श्मशान

श्मशान मात्र एक स्थान नहीं
मुक्ति का धाम है अंतिम
आत्मा तज कर मानव काया
अहिर्निश और अनंत यात्रा का
करती है अनुगमन।
सिद्धपीठ है श्मशान
जहाँ सत्य की परीक्षा दी
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने
महायोगी शिव करते ध्यान
मां छिन्नमस्तिका के रौद्र नर्तन का
साक्षी है यह श्मशान।
जीवन भर की कमाई का
लेखाजोखा है श्मशान का काला धुआं।
अट्टहास करता है काल यहाँ
और पूछता है
क्या लेकर आये थे जग में
जा रहे क्या लेकर!
मानोपमान, व्यवहार, उपार्जन
रह जाते हैं यहीं धरे
कर्मों की काठी पर सजकर
वो देखो चला बराती।
सुनील कुमार झा

गजल

उम्र की दुश्वारियां गले लगाने लगे हैं
दिन बचपन के  याद  आने   लगे  हैं।

राहतें बँटनी फिर से  शुरू  हो  गई  हैं
लगता है चुनाव के डर सताने लगे हैं।

सैलाब-ए-नफरत छिपाये फिरने वाले
अचानक से मुस्कुराना डराने लगे हैं।

खुद से भी ज्यादा  भरोसा  किया  था
ताज्जुब है, मुझे ही आजमाने लगे हैं।

अदृश्य शक्तियों का सहारा ढूंढने लगे
नाकामियों की सदायें रुलाने  लगे  हैं।

जा बसे परदेस  सबकुछ  लूटकर  वो
तमाशबीन मलामतें बरसाने लगे हैं।

बदलने वाली नहीं फिजा 'सुन' इनसे
कोरे वादे इनके अब हँसाने  लगे  हैं।

प्रगति गान

तरक्की की राहों में
होती हैं बाधायें बहुत 
मगर आगे बढ़ने वाले को

रोक सका है कौन!

छोटी-छोटी खुशियाँ
जो रोज संजोता है 
एक दिन उसका संसार
खुशियों से भर जाता है।

रोना-धोना छोड़ कर अब तो
गिले-शिकवे भूलकर सारे
आओ हाथ बढ़ायें मिलकर
सहारा एक दूजे का बन जायें।

जात-पाँत और ऊँच-नीच
हिंदू-मुस्लिम का तज कर भाव
आओ सब मिल कर रच दें
हिंदुस्तान का एक नया राग।

लघुकथा - एक मुलाकात

आम दिनों की तरह आज भी पुलिस कॉलोनी के पास वाले चौराहे पर सिग्नल की प्रतीक्षा में गाड़ियों की कतार लगी हुई थी। तभी एक वृद्ध सज्जन, जिसकी अवस्था यही कोई पैंसठ के करीब रही होगी और संभवतः पक्षाघात के असर के कारण पैरों को घसीट कर चल रहा था, सड़क पार करते हुए गाड़ी के बलार्ड में हाथ में झूल रहा थैला फँस जाने के कारण संतुलन खोकर गिर पड़ा। थैले की सब्जी और फल बिखरे सो अलग। वाहन चालक जो कि पुलिस की वर्दी में था, ने खा जाने वाली नजरों से वृद्ध को देखा, मगर इससे पहले कि वह कोई मोटी सी गाली निकालता साथ में बैठे हुए उसके अधिकारी ने मना कर दिया और त्वरित गति से गाड़ी से उतरकर वृद्ध को सहारा देने लगा। इसी क्रम में वृद्ध का हाथ उस मदद करने वाले वयक्ति के गर्दन पर चला गया।
..... यह क्या, अनायास ही व्यक्ति के गर्दन के मस्से पर वृद्ध की अनामिका उंगली इस प्रकार एक ख़ास अंदाज में गोल-गोल घूम रही थीं मानों उसे कभी ऐसा करने का अभ्यास और अधिकार रहा हो !
वृद्ध के मुँह से स्वतःस्फुट बुदबुदाहट निकली “कालू …. कालिया ..... बिलकुल ऐसा ही एक मस्सा उसके भी गर्दन पर था”. ..... पर शीघ्र ही सजग हो गया और बोला “माफ़ करना बेटे, तुम्हें तकलीफ हुई, गलती मेरी थी”.
अधिकारी को भी हाथों का वह खास स्पर्श पहचाना सा लगा। ..... “कहीं आप प्रधान सर तो नहीं! ....... याद है, जब पटना में अपनी पोस्टिंग के दौरान आपने प्लेटफार्म पर अनाथ बच्चों की कक्षाएँ लगानी शुरू की थीं, फिर उसमें से चुनकर कुछ लोगों को हैदराबाद के एक एन.जी.ओ. को सुपुर्द किया था! … मैं ..... वही ..... प्लेटफार्म का आवारा..... कालिया ....... “!
जिसने भी इस छोटे से संवाद को सुना ...... आश्चर्यचकित हो गया ...... एक अनाथ का नाथ आज इस रूप में मिला।

तमाशा

वो मुस्कुराकर गले से लगा लेना इक तमाशा  है
वो बिना बात के ठहाके लगाना बस  तमाशा  है।
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लगे रहे जलाने में जो उम्रभर बस्तियाँ जमाने की
निकलना उनका बाल्टियाँ लेकर इक तमाशा  है।
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दिलफेंक बहुत हैं, दिल  कहीं  टिकता  ही  नहीं
वफा का सबक सिखलाना  उनका  तमाशा  है।
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कट गई पूरी ज़िन्दगी अभावों में  ही रोते-धोते
अब दिखाना  दरियादिली  महज   तमाशा  है।
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कभी इंक्लाब की 'सुन' उनसे उम्मीद  न  रखना
नौ सौ चूहे खा बिल्ली का हज जाना तमाशा  है।
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ग़ज़ल … एक बात ऐसी हो गई

तसल्ली की बात बस इतनी कि शुरुआत हो गई
न चाहता था कभी जो हो, बस वही बात हो गई।

यूँ ही तन्हा सफर ज़िन्दगी का मेरा कटता रहा
जब न थी कोई उम्मीद उनसे मुलाकात हो गई।

या खुदा ज़िन्दगीभर मुसलसन रोते ही रह गये
मुस्कुराहटें नुमाया फेहरिस्ते इल्जामात हो गई।

चल रही थी ज़िंदगी बेसाख्ता एक सी लकीर पर
आखिरी पलों में जाने किसकी खुराफात हो गई।

कोसा किये जिसको हमेशा दिल की गहराइयों से
जब छोड़ दिया सभी ने, एक वही साथ हो गई ।

निकल पड़े थे इस मयकदे से तेरे मायूस होकर
शुक्र की बात है, देर से ही सही, बरसात हो गई ।

ताउम्र समझ न सके जिसको प्यार के काबिल
ठुकरा दिया दुनियाँ ने 'सुन', वही खैरात हो गई।

महाशिवरात्रि के अवसर पर


हे देवाधिदेव, हे महादेव
एक बार फिर से आना तुम
हो रही उलटी जग की रीत
इसको सीधी कर जाना तुम।

अनाचार की बयार है
आगे बहने ना देना तुम
लेकर हाथों में त्रिशूल
तांडव फिर से मचाना तुम।

हो रहा है जग उद्वेलित
शीतल चांद सजाना तुम
होता नहीं उद्धार दिखता
गंगा अविरल कर जाना तुम।

हो रही है मानवता पीड़ित
वरदान अभय दे जाना तुम
सूना है मन का आंगन
गौरी संग बस जाना तुम।
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कश्मीर की यात्रा - एक बर्फीली मुलाकात


श्रीनगर हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही हमारे ऊपर दोतरफा मार पड़ी। एक तो घने कोहरे और हाड़ कँपाती ठंढ के मारे हमारा बुरा हाल हो रहा था, ऊपर से, जिस बस से हमें पहलगाम के लिए रवाना होना था उसका कहीं अता पता नहीं था। थोड़ी ही देर में पता चला कि कसाब को फांसी की सजा पर अमल किये जाने की संभावित प्रतिक्रिया के मद्देनजर एहतियातन कुछ संवेदनशील इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया था, जिसके कारण बस वाले को रास्ता बदलकर आना पड़ रहा था। देर होने की शायद यही वजह थी। अब तो ठंढ के ऊपर डर के भी ओले पड़ रहे थे।
आखिरकार करीब डेढ़ घंटे की रहस्यमयी प्रतीक्षा के बाद बसें आईं और अनेक प्रकार की आशंकाओं के मध्य हमारी आगे की यात्रा शुरू हुई। दुल्हन के आभूषणों की तरह शिकारों से सुसज्जित डल झील के किनारे हमारे दोपहर के भोजन की व्यवस्था थी, तत्पश्चात पहलगाम के लिए हमारी यात्रा आरम्भ हुई।
दिसंबर का महीना था, सेब के पेड़ों पर फल तो बिल्कुल भी नहीं थे। चीड़ और देवदार के पत्ते भी पीले पड़कर नीचे जमीन पर पसरे हुए इस तरह प्रतीत होते थे मानों सोने का आवरण किसी भूलवश बिखर कर नीचे गिरकर धरती पर पीतवर्णी स्वर्णिम कालीन बन गयी हो। अपनी बाईं ओर कल-कल करती हुई लिद्दर नदी की खिलखिलाहट हमें अज्ञेय के यात्रा वृतांत और उपन्यासों के विवरण से मानों साक्षात् करा रही थी। जगह-जगह उजड़े हुए टेंट और किनारे पसरे घोड़ों के लीद की गंदगी हमें एहसास करा रहे थे कि कितना कुछ बदल गया था ! कभी धरती का स्वर्ग कहीं जाने वाली कश्मीर आज अतीत का एक भुतहा खंडहर प्रतीत हो रही थी।
होटल वाले से पता किया की बर्फबारी होने की कितनी संभावना है ? होटल के प्रबंधक ने जैसे वातावरण को सूंघकर और बादल को निहार कर भविष्यवाणी की कि ‘संभावना तो पूरी बन रही है, बाकी आपलोगों की किस्मत’ !
अगली सुबह नाश्ते के बाद हमारा काफिला गुलमर्ग के लिए प्रस्थान करता है। रास्ते में कितनी ही परित्यक्त कोठियाँ दिखाई पड़ी जो अपनी विपदा की कहानी के साथ सिसकती सी प्रतीत हो रही थीं। तस्वीरें मुकम्मिल करने को एकाध सेव के पेड़ भी मिले, जो कि शायद पर्यटकों के दर्शन हेतु संभवतः बचा कर रखे गए से लग रहे थे।
रास्ते में यदा-कदा रुकते हुए कश्मीरी कहवे का आनंद लेते हुए हम गुलमर्ग की और बढ़ रहे थे। तकरीबन २५-३० किलोमीटर पहले ही मौसम ने रंग बदलना शुरू कर दिया और पर्यटकों के दिलों के अंगार भड़कने शुरू हो गए। जीवन में प्रथम बार बर्फबारी देखने के आनंद का अतिरेक हमारे दल के प्रत्येक सदस्य के दमदमाते चेहरे पर देखा जा सकता था। सारी आशंकाएं छणभऱ में ही काफूर हो गईं। कुछ लोगों ने किराए पर गमबूट और ओवरकोट लिए तो किसी ने दस्ताने और टोपियाँ खरीदीं ।
रास्ते में आहिस्ते-आहिस्ते सफेद फाहे सड़कों के किनारे और गाड़ियों के शीशों पर गिर रहे थे, जिसे हम सभी ने अपने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड भी किया। परंतु असली मजा तो गुलमर्ग पहुँच कर ही आया। ठीक होटल के सामने ज्यों ही बस आकर लगी, हमारे सामान अभी उतारे भी नहीं जा सके थे कि वह बर्फ़बारी शुरू हुई कि मानों आसमान से दिव्य शक्तियाँ एकदम धवल रुई के फाहे समान पंखुड़ियों से हमारा स्वागत कर रही हों ! उम्र की तमाम सीमाओं को दरकिनार करते हुए हम बच्चों की तरह उछल कूद मचाने लगे, एक दूसरे पर बर्फ के गोले बना-बनाकर प्रहार करते और ठहाके लगाते रहे, तब तक, जब तक कि थक कर चूर ना हो गए। देखते ही देखते तकरीबन डेढ़ से दो फीट का एक उजला सा स्तर वहाँ की काली सड़कों को चमकते उजास से भरे स्फटिक से पाट गया। सड़क और मैदान का अंतर भी ख़त्म हो गया। हालाँकि हमारी अग्रिम बुकिंग थी तथापि मौसम को देखते हुए गंडोले की गतिविधि को स्थानीय प्रशाशन ने स्थगित कर दिया था, पर अब उसकी किसको फिक्र थी ! चांदनी रात में बर्फ से लदे चीड़ के पेड़ों को निहारने का स्वर्गिक आनंद रात की पार्टी पर भी भारी पड़ रहा था। पढ़ी गयी पुस्तकों के कई पात्र इन्हीं सफ़ेद पेड़ों पर नर्तन करते हुए मानों मूर्त हो कर एकबार फिर से दिल में उतर रहे थे। कहीं किसी प्रकार का भय व आशंका नहीं थी। ......... थी, तो बस अपरिमित आनंद और उल्लास।
अगली सुबह चटक धूप में गंडोले की सैर और स्कीइंग भी हो गई। बर्फीले मैदान और वन-प्रांतर को देख कर नहीं कह सकते कि इतना सुन्दर इलाका हमारे ही देश में है! हमें तो जैसे आदत सी पड़ गई है जगह-जगह फैले कचरे को देखने की, जिसका यहाँ बर्फ की मोटी परत के कारण नामोंनिशां तक नहीं था। कुदरत के ऐसे अद्भुत नज़ारे को छोड़ कर आने को भला किसका दिल करेगा ! परन्तु समय और संसाधनों का तकाज़ा था, लौटने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। टायरों में जंजीरें कसी गयीं फिसलन से बचाने को और हम वापिसी को तैयार थे इस संकल्प के साथ कि कम से कम एक बार और आना ही होगा भारत के इस मुकुट को निहारने के लिए।
सुनील कुमार झा
नोएडा (उ॰प्र॰)

मम्मी-पापा

आओ मम्मी, आओ पापा,
झूला एक बनाओ ना।
हौले-हौले, जोर-जोर से,
हमको रोज झुलाओ ना।

छोड़ो किचकिच, रोना-धोना,
हंस-हंस के बतियाओ ना।
नन्हें-नन्हें इन हाथों पर,
लाकर चाँंद सजाओ ना।

सिर फटता है कोलाहल से,
इसको और दुखाओ ना ।
मालिस तो कर देगी मम्मी,
पापा मरहम लाओ ना।

हर जवाब पर टॉफी पापा,
होमवर्क करवाओ ना।
देखो रात हो गई अब तो,
मम्मी लोरी गाओ ना।

भाव खा गया चाँद

भाव खा गया चाँद

निकले थे ढूंढने
सबसे खूबसूरत चाँद को
मगर भाव खा गया चाँद आज तो
बाहर निकल कर देखा, छत पर भागा
फुंफकार रही थी सामने की ऊँची मकान
और कोने से दीख रहा था
चमकता हुआ लैंप पोस्ट
समय जाया किए बिना
भागकर पहुंचे नजदीकी पार्क
और ढूंढ निकाला
ओह.....! कितना मरियल सा लगा यह चाँद
कभी विलीन हो रहा था
तो कभी अपनी वजूद का
अहसास करता सा प्रतीत हो रहा था
एक रोगग्रस्त बूढ़े की तरह
जो खाँसते-खाँसते बेदम होकर
पस्त पड़ जाता है
और थोड़ी देर बाद ही
साँसों पर पाते ही काबू
सुनाने लग जाता है
गुजरे दिनों के किस्से
प्यार भरे, जवानी के
अलबेले अफसाने
फिर नीली आँखों की गहराई में
तैरने लगती है चमक उम्मीद की
और सुगबुगाने लगता है जीवन
होने लगता है ग्रहण का अवसान
01/02/2018

बेटी गाँव की इज्जत

बेटी गाँव की इज्जत

गोपी की बेटी की शादी थी। शादी रात में ही हो गई लेकिन बारात टिकी हुई थी। मर्यादी का रिवाज था। दोपहर में कच्चा-पक्का खाना खिलाने का दस्तूर था। सुबह के समय से ही समधी का गुस्सा ज्येष्ठ मास के सूरज की तरह चढ़ता ही जा रहा था। रात के सम्मान में ही त्रुटियाँ रह गई थीं।

छोटे के दुकान की देहरी (यहीं पर आजकल चौपाल जमती है) पर बैठे टोले के कई तरह के लोग एक दूसरे से इशारे-इशारे में ही जानने का प्रयास कर रहे थे कि माजरा क्या है ?

दर-असल गोपी की माली हालत अच्छी नहीं थी और कमोबेश यही हालत उसकी जुबान की भी थी ! चूंकि सारी बिरादरी को खिलाने की उसकी औकात नहीं थी इसलिए सिर्फ औरतें ही हंकार पर गीत गाने भर जाती थीं। किसी ने बताया ‘गोपी बाबू का सारा इंतजाम फेल हो गया है। पत्तल तक कम पड़ गया है। कहीं से उधार लेकर भी काम चलाने की स्थिति नहीं रही। बारातियों की संख्या उम्मीद से बहुत अधिक हो गई थी। ..... उसे यह भी शक है कि किसी गाँव वाले ने ही उसे बेइज्जत कराने के लिए लड़के वाले को चुनौती देकर बारातियों की संख्या बढ़वा दी थी।’ ..... इशारा दादा की तरफ था, सरपंच के चुनाव में दादा उम्मीदवार थे और गोपी ने दूसरे टोले के हरसुमेर का साथ दिया था। दादा मात्र तीन मतों से सरपंची का चुनाव हर गए थे।

दादा तमतमाकर देहरी छोड़ उठ खड़े हुए। बोले। …. “बेटी गाँव की इज्जत होती है। सब अपने-अपने घर जाओ और जिससे जो बन पड़े लेकर आओ। “

फिर तो बारातियों को वो स्वागत हुआ कि लोग आजतक कर्णगढ़ गाँव की मिसाल देते हैं।

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...