कभी नरम - कभी गरम
मेट्रो में दाखिल होते ही उस अधेड़ सज्जन ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित सीट पर बैठे युवकों की ओर अजीब दृष्टि से देखा, मानों उससे खड़ा होना भी दूभर हो रहा हो। दोनों में से एक ज्यादा ही शातिर निकला! उसने नजरें मिलाई ही नहीं और आँखें बंद कर सोने का दिखावा करने लगा। दूसरा बर्दाश्त नहीं कर पाया और सीट खाली कर दी। व्यक्ति आराम से मोबाइल से खेलने लगा।
गंतव्य स्टेशन आते ही वही व्यक्ति लगभग दौड़ता हुआ सा सभी को पीछे छोड़ता हुआ निकास द्वार की ओर सबसे पहले निकलने के लिए भाग रहा था।
मेट्रो में दाखिल होते ही उस अधेड़ सज्जन ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित सीट पर बैठे युवकों की ओर अजीब दृष्टि से देखा, मानों उससे खड़ा होना भी दूभर हो रहा हो। दोनों में से एक ज्यादा ही शातिर निकला! उसने नजरें मिलाई ही नहीं और आँखें बंद कर सोने का दिखावा करने लगा। दूसरा बर्दाश्त नहीं कर पाया और सीट खाली कर दी। व्यक्ति आराम से मोबाइल से खेलने लगा।
गंतव्य स्टेशन आते ही वही व्यक्ति लगभग दौड़ता हुआ सा सभी को पीछे छोड़ता हुआ निकास द्वार की ओर सबसे पहले निकलने के लिए भाग रहा था।