भूख

भूख नहीं एक बीमारी है
जो सोच पर भी भारी है।
पेट की भूख तो बुझ सकती है
मन की भूख मगर कहाँ मिटती है!
भीख मांग कर काम चलाते
हाथ पैर कभी न डुलाते।
इनकी भूख तो मिट जाती है
चंद सिक्कों पर टल जाती है।
पर हवश जो देखो उनकी
भूख कहाँ बुझती इनकी।
ठूंस-ठूंस कर करें इकट्ठा
हक मार कर करते ठट्ठा।
मंदिर, मस्जिद के राह पर
मेट्रो या स्टेशन के बाहर
करुणा के धागे तार-तार
कूड़ेदान पर जुटते बेजार।
हाथ तभी तो फैलता है
भरोसा चुक जब जाता है।
एक रोटी मांगता है
दूसरा वोट ले जाता है।
कोई घपले कर डकारता है
कोई भूखे पेट सो जाता है।
समस्या वहीं की वहीं
समाधान कुछ भी नहीं।

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