ससुराल

दुल्हन के वेश में सजी, भरी भरकम जोड़े से ढकी वह गाड़ी में अब अकेली रह गई थी। ननद की बेटी, चुनियाँ, जो रास्ते भर उसे चिकोटी काटती आई थी, वह भी, कब की उतर कर भाग गई थी। राजेश, भला घर के पास, इतने लोगों के सामने अपनी पत्नी के पास कैसे बैठ सकता था ! कितनी तौहीनी की बात होती ! ....... ‘वो देखो, शादी के पहले दिन से ही पत्नी से चिपका बैठा है! क्या ज़माना आ गया है ! जरा भी सब्र नहीं होता !’ ………
कुछ औरतें, कुछ बच्चे, बच्चियाँ कभी-कभी उसे घूंघट में से झाँक भी जाते, बिना उसकी कोई मर्जी जाने! मानों वह कोई सामान हो, उसकी मर्जी का क्या ! हाँ, सबको इस बात की तो जरूर उत्सुकता है कि जाने कि सामान क्या-क्या आया है ! सारे घर वाले भी इसी व्यवस्था में लगे हुए हैं कि सामानों को यथाशीघ्र कायदे से रखा जाये ताकि सभी लोग बिना किसी दिक्कत के देख सकें। ......... आखिर इतना सारा सामान मिला भी तो है। पूरे गाँव में आजतक किसी को भी इतना दहेज़ नहीं मिला होगा! पूरा ट्रक भर कर, हर तरह का सामान दिया था उसके पिता ने। शायद तभी ट्रक के उन सामानों की तो पूछ हो रही थी, मगर मुरझाये, बासी फूलों लटके कार में बैठी नई-नवेली दुल्हन, अपने ससुराल के दरवाजे पर पहुँच कर भी, अभी तक परिक्षण और द्वार छेकाई की रश्म का इंतजार कर रही थी। कोई नहीं था जो उसका हालचाल भी पूछे या जाने कि उसे किसी चीज की जरूरत तो नहीं ......... !

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...