❆ समय ❆
रे समय, तू भागता कहाँ है, छोड़कर मुझको इस समर में
ले चल, मुझको भी साथ, मत छोड़ अकेला इस समुंदर में
देखे हैं, कितने ही खेल निराले, इस जगत में जाने-अनजाने
झूठे सारे रिश्ते-नाते, आडम्बर हैं चाल-चलन नये या पुराने।
तू ही कर्ता-धर्ता है, और सच क्या है, एकमात्र तू ही जानता है
कर्म भी उसी का फलता है जग में, जो समय को पहचानता है।
छोड़ हमें बीच मँझधार में, रण से भागकर कहाँ तू सोता है
बाकी है काम अभी, इसीलिए प्रतिदिन तुम्हारा आना होता है।
देखा नहीं, पेशानी पर अपने, रेखाएं कितनी मैंने खींच रखी हैं
बंजरों में बाग लगाये, अभेद्य चट्टानें कितनी ही दरका रखी हैं।
किंतु अब जी घबराता है, मौसम यहाँ का बदलने लगा है
मजदूर भूख से मरता है, किसान आत्महत्या करने लगा है।
रे समय, तू भागता कहाँ है, छोड़कर मुझको इस समर में
ले चल, मुझको भी साथ, मत छोड़ अकेला इस समुंदर में
देखे हैं, कितने ही खेल निराले, इस जगत में जाने-अनजाने
झूठे सारे रिश्ते-नाते, आडम्बर हैं चाल-चलन नये या पुराने।
तू ही कर्ता-धर्ता है, और सच क्या है, एकमात्र तू ही जानता है
कर्म भी उसी का फलता है जग में, जो समय को पहचानता है।
छोड़ हमें बीच मँझधार में, रण से भागकर कहाँ तू सोता है
बाकी है काम अभी, इसीलिए प्रतिदिन तुम्हारा आना होता है।
देखा नहीं, पेशानी पर अपने, रेखाएं कितनी मैंने खींच रखी हैं
बंजरों में बाग लगाये, अभेद्य चट्टानें कितनी ही दरका रखी हैं।
किंतु अब जी घबराता है, मौसम यहाँ का बदलने लगा है
मजदूर भूख से मरता है, किसान आत्महत्या करने लगा है।