बस यही मत पूछना
पेंशन हेतु लाइफ सर्टिफिकेट अर्थात जीवन प्रमाण-पत्र के लिए संजीत कौर कार्यालय में आई थी, पोपला सा मुस्कुराता चेहरा लिए। अभी दो ही साल हुए हैं उनको अवकाश ग्रहण किये हुए। विदाई समारोह का पूरा दृश्य मन आँखों के सम्मुख ताजा हो आया। खासकर, उनकी बहू की वह स्वीकारोक्ति, जिसमें उसने गलत-फहमी होने की बात स्वीकारी थी और दुबारा ऐसी गलती न होने की कसम खाई थी।
दुआ-सलाम के बाद पूछा, “मैडम कैसी हो, सब कैसा चल रहा है ?”
अपने चिर परिचित अंदाज में गर्मजोशी से उसने जवाब दिया, “सब चंगा है, जी। आपलोगों की दुआएं हैं और रब की मेहर है, किसी चीज की कोई कमी नहीं है जी। अच्छी भली सेहत है, प्रभु कृपा से दाल-रोटी की भी कमी नहीं है।“
बेटे-बहू ठीक से रखते हैं? लगे हाथों पूछ ही लिया।
“बस यही मत पूछना! बाकी सब ठीक है। “
मुस्कुरा वह तब भी रही थी, मगर उसके पीछे के आँसू छुप कहाँ रहे थे!