श्रीनगर हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही हमारे ऊपर दोतरफा मार पड़ी। एक तो घने कोहरे और हाड़ कँपाती ठंढ के मारे हमारा बुरा हाल हो रहा था, ऊपर से, जिस बस से हमें पहलगाम के लिए रवाना होना था उसका कहीं अता पता नहीं था। थोड़ी ही देर में पता चला कि कसाब को फांसी की सजा पर अमल किये जाने की संभावित प्रतिक्रिया के मद्देनजर एहतियातन कुछ संवेदनशील इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया था, जिसके कारण बस वाले को रास्ता बदलकर आना पड़ रहा था। देर होने की शायद यही वजह थी। अब तो ठंढ के ऊपर डर के भी ओले पड़ रहे थे।
आखिरकार करीब डेढ़ घंटे की रहस्यमयी प्रतीक्षा के बाद बसें आईं और अनेक प्रकार की आशंकाओं के मध्य हमारी आगे की यात्रा शुरू हुई। दुल्हन के आभूषणों की तरह शिकारों से सुसज्जित डल झील के किनारे हमारे दोपहर के भोजन की व्यवस्था थी, तत्पश्चात पहलगाम के लिए हमारी यात्रा आरम्भ हुई।
दिसंबर का महीना था, सेब के पेड़ों पर फल तो बिल्कुल भी नहीं थे। चीड़ और देवदार के पत्ते भी पीले पड़कर नीचे जमीन पर पसरे हुए इस तरह प्रतीत होते थे मानों सोने का आवरण किसी भूलवश बिखर कर नीचे गिरकर धरती पर पीतवर्णी स्वर्णिम कालीन बन गयी हो। अपनी बाईं ओर कल-कल करती हुई लिद्दर नदी की खिलखिलाहट हमें अज्ञेय के यात्रा वृतांत और उपन्यासों के विवरण से मानों साक्षात् करा रही थी। जगह-जगह उजड़े हुए टेंट और किनारे पसरे घोड़ों के लीद की गंदगी हमें एहसास करा रहे थे कि कितना कुछ बदल गया था ! कभी धरती का स्वर्ग कहीं जाने वाली कश्मीर आज अतीत का एक भुतहा खंडहर प्रतीत हो रही थी।
होटल वाले से पता किया की बर्फबारी होने की कितनी संभावना है ? होटल के प्रबंधक ने जैसे वातावरण को सूंघकर और बादल को निहार कर भविष्यवाणी की कि ‘संभावना तो पूरी बन रही है, बाकी आपलोगों की किस्मत’ !
अगली सुबह नाश्ते के बाद हमारा काफिला गुलमर्ग के लिए प्रस्थान करता है। रास्ते में कितनी ही परित्यक्त कोठियाँ दिखाई पड़ी जो अपनी विपदा की कहानी के साथ सिसकती सी प्रतीत हो रही थीं। तस्वीरें मुकम्मिल करने को एकाध सेव के पेड़ भी मिले, जो कि शायद पर्यटकों के दर्शन हेतु संभवतः बचा कर रखे गए से लग रहे थे।
रास्ते में यदा-कदा रुकते हुए कश्मीरी कहवे का आनंद लेते हुए हम गुलमर्ग की और बढ़ रहे थे। तकरीबन २५-३० किलोमीटर पहले ही मौसम ने रंग बदलना शुरू कर दिया और पर्यटकों के दिलों के अंगार भड़कने शुरू हो गए। जीवन में प्रथम बार बर्फबारी देखने के आनंद का अतिरेक हमारे दल के प्रत्येक सदस्य के दमदमाते चेहरे पर देखा जा सकता था। सारी आशंकाएं छणभऱ में ही काफूर हो गईं। कुछ लोगों ने किराए पर गमबूट और ओवरकोट लिए तो किसी ने दस्ताने और टोपियाँ खरीदीं ।
रास्ते में आहिस्ते-आहिस्ते सफेद फाहे सड़कों के किनारे और गाड़ियों के शीशों पर गिर रहे थे, जिसे हम सभी ने अपने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड भी किया। परंतु असली मजा तो गुलमर्ग पहुँच कर ही आया। ठीक होटल के सामने ज्यों ही बस आकर लगी, हमारे सामान अभी उतारे भी नहीं जा सके थे कि वह बर्फ़बारी शुरू हुई कि मानों आसमान से दिव्य शक्तियाँ एकदम धवल रुई के फाहे समान पंखुड़ियों से हमारा स्वागत कर रही हों ! उम्र की तमाम सीमाओं को दरकिनार करते हुए हम बच्चों की तरह उछल कूद मचाने लगे, एक दूसरे पर बर्फ के गोले बना-बनाकर प्रहार करते और ठहाके लगाते रहे, तब तक, जब तक कि थक कर चूर ना हो गए। देखते ही देखते तकरीबन डेढ़ से दो फीट का एक उजला सा स्तर वहाँ की काली सड़कों को चमकते उजास से भरे स्फटिक से पाट गया। सड़क और मैदान का अंतर भी ख़त्म हो गया। हालाँकि हमारी अग्रिम बुकिंग थी तथापि मौसम को देखते हुए गंडोले की गतिविधि को स्थानीय प्रशाशन ने स्थगित कर दिया था, पर अब उसकी किसको फिक्र थी ! चांदनी रात में बर्फ से लदे चीड़ के पेड़ों को निहारने का स्वर्गिक आनंद रात की पार्टी पर भी भारी पड़ रहा था। पढ़ी गयी पुस्तकों के कई पात्र इन्हीं सफ़ेद पेड़ों पर नर्तन करते हुए मानों मूर्त हो कर एकबार फिर से दिल में उतर रहे थे। कहीं किसी प्रकार का भय व आशंका नहीं थी। ......... थी, तो बस अपरिमित आनंद और उल्लास।
अगली सुबह चटक धूप में गंडोले की सैर और स्कीइंग भी हो गई। बर्फीले मैदान और वन-प्रांतर को देख कर नहीं कह सकते कि इतना सुन्दर इलाका हमारे ही देश में है! हमें तो जैसे आदत सी पड़ गई है जगह-जगह फैले कचरे को देखने की, जिसका यहाँ बर्फ की मोटी परत के कारण नामोंनिशां तक नहीं था। कुदरत के ऐसे अद्भुत नज़ारे को छोड़ कर आने को भला किसका दिल करेगा ! परन्तु समय और संसाधनों का तकाज़ा था, लौटने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। टायरों में जंजीरें कसी गयीं फिसलन से बचाने को और हम वापिसी को तैयार थे इस संकल्प के साथ कि कम से कम एक बार और आना ही होगा भारत के इस मुकुट को निहारने के लिए।
सुनील कुमार झा
नोएडा (उ॰प्र॰)