नूतन वर्षाभिनंदन 2020

अलविदा 2019
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जा रहे हो छोड़कर
तुम भी तो आज मुझे!
साथ तुम्हारे कितनी जल्दी
हो जाता है अनुबंध पूरा!
एक वर्ष का समय अल्प
लगता हमेशा मुझे अधूरा।
था मालूम, दिन यह आयेगा
पर मैं तैयार न था।
जा रहे तुम भी उसी तरह
संख्या एक आगे सरकाकर।
जीवन से एक घटाकर
आओ हम भी खुशी मनायें
गिले-शिकवे भूलकर सारे
बार-बार यही दुहरायें
अलविदा प्यारे 2019
हैप्पी न्यू ईयर 2020
💐💐💐💐💐💐

बैकपैक से प्यार - हिंदी हास्य कविता (Backpack - Hindi Humorous Poetry)

बैकपैक

देख लिये जब बीवी के नखरे
जग में सहकर कष्ट हजार,
हो गया है अब तो मुझको
अपने बैकपैक से प्यार।

पीठ पर डालो अथवा रखना
बनाकर अपने गले का हार,
उफ न करती साथ निभाती
सहती रहती जुल्म अपार।

अरी बीवियों तुम क्या जानो
कैसे चलता है घरबार,
ले लो सीख चाहे थोड़ा ही
देखकर बैकपैक को यार।

त्याग समर्पण की पराकष्ठा
कितना अद्भुत यह संसार,
उफ न कर सकता है कोई
चाहे कितना हो अत्याचार।

उठापटक से बेखबर वह
कभी न देती है दुत्कार,
बीवी के ताने और उलाहने
अक्सर करते शर्मसार।

'मूड नहीं' का इलाज कहाँ है
हकीम लुकमान चुके हैं हार,
साथ निभाती बिना शर्त है
बैकपैक अपनी हाट-बजार।

मामा, ताऊ, फूफा सबके सब
डर से फटक न पाते द्वार,
डाल बैकपैक पीठ पर भैया
हम तो चला रहे कारोबार।

पत्नी के संग जब निकलो
ढोना सूटकेस का अति भार,
बैकपैक में डाल के चंद
मर्जी से लूटो मौज-ए-बहार।

कृष्ण कन्हैया जो मैं, वह भी राधा रानी
खेल रही बरसाने की है वह तो लट्ठमार,
कृष्ण सुदामा के सदृश दु:ख-सुख में
गले लगाती बैकपैक ही तो हरबार।

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लघुकथा : आत्मनिष्ठ

https://youtu.be/CA1QzvNo71M

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लघुकथा - दो रोटी का रिश्ता

दो रोटी का रिश्ता

कुछ भी बिना बोले पत्नी खाना रखकर चली गई। सामने पड़ी रोटी को देखते हुए रमेश बाबू कहीं खो से गए। जब से सेवा निवृत होकर घर बैठे हैं, अक्सर ऐसा ही होता। आलोचना और प्रतिवादों से बचने के लिए दोनों ने ही चुप्पी को हथियार बना रखा है। पूरे समय दोनों एक-दूसरे के बारे में सोचते रहते पर बातें नहीं करते। अगर कोई बात होती भी तो कड़वाहट और उलाहनों से भरी हुई। शब्द नहीं, हड्डियों तक को बेधने की क्षमता रखने वाले शब्द-बाण चलते। समाधान तो कुछ भी नहीं निकलता, गलतफहमियाँ बढ़ती जातीं।
‘वाह री किस्मत, जिस रोटी के लिए जीवन भर जुते रहे, आज वही सम्मुख मानों मुँह चिढ़ा रही है।’ जब समय का कतई अभाव नहीं है, भावों की तंगी से पत्नी के साथ उनका रिश्ता ही बस दो वक्त की रोटी भर का होकर रह गया है, जैसे।

साफ-सफाई

तन की कितनी साफ-सफाई
मन को कौन अब पूछे है भाई
बंधन के कितने ही  टूटे ताले
पड़े हुए लेकिन मन पर जाले

चाहे कितने भी तू यंत्र लगा ले
भला बहुत हो जो तू चैन जगा ले
बेचैनी के जालों का लेकिन
इलाज कहाँ हुआ है मुमकिन

कितना कुछ तो जुटा लिया है
उससे भी अधिक गँवा दिया है
दिखता नहीं है साफ दिखाई 
कहो भला फिर कैसी सफाई

जानें कितनी सदियाँ बीतीं
दादी अम्माँ घर को धोतीं
मगर कहानी वही पुरानी
मकड़े ने भी हठ  है ठानी

कर ले जिसको जो करना है
जैसा किया वैसा ही भरना है
होगी जब मन की सफाई

तभी पड़ेगा सत्य दिखाई

लघुकथा - उल्टा हिसाब

लघुकथा - उल्टा हिसाब

शहर में श्रीयुत श्री श्री १०८ परमानंद अच्युतवर्धन निःशेष महाराज के पुण्य प्रवचन का आयोजन होने वाला था। शहर भर में इस आयोजन की धूम मची हुई थी। मोहल्ले की पड़ोसनों से सुनकर लीलावती को भी लगा कि एक दिन स्वामीजी के प्रवचन सुनने के लिए पति के साथ जाना ही चाहिए। मामला धर्म-कर्म से बढ़ कर सामाजिक असर-रसूख का बन गया था शायद! पत्नी की जिद के आगे शंकर और विष्णु की न चली तो आलोकनाथजी की क्या बिसात भला !

संपर्क सूत्र तलाशे, बड़े चढ़ावे की बात स्वीकारी तब कहीं जाकर बुकिंग हो पाई। अगली पंक्ति में सोफे पर पत्नी सहित जब विराजमान हुए तो कुछ ऐसा ही एहसास हो रहा था जैसे जीवन सफल हो गया हो। खासकर जब पत्नी की आँखों में गर्व का भाव देखा तो लेन-देन का सारा दुःख जाता रहा।

स्वामीजी के दर्शन पाते ही सभास्थल तालियों से गूँज उठी। लोग जयकारे लगाने लगे। स्वामीजी का प्रवचन शुरू हुआ। अपनी सशक्त वाणी से स्वामीजी ने इस दुनिया को माया और सम्पत्ति को कंकर-पत्थर साबित कर दिया।

घर लौटते हुए लीलावतीजी सन्यास की मुद्रा में ऊब-डूब हो रही थीं और आलोकनाथजी उल्टे सौदे की गहन पड़ताल कर रहे थे !

लघुकथा - जोगी

लघुकथा : जोगी 

“आ रे जोगी ले बननवा तो कइ लय रे मुलाकात ...... की रे की। आ रे जोगी ले बननवा तो बहिनियों ना चीन्हि रे की । ...... रीं … रीं ..... रीं” जैसे सारंगी भी उस युवा जोगी के साथ मिलकर बिलख-बिलख कर रो रहा हो। आम तौर पर इसके बाद गज के घुंघरुओं से आने वाली ‘झम्मक … झम्मक ...... झम्मक-झम्म’ की आवाज को बड़ी सफाई से जोगी ने अपनी सधी उँगलियों से पकड़ कर बंद कर रखा था। कहीं ऐसा न हो कि घुंघरू उदासी के बादलों को घनीभूत होने में बाधक बन जाये। प्रतीत हो रहा था, किसी बीते हुए काल खंड से दुःख की काली घटा मूर्तिमान होकर उस जोगी की दर्दभरी आवाज के साथ एकाकार होकर पूर्णता को प्राप्त होना चाह रही हो। जैसे गुरु गोरखनाथ के आदेश से आज ही राजा भरथरी रानी से भीख मांगने आये हों, जिसके बिना उनके सन्यास की दीक्षा अधूरी ही रहनी थी।

“दुखवा लय रे बेरिया बेटा पाल लय रे पास … … आज सुखवा लय समइया रे निखरि के बन लय जोगी रे की ...... रीं … रीं ..... रीं”। जोगी जिस खाट पर बैठकर गाये जा रहा था, उसके चारों ओर नीचे औरतें घेर कर बैठ गई थीं। कुछ खड़े-खड़े ही अपने दुपट्टे या साड़ी के पल्लू को बार-बार अपनी उँगलियों से इस तरह लपेट रही थीं मानों अपने प्रियतम को बांध कर सहेज लेना चाह रही हों। ..... ‘ना ..... चाहे कुछ भी हो जाये उनको जोगी नहीं बनने देगी।’ गर्मी भी आज अपने जोर आजमा रही है। कोई पसीने के बहाने अपनी आँखों के गीले हो आये कोरों को उँगलियों के पोरों से जाँच रही हैं या सुखा रही हैं, मगर इस भाव से कि कोई उसे पकड़ न पाए। परन्तु जल्दी ही यह संकोच भी ख़त्म हो गया जब लगा कि तक़रीबन सभी का वही हाल है। पीछे खड़े मर्द जो अबतक जोगी के प्रति अपनी जनानियों की आसक्ति से किंचित उखड़े से लग रहे थे, अब शनैः शनैः खींचे से चले आने लगे हैं।

किसी से खबर पाकर रहीमू चाचा भी अपनी लुंगी को आगे से उठाये हुए चले आ रहे हैं। किसी ने हिल-डुलकर तो किसी ने खड़े होकर उनके लिए आगे, ठीक जोगी के सामने जाने तक रास्ता बनाया। आखिर गाँव के सरपंच ठहरे। होंठों के स्पंदन से ही सही, लेकिन पैंसठ वर्ष के चचाजान भी अपने को उस बाइस-चौबीस के जोगी का अभिवादन करने अपने को रोक न सके। जोगी ने बगैर सुर बिगाड़े आँखों ही आँखों से उनको उसी खाट पर बैठने का इशारा किया। अब तो जैसे दर्द और भी गहरा गया था। मुखड़े के साथ आधा “ह” का मिश्रण कर जैसे एक छोटी सी हिचकी भी जुड़ने लगी। रहीमू चाचा भी लुंगी को रुमाल बनाकर आँखें पोंछने लगे। जोगी अंतरे की समाप्ति पर टेक के साथ ही अगल-बगल पड़ने वाले प्रभाव की भी बखूबी जाँच कर रहा था।

“चिठिया लय कोई कागजबा बाँचि लय सुनाई मइया कोई रे की … … आ ई ब्रह्म के लिखनवाँ कोई ना रे बाँचि रे की ...... रीं … रीं ..... रीं”। लग रहा है, पूरा गाँव ही जैसे जोगी के दर्द में डूब सा गया हो। बस नादान बच्चों को ही समझ में नहीं आ रहा था कि ‘अचानक यह क्या हो गया ‘! कुदसिया ने झपटकर कलिमवाँ को गोद में उठा लिया जो टुअर की तरह कभी जोगी तो कभी पीछे बैठी नाक सुड़कती महिलाओं को अजीब सी निगाहों से देख रहा था। कहीं से एक हाथ पंखा कुदसिया के हाथ से आ लगा। उसे समझ में न आया क्या करे। गर्मी तो थी ही। जोगी को बढ़ा दे ! लेकिन बिचारे के तो दोनों ही हाथ सारंगी और गज में इस तरह व्यस्त हैं कि दो-चार और भी होते तो दर्द की गहराई और भी बढ़ा लेता। दो-चार बार खुद के चेहरे पर पहले फेर लिए, शायद लोकलज्जा का ख्याल किया, फिर जोगी को झलने लगी। पुनः सचेतन हुई और पंखा रहीमू चचा को बढ़ा दिया। कलिमवाँ ससर रहा था, कमर से ही झटका देकर उसे छाती के पास कर लिया और जोर से भींच लिया। …. कौन सी अभागिन होगी जो अपने कलेजे को टुकड़े को जोगी बनने दे। कलिमवाँ बेचारा अकबक सा हो रहा। चचा के बूढ़े हाथ अधिक देर तक पंखे को न हिला सके और गति सुस्त होकर विराम की अपेक्षा करने लगे। पंखा एक दो हाथों से गुजर पुनः कुदसिया के हाथ पहुँच गया। उससे भी न रहा गया। जोर-जोर से पंखे को झलने लगी ताकि जोगी और खुद को भी सुकून मिले। बीच-बीच में तंद्रा टूट जाने पर रहीमू चचा की ओर भी पंखे का रुख कर देती।

“आज छूटलय कूल परिवार की रे की …. …. आ ई जोगी रे बननवाँ …. …. “। अब कई दिनों तक जोगी की रिश्तेदारी की चर्चा चलेगी। ‘जरूर किसी आस-पास के गाँव से ही किसी का बच्चा रहा होगा। कहते हैं बिना माई से भीख लिए पूरा जोगी नहीं बनता।’

“आ ई बीते रे जिन्दगानियाँ रे की रे की … … आ रे चीन्हले सब लोगवासे गइले रे भुलाई … …” गेरुए वस्त्र में जोगी मुसलमान बस्ती में उनके ही खाट पर बैठकर अपनी दर्दभरी आवाज से वहाँ मौजूद सभी को रुला रहा है। इसी क्रम में न जाने कितने रिश्ते बन और बिगड़ रहे हैं। थककर जब जोगी सारंगी को विश्राम देगा तो उन्हीं गरीब घरों से जो भी मिलेगा उसे बड़े प्यार से अपने चादर में समेटेगा और चल देगा अगले पड़ाव की ओर। उसके पंथ में और भूख में भी हिंदू और मुसलमान का कोई विभेद नहीं। बस, मइया है और जोगी है और हैं बाबा गोरखनाथ !
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लघुकथा - प्रसव पीड़ा

विषय - प्रसव पीड़ा

रात से ही झिंगुरिया का दर्द बढ़ता जा रहा था। पल-पल उसकी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। मगर घरवालों की निर्लिप्तता उसकी बेचैनी को और भी बढ़ा रही थी।उसका मरद हमेशा की तरह खेत में काम करने के लिये जाने की तैयारी में जुटा हुआ था। सास-ससुर ने सुना तो एक दूसरे की ओर कनखियों से मुस्कुराते हुए देखा।

"लगता है इस बार लड़का ही होगा। इतनी जल्दबाज़ी पुरुषों को ही होती है। स्त्री जाति तो गर्भ से ही धीरज और अनुशासन सीखकर आती है। डॉक्टरनी के हिसाब से तो अभी कम से कम बीस से पच्चीस दिन देर है।" इसके साथ दोनों ही अनुभवी बुजुर्गों ने न जाने कितने ही किस्से दुहरा डाले, जब समय पूर्व प्रसव में लड़का होना पाया गया था।

इतिहास और सपने की दुनिया से बाहर निकल जबतक झिंगुरिया का ख्याल आता … !

भरोसे का सवाल - एक विचार

भरोसे का सवाल

पिछले दो महीने से देखा रहा था, नई व्यवस्था के तहत प्रतिदिन सात से दस बजे के बीच कूड़े वाली गाड़ी लाऊड-स्पीकर बजाती हुई आती। परन्तु इस मुहल्ले के लोग भी कितने अजीब हैं ! वे अपने पुराने ठेले-वाले (कूड़ा लेने वाले) का साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं !

वे ही महिलायें जो हर महीने उस कचरे वाले से पैसे के नाम पर महाभारत छेड़ा करती थीं, कभी पैसे बढ़ाने के नाम पर तो कभी ‘नागा’ करने को लेकर ! अब इस वाकयुद्ध में एक धमकी और शामिल हो गई, 
 - 'इससे तो बढ़िया गाडी वाले को ही न देना शुरू कर दूँ !’ 
मगर अधिकांश इस शुरुआत को करने से झिझक रही थीं। 
 - ‘अब कूड़ा रोज उठाकर गाड़ी में फेंकने की जहमत कौन उठाये ! यह कम-से-कम दरवाजे पर से उठा तो ले जाता है। ...... और फिर, कम या ज्यादा, पैसे तो उसे भी देने ही पड़ेंगे। क्या पता, कुछ दिनों के बाद बंद ही कर दे तो यह वाला तो और भी भाव खाने लगेगा। ऐसी स्थिति अगर आ ही गई तो नई व्यवस्था कैसी होगी, किसे पता !’ 

घर के मामले में पतियों का हस्तक्षेप जरा भी बर्दाश्त नहीं करने वाली महिलाओं ने भी इस अतिसंवेदनशील मुद्दे पर उनसे सलाह मशविरा किया। समझदार पतियों ने बड़ी सफाई से अपनी गर्दन बचाई, यह कहते हुए कि “ठीक ही कह रही हो, सरकारी काम का क्या भरोसा ! वैसे, तुम जो भी ठीक समझो।“

सरकारी व्यवस्था पर यह संदेह इसलिए भी गहरा हो जाता है, जब लाऊड-स्पीकर पर यह घोषणा की जाती है कि “गीले और सूखे कूड़े को अलग-अलग करना आपकी जिम्मेदारी है। सूखे कूड़े को नीले रंग के कूड़ेदान में और गीले कचरे को हरे रंग के कचरेदान में रखना आवश्यक है । कूड़े को जलाना, या इधर-उधर फैलाना दंडनीय अपराध है।” लब्बो-लुबाब यह कि कूड़ा निष्तारण में जनता की भूमिका और जिम्मेदारियाँ तो याद दिलाई जाती हैं पर एक बार भी भरोसा नहीं दिलाया जाता कि अगर किसी दिन वे आयें ही नहीं तो क्या व्यवस्था होगी ? उसकी गाड़ी में तो गीले और सूखे कचरे अलग लेने की व्यवस्था ही नहीं! ठीक उसी तरह, जैसे एक आम आदमी तो अनुज्ञप्ति लेकर वाहन चलाये, ट्रैफिक के नियमों का पालन करे। उल्लघन पर दंड की व्यवस्था की गई है। परंतु व्यवस्था करने वाले अगर अपने दायित्व का वहन करने में असफल रहते हैं, यथा, संकेतक ख़राब हों, टूटे हों या सड़क पर गड्ढे ही पड़ जाएँ, जिसमें गिरकर चाहे किसी की जान ही चली जाए, तो कोई भी दंड का भागी नहीं होता ! ...... कब तक चलता रहेगा इसी तरह ! ....... तो फिर कहाँ से आये भरोसा !

होली गीत

होली गीत 

सुबह सवेरे कान्हा पुकारे
ग्वाल-बाल सब संग
बालवृंद संग मिलकर गाएँ
सब पर चढ़ी तरंग।
होली खेले गोपिन बृज की
लट्ठ लेकर भारी
छेड़-छाड़ का मजा चुकाती
देती चुन कर गारी
होली खेलें गिरधारी जो
सब जन होते दंग।
कृष्ण हाथ पिचकारी भारी
राधा हाथ गुलाल
भीगी चुनरी संग अंगिया
भई लाज से लाल
श्याम रंग है बड़ा अजूबा
चढ़े न दूजा रंग।
होली खेलें माता गौरी
शिव पर भष्म उड़ाय
साँप भरे फुँफकार सखी हे
चंदा मन मुस्काय
नंदी बाबा लोट-पोट हैं
पीकर कितना भंग।
सियाराम संग मिथिलावासी
गायें गीत मिठास
घूँघट से झाँक रहीं नारी
करती हैं परिहास
रंगोत्सव है यह तो अद्भुत
आये देख अनंग।

अश्रु-तर्पण

अश्रु-तर्पण

दादी के देहावसान की खबर देवदत्त को बिलकुल भी अप्रत्याशित नहीं लगी। पिछले कुछ दिनों से जैसे घर भर को इसी का इंतजार था। वैसे, मौत किसी की भी हो, तकलीफ तो होती ही है ! और फिर यह तो अपनी दादी का मामला था, जो उसे बहुत प्रिय थी।

उम्र नब्बे से कम तो बिल्कुल भी नहीं। कूल्हे की हड्डी चटख जाने से बिछावन पर ही पड़ी रहती थी। उस पर से वह सात बेटों की माँ ठहरी। बेटों में से कई तो अवकाश प्राप्त कर घर वापसी कर चुके थे। यह अलग बात है कि पूर्व में, मंझला (दूसरे क्रम वाला) बेटा, जो कि राज्य पुलिस में सिपाही था, कहा करता था कि सेवा से अवकाश के बाद वह घर-गृहस्थी संभाल लेगा, लंगर-भेड़ें (पूंछों वाली भेड़ों की प्रजाति) पालेगा, माता-पिता की सेवा करेगा और भी न जाने क्या-क्या ! गृहस्थी तो खूब संभाली, एक की सात कर दी। “अच्छा हुआ, ऐसी बिखरी हुई गिरस्ती देखने से पहले ही वे स्वर्ग सिधार गए। करमजली मैं ही रह गई थी ऐसे दुर्दिन देखने को ! अपना-अपना भोग है, भोगना ही पड़ेगा।” जोगरानी देवी कहती हुई आत्मा से बिलख पड़ती।

वह भी जानता था और सभी परिजन भी कि दिल्ली से वहाँ तक पहुँचने में डेढ़ दिन से काम न लगेंगे। वह भी तब, जब गाड़ी सीधी उसकी मर्जी से खुले, चले और पहुंचे। दिल्ली से बिहार के सुदूर हिस्से के लिए जाने वाली गाड़ियों की हालत तो कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। जरूरत पर आरक्षण मिलने का तो सवाल ही नहीं और सामान्य डिब्बे में तिल भर धरने को जगह नहीं। तब तक मिट्टी (लाश) को घर पर रखना उचित नहीं होगा। यह बात दीगर थी कि बाप की मृत्यु के बाद एक खूँट का वारिस तो वह था, लेकिन पोते के लिए दादी की लाश को रोके रखना कहीं से भी व्यावहारिक नहीं थी।

मुश्किल से एक महीने हुए होंगे, जब वह दादी को मिलने पत्नी सुजाता सहित गया था। उनकी खाट पर बैठकर, फूट-फूटकर कर रोया था, जबकि उसकी पत्नी देवरानियों के साथ इधर-उधर के हाल-चाल लेने में व्यस्त थी। दादी ने कहा था, “आत्मा में तकलीफ है”। जीने की लालसा समाप्त हो चुकी थी। छोटी चाची कुछ खिलाने -पिलाने को जोर डालती तो भरपूर गालियाँ देती। देवरानियों की मंडली सहित जैसे ही सुजाता पहुँची तो दादी ने कहा था, “मुझसे मिलने आई थी कि अपनी बहनों से! ख़ैर कोई बात नहीं, देखो मेरा पोता, मेरा अपना, कलेजे का टुकड़ा, मेरे लिए कितना रोया!

शायद पोते से अश्रु-तर्पण पाकर दादी की आत्मा तृप्त  हो गई थी, इसीलिए आज उनकी मृत्यु की खबर, मुक्ति की खबर बनकर रह गई।

भाग - 2

पति की मृत्यु के बाद घर संभाल नहीं पाईं जोगरानी देवी। एक आँगन, एक चूल्हा, जिसकी मिसालें दी जाती थीं जिले-जवार में, बिखर गया। ऐसा लगा, मानों बेटे-बहू इसी दिन का इंतजार कर रहे थे।

सभी को लग रहा था, ‘संयुक्त परिवार को चलाने की जिम्मेदारी अकेले उनके ही कंधों पर क्यों रहे’! किसी को लग रहा था, ‘मेरा परिवार छोटा है, बँटवारा हो जाये तो वारे-न्यारे हो जाएँ’। किसी को लगता, ‘हमारी कमाई से ही घर चले और मर्जी से भोजन तक नहीं मिले’! ‘चाय, दूध, साबुन-तेल अपना ही करना है तो एक घर का राग अलापने का क्या लाभ’!

जिस तरह जीभ के चटोरे स्वास्थ्य के हित-अनहित को भूल जाते हैं; उसी तरह संयुक्त परिवार के लाभ को पूरी तरह से बिसर सातों बेटे अपने-अपने नफा-नुकसान की सोच रहे थे। एक बार भी नहीं याद आ रहा था कि पत्नी, बच्चों की बर-बीमारी से पूरी तरह बेफिक्र होकर वे बाहर रह कर कमाई करते रहे। शायद ही कभी ऐसा अवसर आया हो जब कोई बच्चा बीमार पड़ा हो और उसका इलाज कराने के लिए बाप को छुट्टियाँ करनी पड़ी हो या किसी बहू को प्रसव के लिए या उसके उपरांत आराम के लिए मायके की शरण लेनी पड़ी हो ! बच्चों के पाठशाला या महाविद्यालय में दाखिले का सवाल हो, उनकी पुस्तकों का जुगाड़ हो, बेटियों की शादी के लिए लड़का ढूँढना हो और सबसे बढ़कर अगर किसी की बाहर में किसी से ठन गई हो तो, पता ही नहीं चल पाता किसकी समस्या थी और किसने समाधान कर दिया।

वैसे, बूढ़े मालिक अर्थात् काका जी, जोगरानी देवी के पति को बाहर और घर के लोग क्रमशः इन्हीं नामों से पुकारते थे, को अंदरखाने चल रही इस विघटन का अंदाजा हो गया था। शायद इन्हीं अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाने के प्रयास में उलझ कर रक्तचाप का शिकार हो गये। कुछ दिनों तक बहुत तीमारदारी हुई, फिर धीरे-धीरे संस्कारों को बोझ हल्का होना शुरू हो गया और बूढ़े मालिक, जिनके रौब का लोहा सारे कुटुंब मानते थे, इलाज के लिए अपने ही संसाधनों के मुहताज हो गये। एक ऐसी अवस्था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की थी। नतीजा हुआ कि उन्होंने दवाएं लेनी बंद कर दीं। जोगरानी देवी समझातीं तो बुरी तरह झिड़क देते। और एक दिन, चलते-फिरते ही, बल्कि काम-काज करते हुए, गेहूँ की भूसियाँ उड़ाते हुए, खाँसी का एक दौरा पड़ा और  आतंरिक श्राव के कारण बूढ़े मालिक सबसे बड़े मालिक से मिलने को प्रस्थान कर गए।

भाग - 3

पति की मृत्यु के उपरांत सदमे से उबरने में देवरानी देवी ने बहुत वक्त नहीं लगाया। भरा-पूरा घरबार तो था ही, पुत्रों, पुत्रवधुओं, पोतों, पोतियों से भरे घर में उनका मान और भी बढ़ गया था। शाम के वक्त उनके सिरहाने मानों मजमा सा लग जाता था। कभी किसी को लाड़ कर देतीं, कभी किसी को फटकार देतीं। जैसे उनके पास खुशियों का कोई खजाना छुपा होता था, जो भी आ गया निहाल हो गया।

ज्यादा दिन नहीं लगा, दो-एक बेटों को चूल्हा-चौका अलग करने की जल्दी सवार हो गई। शायद पाप सभी के मन में था, कोई अधिक मुखर था तो कोई लोक-लज्जा के भय से थोड़ा संकोच कर रहा था। यहाँ तक कि देवरानी देवी ने भी दम दिखा दिया और एक हिस्से का दावा कर दिया। पंचों को हँकार दिया गया और फिर बंदर-बाँट शुरू हुआ। कभी मोल-भाव से तो कभी गुल्ली-पेल किया गया। आठवाँ भाग तो नहीं मगर देवरानी देवी के हिस्से में आया पाँच कट्ठे का एक खेत जो कि उनकी मृत्यु के बाद उनके सबसे छोटे बेटे को और एक कमरा जो कि मृत्यु पश्चात् मंझले को मिलना तय हुआ। पठारी इलाके की बिखरी हुई जोत, अगर सात नहीं तो हर खेत में कम से कम तीन से चार मेड़ें पड़ ही गईं। बड़े बेटे ने उनके भोजन भात की जिम्मेदारी ली। चौथे क्रम के बेटे ने, जो कि नौकरी के सिलसिले में दूर शहर में नौकरी कर रहा था, अपने बड़े बेटे की पढाई छुड़ाकर हिस्सा लेने के लिए घर भेजना श्रेयस्कर समझा।

बहुत शोर-शराबे के साथ चला यह बँटवारे का मामला भी शांत होने को आ ही चला था कि बकरी की रस्सी में फंसकर देवरानी देवी गिर पड़ीं और कूल्हे की हड्डी चटख गई। बड़के ने पुत्र धर्म का निर्वहन किया और इलाज व सेव्-सुश्रुषा में किसी प्रकार की कोताही नहीं की। परन्तु वह, या तो पकी उम्र में अपने बढ़ते रुतबे को शायद पचा नहीं पा रही थी या सही में ऐसा ही होता होगा, बुढ़ापे में बचपना आने लगता है, किसी तरह महीना भर प्लास्टर में रही और हटाने की जिद करने लगी। एकदिन बेटे की अनुपस्थिति में अपनी देवरानी के बेटे को बुला लिया जो झोला छाप डॉक्टरी करता था और पत्थर से हो रहे पैर पर पड़ रहे मनों के बोझ से छुटकारा पा लिया। नतीजा हुआ कि कुछ दिनों के बाद किसी तरह से अपनी अदम्य जिजीविषा के दम पर लाठी के सहारे खड़ी तो हो गई पर दाहिने पैर की शक्ति जाती रही। दर्द और मालिश का कभी न छूटने वाला साथ होकर रह गया।

भाग - 4

नवें दिन देवदत्त ने दिल्ली से पूर्व एक्सप्रेस से अपनी यात्रा प्रारम्भ की। सोचा था ग्यारह से बारह बजे तक गाँव पहुँच जायेगा, फिर हजामत बाल भी हो जायेगा। परंतु जब पटना सिटी में ही ग्यारह बज गए तो उसने अपना रेजर निकाला और बेसिन के पास चला गया और खुद से ही धीरे-धीरे बाल बनाने लगा। वह जानता था अगर कल की तिथि में किसी ने उसे बालों सहित देख लिया तो एक नया ही मोर्चा खुल जायेगा और मुकाबले की स्थिति में वह बिलकुल भी नहीं था। परंतु खुद से बाल बनाने का उसका निर्णय शायद पाखंड के खिलाफ उसका पहला मोर्चा था जो बाहर से तो किसी को नहीं दीख रहा था पर आने वाले दिनों में महती भूमिका निभाने वाला था। वह सोच रहा था लोग पूछेंगे, ‘चलती गाड़ी में छौर-कर्म कैसे करा लिया’? ‘दनकौर स्टेशन पर गाड़ी डेढ़ घंटे के लिए रुकी हुई थी, वहीँ प्लेटफॉर्म के ठीक पीछे नाइ था, दौड़कर यह काम करा लिया। सोचा देर हो ही रही है।’ अपने संभावित उत्तर को लेकर वह आश्वस्त हो गया था।

शाम ढले ही वह गाँव पहुँच सका। एकदम जश्न का सा माहौल था। अपने हिस्से के रूपये जाते ही चाचा के जिम्मे लगाए। ऐसा लगा मानों अब जाकर दादी का कर्ज उतर गया।

सात चूल्हों में बँटवारे के बाद परिवार में वह दम तो नहीं रह गया था, पर दिखावा भरपूर किया गया कि काका जी से कम धूम-धाम न हो क्रिया-कर्म में। पंच मेल मिठाइयाँ बनीं। गोदान समेत पंडित और महापात्र की भरपूर खातिरदारी की गई। दशकर्म के दिन से लेकर तेरहवीं तक भरपूर तमाशा हुआ। हर बात पर यही होता था कि काका जी का तो इस तरह से हुआ था। मरने के बावजूद भी पति की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही थीं देवरानी देवी।

आज मृतका की हर छोटी-बड़ी इच्छा का ध्यान रखा जा रहा था। वहीँ, जब शय्या-संगिनी हुई थी, किसी ने भी यह जानने की चेष्टा नहीं की कि उनकी आत्मा को कौन सा कष्ट था ! बहुएं सेवा का पुण्य प्रताप लूट रही थीं। साफ़-सफाई कर के नहा धोकर आँगन में बैठ जातीं बताने को कि जितनी सेवा उनकी हो रही थी, उतनी गाँव में किसी की नहीं हुई। किसी को भी यह ख्याल नहीं आ रहा था कि एक व्हील चेयर और शौचालय बन जाने से उनके आत्म सम्मान की कितनी रक्षा हो सकती थी।


आज़ादी

★ सरसी छंद ★

सीमित है यह धरती अपनी
                             छोटा   है   संसार।
है अनंत आकाश यहाँ पर
                            अद्भुत   कारोबार।।
निस्सीम गगन में ही होती है
                            पंछी  की पहचान।
जैसे   मस्त   बजती  बाँसुरी
                            खींच सुरों की तान।।
भरकर उड़ान  सबसे  ऊँची
                            नापें   नभ   विस्तार।
खग कुल की पहचान यही है
                            छोटा  सा   घरबार।।
आश्रय मगर उन्हें चाहिए
                            लेने   को   विश्राम।
छोटा सा एक घोंसला हो
                            जहाँ  करे  आराम।।
आज़ादी के परवाने हम
                           मतवाली   है  चाल।
बंधन कब हैं हमें सुहाते
                           खटके यही सवाल।।

लघुकथा : रंग में भंग

रंग में भंग

जी हाँ, अपने ही देश में इस तरह भी कभी बारात जाती थी और क्या पता कि दूर-दराज में अभी भी जा रही हो! साइकिल, स्कूटर, मोटरसाइकिल, बस, मिनी-बस या ट्रैक्टर में ऊपर-नीचे लद-फंदकर। कुछ और पहले जाएँ, तो बग्घी, घोड़े और बैलगाड़ी भी।

ऐसी ही एक बारात में एक गहन अंधेरी रात में एक बारात महफ़िल सजाये बैठी थी। नाच चल रहा था। एक-से-एक रस भरे गाने और उसपर बसदेवा का चौकीतोड़ नाच जैसे साक्षात् अप्सरा विश्वामित्र को रिझाने धरती पर उतर आई हो। उसके दीवानों की कोई कमी न थी। सारे रसिक, रस-मर्मज्ञ दीवानों की तरह हर थाप पर झूम से रहे थे।  पेट्रोमैक्स या जेनरेटर की रोशनी और लाऊड स्पीकर की चीखती आवाज़ सुन आस-पास के लौंडे-लपाड़े भी अनामंत्रित ही आ जुटे थे। शामियाने के बाहर खड़े लफंगों का दायरा अपनी बढ़ती संख्या के साथ कुछ-कुछ निकट सा आने लगा था और कोई-कोई तो जगह मिलते ही अपनी लुंगियाँ समेट आसन भी ग्रहण करने लगे। कर-कुटुंब के लिए किनारे से लगी कुर्सियाँ धीरे-धीरे बेतरतीब होने लगीं। खैनी चून रहे लोगों के सामने हाथ पसारने में मेहमानों को भी किसी प्रकार का शर्म नहीं। जैसे असली समाजवाद हथेली पर उग आया हो!

तभी एक कोने से हंगामा शुरू हुआ और महाभारत की शक्ल ले उठा। दनादन कुर्सियों, ढेलों या जो भी मिला, का आदान-प्रदान होने लगा। किसी को कुछ न मिला तो शामियाने की ही खूटियाँ उखाड़  लीं, खास तौर पर बारातियों ने क्योंकि उन्हें वहाँ के भूगोल की जानकारी थोड़ी कम थी। गालियों में एक-दूसरे से कई पुश्तों की खानदानी रिश्तेदारी निकालने में कोई कसर न छोड़ी गई। समधी-मिलन की रश्म में चार चाँद लगाने के लिए लाई गई बंदूक को वक्त से पहले ही गरजना पड़ा और शामियाने में नए बने छेद इस युद्ध के स्थाई गवाह बने। हुआ दरअसल यह था कि एक बहनोई या फूफा दर्जे के मेहमान लिए एक बारात पक्ष वाले ने एक लुंगी छाप को कुर्सी खाली करने को बोला तो उसने अकड़कर उठने से मन कर दिया।
“ ......... जे है से कि काहे खाली करें, अपने लोग बाराती हईं त हमहूँ सराती हईं, कवनों बात में कम  हीं का?”
“लगता है सरवा ठानिये के आइल है”! बारातीमेंसेकोई बोला. . . ।
फिर क्या था, गुड्डू, जो कि लड़के का चचेरा भाई था, उसका हाथ-पैर पहले चलता था और दिमाग बाद में, ने कुर्सी समेत उस सींकिया पहलवान को उठा फेंका और पाहुन के लिए सिंहासन एक झटके में ही खाली करा लिया। इसी तरह की सम्भाव्यताओं के लिए भी कुछ ‘लोगों’ को बाराती में लाने का चलन भी तो था।

खैर दोनों पक्षों के समझदार और बुजुर्ग लोगों ने मिलकर किसी तरह घरैयों को मेह्माननवाजी का वास्ता देकर तो बाराती को आसपास नक्सली बस्ती होने का डर और इस झड़प को किसी विशेष साजिश का हिस्सा बताकर यथास्थिति बहाल कराई। दाद देनी पड़ेगी नाच पार्टी को, जिसे फिर से गाना  और नाचना पड़ रहा था  ......... “नथनियाँ में गोली मारे ......... “। 

 श्रीकांत बड़े भैया से फुसफुसा रहे थे, “भैया कहीं ऊ सरवन दुबारा न अटैक कर दे, हमनी के तनी......... “
बड़का भइया - “धुर बुड़बक एक बेर पिटल चोर कब्बो दोबारा पिटे लागी आबे हे! तूँ निश्चिंत रह। हम अइसन- अइसन तमाशा कइक बेर देखलिक हे। झटके में जे भय गेल से भेल सँपर  के त हिंदुस्तानों पकिस्तान पर न चढ़े गेल ......... जो तूँ खाये-पिए के वेवस्था देख हो।” बड़का भइया का आत्मविश्वास देख श्रीकांत को भी भरोसा हो गया और वह नथनियाँ पर निशाना साधने चल पड़े।

हास्य के दोहे

हास्य के दोहे

किस जन्म का पाप किया, भुगत रहा हूँ आज।
पत्नी जाती काम  पर,  घर  का  करता  काज।।

तरस खाती है हर पल, कहती है शाबास।
हो न जाये चूक कहीं, अटकी रहती साँस।।

देर  तक  सोती  रहतीं,   ऐसे  उनके  ठाट।
गुड ब्वॉय बनकर हम तो, रहें ताकते बाट।।

एक पुकार पर उनके, हम झट से उठ जाँय।
बिन बात हाल पूछते,  फिरें  पास  मँडराय।।

हालत पतली देख कर, आती माँ की याद।
सजल नयन हैं पूछते, कहाँ करूँ फरियाद।।

नन्हीं गुड़िया भी अजब, लेती  मम्मा  नाम।
दिनभर खेलूँ साथ मैं, मुफ्त गया यह काम।।

भूले-भटके जो कभी, आये  कोई  मित्र।
जैसे अलबम में लगा, मिले पुराना चित्र।।

रंगीन हुआ वीराना

विषय - चित्रलेखन
विधा - गीत

बड़े प्रेम से लिखकर पाती, तुमने  मुझे  बुलाया
इस निर्जन प्रदेश को किसने, रंगों  से  भरमाया …

धीरे-धीरे साँझ ढली  है,  चहक  रही  है  क्यारी
सपनों की बारात सजी है, महक उठी फुलवारी।
उमंगों की झंकार गुंजित,  प्रीत  छुपाकर  लाया …

धरनी अंबर के मिलने का,  शुभ  अवसर  लगता  है
बिना कहे कुछ भी सबकुछ तो, सुना हुआ लगता है।
दूर-दूर तक दिखे  नहीं  है,  किसी  जीव  की  छाया …

हर तरफ हैं रश्मियाँ पसरी, करतीं ज्यों अभिवादन
बंद आँखों से कर जरा तू,  तृप्ति  भरा  आस्वादन।
दुनिया की नजरों से बचकर, पुष्प  छुपाकर  लाया …

कितना सूना सा था पहले, धरती  का  यह  कोना
तुमने आकर बसा  दिया  है,  करके  जादू  टोना।
रंगों  से  आबाद  हो  गया,   सुंदर  कितनी  माया …

मेट्रो संस्मरण

⭐ संस्मरण ⭐

लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन वैशाली की ओर जाती हुई मेट्रो प्लेटफार्म पर लगती है बहुत से अन्य यात्रियों के साथ एक प्रौढ़ व्यक्ति का भी पदार्पण होता है। काले सूट में सज्जित व्यक्ति वकील भी हो सकता था और नहीं भी।

हाँ, इसलिए कि उन्होंने आते ही बुजुर्गों के लिये आरक्षित सीट पर कब्जा जमाये गैर अधिकृत युवा युगल में से युवक को उठने का इशारा कर दिया। अब चूँकि वह युवती के साथ बैठा था तो सोने का भी नाटक नहीं कर सकता था! इस तरह खिलखिलाते जोड़े को अलग करने की हिम्मत मैं नहीं कर सकता था, अतः यमुना बैंक स्टेशन से ही टुकुर-टुकुर देखता हुआ, कहानियाँ गढ़ रहा था।

नहीं, इसलिये संभव है कि सीट मिलते ही अपने चेहरे पर एक दैन्य का भाव ओढ़ लिया, जैसे कि युगल को अलग कर देने का अपराधबोध तिर आया हो! अपराधबोध से ग्रसित होना किसी वकील को भला शोभा देता है! युवक से आज हुई मूसलाधार बारिश से आई आफत के बारे में बातें करने लगा, इस बात से बिल्कुल बेपरवाह कि युवक की कितनी दिलचस्पी हो सकती थी उसकी दैन्य कथा में।

"देख रहे हैं मेरे कपड़े कैसे हो गये बारिश के कारण।" वैसे कपड़े तो उनके अच्छे भले थे, पता नहीं क्या दिखाना था!
- "हमारे मुहल्ले में तो आज नरक हो रखा है। लोग घरों की खिड़कियों से लटक कर निकल रहे थे। सड़क पर टखनों तक पानी था। कोई साधन नहीं, कोई रिक्शा नहीं, कुछ भी नहीं।"
- हाँ आज मौसम थोड़ा खराब तो है।" लड़के ने शिष्टाचारवश कहा।

कुछ ही दिनों पहले किसी का कहा याद आ गया। 'भाई साहब अब जाड़े में कहाँ बारिश होती है जी! पहले, (हमारे जमाने में) भाई साहब, (होंठ गोल कर बोलने का दिल्ली का पारंपरिक अंदाज) एक दो बार तो जरूर से वो बारिश होती थी, वो बारिश होती थी कि भाई साहब, बस पूछो ही मत…।'

दो स्टेशन बाद मैं उतरकर मैं चल पड़ता हूँ, अपने दफ्तर की ओर। सोचता जा रहा था, 'शायद पर्यावरण कुछ सुधरे एक दो दिनों के लिए'।

लघुकथा - लोकतंत्र के नाम पर

❄ लघुकथा - लोकतंत्र के नाम पर ❄

सुबह-सुबह ही भागता हुआ उस तथाकथित नामी गिरामी स्कूल में गुड़िया के दाखिले का पता करने गया था, जहाँ चार दिन पहले ही चार साल की गुड़िया, पत्नी तथा स्वयं का साक्षात्कार हुआ था। विद्यालय के सूचिपटल पर नाम तो था पर जन्म-प्रमाणपत्र सहित अन्य दस्तावेज व पैसे जमा करने के लिए दो ही दिन का समय दिया गया था, जिसके बढ़ने की कोई सम्भावना नहीं थी।

स्कूल से सीधा भागता हुआ नगरनिगम के दफ्तर में पहुँचा। देर तक प्रतीक्षा करने के बाद बाबू से मुलाकात हुई तो हलफनामे सहित कई अन्य औपचारिकताओं की फेहरिस्त थमा दी गई। उसकी असली चिंता तो समय को लेकर थी।  ख़ैर, कुछ सौ में द्रुत सेवा की बात बन गई। ......... शाम को बुलाया था।

जल्दबाजी में यू-टर्न पर लालबत्ती का ध्यान नहीं रख पाया। बहुत से अन्य लोगों की तरह वह भी मुड़ गया। परन्तु उसकी बदकिस्मती ........ ट्रैफिक सिपाही उसे रुकने का इशारा कर रहा था। उसके पास न तो समय था, न संसाधन ! जोखिम मोल ले ली। मोटरसाइकिल को तेजी से दाहिनी ओर से भगाने के चक्कर में सड़क पर उभर आये गड्ढे के कारण संतुलन खोकर विभाजक की रेलिंग से टकरा गया। हेलमेट तो गड्ढे के हिचकोले से ही उड़कर उस पार जा गिरा। ........ जख्म कनपटी पर लगा था  ....... ढेरों तमाशबीन ......... ! जितने मुँह, उतनी बातें !

देश गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियों में डूबा हुआ है ! संविधान के किस पृष्ठ पर लिखा हुआ है कि  सारी  गलती लोगों की ही होगी, पालकों की गलतियों का कोई हिसाब ही नहीं .........  !

एक समसामयिक हास्य-व्यंग्य

एक समसामयिक हास्य-व्यंग्य

होठों पर है मँहगी लाली
मुख से निकले सस्ती गाली।
किसी बात पर शर्म नहीं आती है
बेशर्म अदा बहुत अब भाती है।

पहन लिया पजामा ढीला
बनाकर प्लाजो रंगीला।
बुढ़िया जब ब्यूटीपार्लर से आती है
बुड्ढों की छाती छलनी कर जाती है।

देखो कितनी मस्त है
मोबाइल पर व्यस्त है।
बेटा-बेटी बहुत सुस्त हैं
माँ-बाप इसलिए चुस्त हैं।

तीर समुंदर नैवेद्य ले रहे
बाला संग धूप सेंक रहे।
कथनी-करनी होती सम नहीं
जब जैसी, तब तैसी, हर कहीं।

लगता है जैसे अँधेर है
कहते हैं पीढ़ी का फेर है।
देखो कितने दिन चलती है
एक दिन तो सबकी ढलती है।

संस्मरण - जगह मकानों में नहीं होते

जगह मकानों में नहीं होते

संस्मरण की जब भी बात चलती है, समूह के अधिकांश मित्रों की तरह ही, मेरी भी स्मृति में बचपन के अविस्मरणीय पल सजीव हो उठते हैं।

मेरे घर के पास ही हमारी पाठशाला थी। उसी पाठशाला में मुझसे दो दर्जा नीचे दो भाई साथ ही पढ़ते थे। उनका घर तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर था। उनसे मेरी निकटता की वजह यह भी थी कि उनकी दादी मेरी एक चाची की बुआ थी। इस नाते किसी भी खास तरह के आयोजनों में एक दूसरे के घरों में हम सभी का आना जाना लगा रहता था। दोनों भाइयों में बड़ा वाला मुझसे थोड़ा बड़ा और छोटा वाला मुझसे थोड़ा छोटा था। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि हम तीन भाई ही हों।

गर्मी के दिनों में शाम को जब दोनों भाई घरों को लौटते तो कई बार मैं भी उनके साथ ही हो लेता। दोपहर के लंच का उस समय रिवाज नहीं था। वे सुबह ही भोजन कर के आते थे और फिर शाम को लौटकर सुबह का ही बचा-खुचा खाकर तृप्त हो जाते थे। उनके घर की माली हालत भी ठीक नहीं थी। हालाँकि यह कोई वजह नहीं थी उनके लंच नहीं लाने की। उस वक्त का संभवतः यही रिवाज था।

उनकी आर्थिक स्थिति चाहे जो भी रही हो, मुझे उस पूरे परिवार में जो संभ्रांत संस्कार दिखे, वह बड़े-बड़े रईसों और धनाढ्यों में भी नहीं मिलता। ऐसा कोई कोई दिन नहीं रहा जब मैं बिना भोजन किये उस गरीब के घर से निकला होऊँ। उसके घर खाये कुरथी (कुल्थी) की दाल और भात का स्वाद आज भी ढूँढता रहता हूँ। इस संस्मरण को लिपिबद्ध करने का मेरा प्रयत्न भी उस नायाब स्वाद की तलाश ही है। इस दाल को सूखे आम की खटाई के साथ बनाया जाता था। मिर्च और आम के सम्मिश्रण का ताज़िंदगी आद आने वाला एक अनोखा स्वाद! कुल्थी भी क्या चीज है, करीब-करीब पत्थर की तरह ही सख्त एक दलहन जो पथरीली जमीन पर उगाया जा सकता है। आजकल पथरी के इलाज या कोलेस्ट्रॉल घटाने के उपाय के रूप में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कहते हैं दशरथ माँझी ने इसी दाल के पानी का इस्तेमाल पहाड़ तोड़ने के लिए भी किया था।

एक बात और भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि उस स्वाद को मैंने कभी खाते समय शायद नहीं महसूस किया होगा! पहली बार उस स्वाद का एहसास वर्षों बाद तब हुआ था, जब एक शहर में रहने वाले रिश्तेदार ने एक शाम का आश्रय तो दिया था पर भोजन के लिये निकट के रेस्टोरेंट का पता बता दिया था। सच ही कहा गया है, जगह घर में नहीं होता, दिल में होता है!

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...