तन की कितनी साफ-सफाई
मन को कौन अब पूछे है भाई
बंधन के कितने ही टूटे ताले
पड़े हुए लेकिन मन पर जाले
चाहे कितने भी तू यंत्र लगा ले
भला बहुत हो जो तू चैन जगा ले
बेचैनी के जालों का लेकिन
इलाज कहाँ हुआ है मुमकिन
कितना कुछ तो जुटा लिया है
उससे भी अधिक गँवा दिया है
दिखता नहीं है साफ दिखाई
कहो भला फिर कैसी सफाई
जानें कितनी सदियाँ बीतीं
दादी अम्माँ घर को धोतीं
मगर कहानी वही पुरानी
मकड़े ने भी हठ है ठानी
कर ले जिसको जो करना है
जैसा किया वैसा ही भरना है
होगी जब मन की सफाई
तभी पड़ेगा सत्य दिखाई