दिये जलायें

आओ मिलकर दिये जलायें,
तम को मन से  दूर भगायें।
रह   जाये  ना कोई  कोना,
अबकी ऐसी अलख  जगायें।

दुनिया का यह कैसा मेला,
लेकर  के हाथों  में थैला,
फिरते   हैं सब  मारे-मारे,
ढूंढ  रहे हैं   बैठ किनारे।

जो   भी चाहे  मोती पाये,
तजकर आलस डूब लगाये।
आओ मिलकर दिये जलायें,
तम को मन  से दूर भगायें।

आनी-जानी   दुनिया फेरा,
किसका घर है किसका  डेरा,
आओ दिल में ज्योति जलायें,
अरमानों    के पंख लगायें।

जो   चाहे  आकर ले  जाये,
मिलजुल कर नवदीप जलाये।
आओ मिलकर  दिये जलायें,
तम  को मन  से दूर भगायें।

रात अमावस की  यह काली,
वरदानों     से भरनेवाली,
साफ-सफाई  का मौसम है,
विजयोल्लास का यह पर्व है।

आओ      तोरणद्वार    बनायें,
सुख-समृद्धि से घर को सजायें।
आओ   मिलकर  दिये जलायें,
तम   को मन  से दूर भगायें।


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