दोहा एकादसी

दोहा एकादसी
कौन यहाँ अब पूछता, सुनकर करुण पुकार।
मानवता है चुक  गई,  अजब  हुआ  संसार।।१
मानवता के नाम पर, ऊँची बनी दुकान।
सच को झूठ बना रहे, फीके हैं पकवान।।२
दया, कृपा और करुणा, बनी किताबी बात।
पर पीड़ा में ढूंढते,  अब  तो  शह औ मात।।३
किसको फुर्सत है यहाँ, मिलने की हर रोज।
पर्व-त्योहार पर नहीं, ले पाते अब खोज।। ४
पक्के बने मकान ज्यों, मन भी हुआ कठोर।
हर तरफ है मचा हुआ, खींचतान पुरजोर।।५
कुटिल है देखो कितनी, उनकी सारी चाल।
बनता काम बिगाड़ के, खुश हो कूदें डाल।।६
बेटे  की  ही  चाह  में,  कन्या  देत  उजाड़।
निर्धन घर ममता मिले, बिटिया हुई पहाड़।।७
मात-पिता को त्याग कर, खुश हैं श्रवण कुमार।
नीर नहीं जब  नयन  में,  किसे  कहें  परिवार।।८
वाणी मधुर कहाँ मिले, बहुत बुरा है हाल।
निर्मम कड़वे बोल हैं, नोचें  अपनी  खाल।।९
बातें बनकर  रह  गईं,  दिखे  कहाँ  इंसान।
बीत अनेक वर्ष गये, मिले न साधु सुजान।।१०
बीच सड़क चोटिल हुआ, पड़ा रहा इंसान।
खींच सेल्फी चल दिये, कितने हैं नादान।।११

लघुकथा - भरोसा

भरोसा

       उच्चाधिकारियों की बैठक बुलाई गई है। माननीय मंत्री पर्यावरण संकट की समीक्षा कर रहे हैं।
      "आज तीसरा दिन है राज्य के आसमान पर धूल के बादल छाए हुए हैं और आपलोग कुछ करना तो दूर समस्या से कैसे निपटा जाए इसकी एक कार्य-योजना तक नहीं प्रस्तुत कर पाए हैं। चलिये योजना भी छोड़िये, एक बयान तक नहीं दे पाए हैं। इससे पहले कि समस्या खुद-ब-खुद दूर हो जाए, लोकतंत्र का तकाजा निभाना होगा। इतनी संवेदनशीलता तो दिखानी ही होगी कि लोगों का भरोसा अपनी चुनी हुई सरकार पर बनी रहे।"
      अगले दिन के अखबारों में अभूतपूर्व वायु प्रदूषण से निपटने के सरकारी प्रयासों की कई खबरें छपी थीं। पानी की बौछारें करते टैंकर, वैक्यूम क्लीनिंग मशीनों से सफाई के चित्र भी छपे थे।

बस यही मत पूछना

बस यही मत पूछना

पेंशन हेतु लाइफ सर्टिफिकेट अर्थात जीवन प्रमाण-पत्र के लिए संजीत कौर कार्यालय में आई थी, पोपला सा मुस्कुराता चेहरा लिए। अभी दो ही साल हुए हैं उनको अवकाश ग्रहण किये हुए। विदाई समारोह का पूरा दृश्य मन आँखों के सम्मुख ताजा हो आया। खासकर, उनकी बहू की वह स्वीकारोक्ति, जिसमें उसने गलत-फहमी होने की बात स्वीकारी थी और दुबारा ऐसी गलती न होने की कसम खाई थी।

दुआ-सलाम के बाद पूछा, “मैडम कैसी हो, सब कैसा चल रहा है ?”
    अपने चिर परिचित अंदाज में गर्मजोशी से उसने जवाब दिया, “सब चंगा है, जी। आपलोगों की दुआएं हैं और रब की मेहर है, किसी चीज की कोई कमी नहीं है जी। अच्छी भली सेहत है, प्रभु कृपा से दाल-रोटी की भी कमी नहीं है।“
    बेटे-बहू ठीक से रखते हैं? लगे हाथों पूछ ही लिया।
    “बस यही मत पूछना! बाकी सब ठीक है। “
    मुस्कुरा वह तब भी रही थी, मगर उसके पीछे के आँसू छुप कहाँ रहे थे!

अपरिचय

अपरिचय

निर्धारित समय पर दोनों एक पार्क मिले। संयोग अच्छा था, एक सूने कोने में खाली बेंच भी मिल गई। दोनों एक दूसरे से इस तरह चिपक गए जैसे कभी अलग होना ही न हो।
“सुनो। … अगले हफ्ते मैं जा रही हूँ। “ घुटती सी आवाज में लड़की ने कहा।
“कहाँ? अधरामृत का पान करते हुए लड़के ने पूछा।
    “ऊ…. हरपालपुर। “
    “किसलिए। “
    “मेरी शादी तय हो गई है। आज अपनी आखिरी मुलाकात है। समझ नहीं आ रहा, तुम्हारे बिन कैसे जिऊंगी! “
    “ओह …. !”
    फिर, दोनों ने स्वयं को एक दूसरे से आजाद किया और अपनी-अपनी राह पकड़ ली। ...... ऐसे, जैसे कभी मिले ही न हों!

सख्त व्यवस्था

सख्त व्यवस्था

एक मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर सुबह नौ बजे, एक टांग वाला लाचार व्यक्ति बिखरा पड़ा था और आने जाने वाले यात्रियों से दर्दनाक आवाज में दया की अपील कर रहा था।

दोपहर बाद के दो बजे, उसी जगह, आठ-दस सीढियाँ ऊपर मैले-कुचैले कपड़ों में एक औरत, एक बेसुध से बच्चे को लेकर बैठी थी और आनेजाने वाले की आत्माओं को झकझोर रही थी।

रात्रि के नौ बजे, वहीं, चंद सीढ़ियाँ ऊपर या नीचे, एक दीन-हीन असहाय सी बूढी औरत लोगों को पुण्य के लिए ललकारती पाई जाती है।

परिसर में सीसीटीवी सहित ….  गहन निगरानी व्यवस्था है।  प्रतीत होता है, सुरक्षा एजेंसी की ही तरह इनकी भी पाली बदलती है सख्त निरीक्षण में।

कभी नरम - कभी गरम

कभी नरम - कभी गरम 

मेट्रो में दाखिल होते ही उस अधेड़ सज्जन ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित सीट पर बैठे युवकों की ओर अजीब  दृष्टि से देखा, मानों उससे खड़ा होना भी दूभर हो रहा हो। दोनों में से एक ज्यादा ही शातिर निकला! उसने नजरें मिलाई ही नहीं और आँखें बंद कर सोने का दिखावा करने लगा। दूसरा बर्दाश्त नहीं कर पाया और सीट खाली कर दी। व्यक्ति आराम से मोबाइल से खेलने लगा।

गंतव्य स्टेशन आते ही वही व्यक्ति लगभग दौड़ता हुआ सा सभी को पीछे छोड़ता हुआ निकास द्वार की ओर सबसे पहले निकलने के लिए भाग रहा था।

अभागा दरिंदा

अभागा दरिंदा

आज शहर के तमाम अखबारों ने विगत सप्ताह हुए अपर्णा वर्मा हत्याकांड के रिकॉर्ड समय में पुलिस द्वारा किए गये खुलासे की सुर्खियाँ लगाई थीं।

आर.डब्ल्यू.ए. के सीसीटीवी फुटेज में घटना के समय के पूर्व व समय के बाद जो लड़का बदहवास अवस्था में जाता दिखाई दिया था, वह घर के नौकर सोनू का दोस्त रमेश निकला जिसे पुलिस ने दबिश देकर बिहार के सोनपुर से लूट के जेवरात सहित गिरफ्तार कर लिया। जैसे ही पुलिस ने अपने तरीकों का इस्तेमाल किया कि टूट गया। उसने कुबूल किया कि सोनू के कहने पर ही उसने मैडम जी की हत्या की थी। बाद में
लूट के माल की बँटवारा करने की योजना थी।

एक पड़ोसी के हवाले से यह भी खबर दी गई थी कि कैलिफोर्निया में रहने वाले उसके पुत्र से सम्पर्क किया गया तो पता चला कि जब भी उसकी बात माँ से होती थी तो वह बोला करती थी कि सोनू की पुत्रवत सेवा से वह अभिभूत थी और अपनी जायदाद में से एक हिस्सा मरणोपरांत उसके नाम कर जाना चाहती थी ताकि उसकी जिंदगी भी आगे चलकर व्यवस्थित हो सके।

सच ही कहा गया है, लालच बुरी बला है! अभागे ने लालच में आकर न सिर्फ मानवता को कलंकित किया बल्कि अपनी भी संवरती जिंदगी बर्बाद कर डाली।

लघुकथा - इशारा

इशारा

रोज की तरह वह आज भी ऑफिस के लिए घर से निकली। कॉलोनी के फाटक से निकलते ही दो आवारा किस्म के लड़के भद्दी सी सूरत से  भद्दे इशारे करते आज भी दिखे।

पास ही दो-चार आवारा कुत्ते भी रोज की तरह ही झाँव-झाँव करते हुए भी मिल गए। लड़की ने आज फैसला कर लिया था शायद, आव देखा न ताव और एक पत्थर उठाकर दे मारा। कुत्ते दुम दबाकर भाग खड़े हुए ...... लड़के भी ...... इशारा समझ चुके थे।

शतरंज सी है ज़िंदगी

बेशक शतरंज सी है ज़िंदगी
कभी फर्शी तो कभी है बंदगी।

प्यादे की दुःख भरी दास्तान है
बादशाह की देखो झूठी शान है।

घोड़े की ढाई घर की टेढ़ी छलांग है
ऊँट की भी तिरछी चाल उटपटांग है।

राजा तो संवैधानिक प्रधान बस नाम का है
पौ-बारह तो इस देश में वजीर के काम का है।

कटवाकर प्यादे को हाथी के पीछे छुप जाता है
वजीर के साथ गलबहियां डाले राजा मुस्काता है।

कभी सुस्ती से, कभी फुर्ती से दुश्मन को उलझाता है
बड़े ही इत्मीनान से शासक समस्या सुलझाता है।

शतरंज के खेल का उद्गम स्थल ही भारत है
हमारे आकाओं को इसमें इसीलिए महारत है।

चाहे कुछ भी जो जाये, खुद पर न आंच आने देना है
चाहे जिसका जो हो, जिन्दगी के भरपूर मजे लेना है ।

अंतिम प्रिया

अंतिम प्रिया

कितना करती हो मुझसे तुम प्यार प्रिये
यह जीवन है तुम्हारा ही उपहार प्रिये।
जन्म के साथ ही तुमसे जुड़ गया था नाता
जो भी आया इस जग में एक दिन है जाता।
बचपन खेल तमाशा, सपने जवानी के
घर-परिवार, डगमग पाँव बुढ़ापे के।
मोह-माया, झूठे सब जग के रिश्ते नाते
एक दिन तो पंछी सबको तजकर जाते।
प्रेम सरिता नयनों में बसाये फिरते
बनकर जोगी हर घाट में धूनी रमाते।
मनमोहक मनभावन कल्पना की मूरत
हरपल छाये आँखों में बस तेरी सूरत।
कितनी शीतल, निर्मल, कोमल, मधुर सी
अविरल प्रेरणा, उन्मुक्त चेतना पंख सी।
कटु सच है, पर कहाँ होता सबको पता
आने से पहले प्रिये बस इतना देना जता।
गठरी बांध सारे मायाजाल कर तिरोहित
तेरे आलिंगन को लेकर पुष्प संयोजित।
शपथ है विलम्ब नहीं बिलकुल करूंगा
प्रिये, चिर काल के लिये तेरा वरण करूंगा।

परछाईं

परछाईं
दिन ढलने लगा
परछाईयाँ होने लगीं लम्बी
खोने लगा इन्सान का वजूद
पालने लगा वहम
अपनी लम्बाई का।
गुम हो चुके अस्तित्व का
गढ़ने लगा इतिहास
करने लगा आभास
झूठी लम्बाई का।
देने लगा आभासी विस्तार
अपनी काली सघनता को।
काटने लगा खुद को
करने लगा विस्मृत
रात की असलियत
भूलकर सच्चाई
थोड़ी ही देर में चली जाएगी
साथ छोड़ जायेगी परछाईं।
मिट जाएगी परछाईं
रह जायेगा मानव ठगा सा
और भी लघु होकर
पहले से भी ज्यादा।

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...