के कारण बूढ़े मालिक सबसे बड़े मालिक से मिलने को प्रस्थान कर गए।
भाग - 3
पति की मृत्यु के उपरांत सदमे से उबरने में देवरानी देवी ने बहुत वक्त नहीं लगाया। भरा-पूरा घरबार तो था ही, पुत्रों, पुत्रवधुओं, पोतों, पोतियों से भरे घर में उनका मान और भी बढ़ गया था। शाम के वक्त उनके सिरहाने मानों मजमा सा लग जाता था। कभी किसी को लाड़ कर देतीं, कभी किसी को फटकार देतीं। जैसे उनके पास खुशियों का कोई खजाना छुपा होता था, जो भी आ गया निहाल हो गया।
ज्यादा दिन नहीं लगा, दो-एक बेटों को चूल्हा-चौका अलग करने की जल्दी सवार हो गई। शायद पाप सभी के मन में था, कोई अधिक मुखर था तो कोई लोक-लज्जा के भय से थोड़ा संकोच कर रहा था। यहाँ तक कि देवरानी देवी ने भी दम दिखा दिया और एक हिस्से का दावा कर दिया। पंचों को हँकार दिया गया और फिर बंदर-बाँट शुरू हुआ। कभी मोल-भाव से तो कभी गुल्ली-पेल किया गया। आठवाँ भाग तो नहीं मगर देवरानी देवी के हिस्से में आया पाँच कट्ठे का एक खेत जो कि उनकी मृत्यु के बाद उनके सबसे छोटे बेटे को और एक कमरा जो कि मृत्यु पश्चात् मंझले को मिलना तय हुआ। पठारी इलाके की बिखरी हुई जोत, अगर सात नहीं तो हर खेत में कम से कम तीन से चार मेड़ें पड़ ही गईं। बड़े बेटे ने उनके भोजन भात की जिम्मेदारी ली। चौथे क्रम के बेटे ने, जो कि नौकरी के सिलसिले में दूर शहर में नौकरी कर रहा था, अपने बड़े बेटे की पढाई छुड़ाकर हिस्सा लेने के लिए घर भेजना श्रेयस्कर समझा।
बहुत शोर-शराबे के साथ चला यह बँटवारे का मामला भी शांत होने को आ ही चला था कि बकरी की रस्सी में फंसकर देवरानी देवी गिर पड़ीं और कूल्हे की हड्डी चटख गई। बड़के ने पुत्र धर्म का निर्वहन किया और इलाज व सेव्-सुश्रुषा में किसी प्रकार की कोताही नहीं की। परन्तु वह, या तो पकी उम्र में अपने बढ़ते रुतबे को शायद पचा नहीं पा रही थी या सही में ऐसा ही होता होगा, बुढ़ापे में बचपना आने लगता है, किसी तरह महीना भर प्लास्टर में रही और हटाने की जिद करने लगी। एकदिन बेटे की अनुपस्थिति में अपनी देवरानी के बेटे को बुला लिया जो झोला छाप डॉक्टरी करता था और पत्थर से हो रहे पैर पर पड़ रहे मनों के बोझ से छुटकारा पा लिया। नतीजा हुआ कि कुछ दिनों के बाद किसी तरह से अपनी अदम्य जिजीविषा के दम पर लाठी के सहारे खड़ी तो हो गई पर दाहिने पैर की शक्ति जाती रही। दर्द और मालिश का कभी न छूटने वाला साथ होकर रह गया।
भाग - 4
नवें दिन देवदत्त ने दिल्ली से पूर्व एक्सप्रेस से अपनी यात्रा प्रारम्भ की। सोचा था ग्यारह से बारह बजे तक गाँव पहुँच जायेगा, फिर हजामत बाल भी हो जायेगा। परंतु जब पटना सिटी में ही ग्यारह बज गए तो उसने अपना रेजर निकाला और बेसिन के पास चला गया और खुद से ही धीरे-धीरे बाल बनाने लगा। वह जानता था अगर कल की तिथि में किसी ने उसे बालों सहित देख लिया तो एक नया ही मोर्चा खुल जायेगा और मुकाबले की स्थिति में वह बिलकुल भी नहीं था। परंतु खुद से बाल बनाने का उसका निर्णय शायद पाखंड के खिलाफ उसका पहला मोर्चा था जो बाहर से तो किसी को नहीं दीख रहा था पर आने वाले दिनों में महती भूमिका निभाने वाला था। वह सोच रहा था लोग पूछेंगे, ‘चलती गाड़ी में छौर-कर्म कैसे करा लिया’? ‘दनकौर स्टेशन पर गाड़ी डेढ़ घंटे के लिए रुकी हुई थी, वहीँ प्लेटफॉर्म के ठीक पीछे नाइ था, दौड़कर यह काम करा लिया। सोचा देर हो ही रही है।’ अपने संभावित उत्तर को लेकर वह आश्वस्त हो गया था।
शाम ढले ही वह गाँव पहुँच सका। एकदम जश्न का सा माहौल था। अपने हिस्से के रूपये जाते ही चाचा के जिम्मे लगाए। ऐसा लगा मानों अब जाकर दादी का कर्ज उतर गया।
सात चूल्हों में बँटवारे के बाद परिवार में वह दम तो नहीं रह गया था, पर दिखावा भरपूर किया गया कि काका जी से कम धूम-धाम न हो क्रिया-कर्म में। पंच मेल मिठाइयाँ बनीं। गोदान समेत पंडित और महापात्र की भरपूर खातिरदारी की गई। दशकर्म के दिन से लेकर तेरहवीं तक भरपूर तमाशा हुआ। हर बात पर यही होता था कि काका जी का तो इस तरह से हुआ था। मरने के बावजूद भी पति की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही थीं देवरानी देवी।
आज मृतका की हर छोटी-बड़ी इच्छा का ध्यान रखा जा रहा था। वहीँ, जब शय्या-संगिनी हुई थी, किसी ने भी यह जानने की चेष्टा नहीं की कि उनकी आत्मा को कौन सा कष्ट था ! बहुएं सेवा का पुण्य प्रताप लूट रही थीं। साफ़-सफाई कर के नहा धोकर आँगन में बैठ जातीं बताने को कि जितनी सेवा उनकी हो रही थी, उतनी गाँव में किसी की नहीं हुई। किसी को भी यह ख्याल नहीं आ रहा था कि एक व्हील चेयर और शौचालय बन जाने से उनके आत्म सम्मान की कितनी रक्षा हो सकती थी।