कामवाली

रधिया सुगिया  कहो या
गंगा जमुनी दे दो नाम।
आसपास  कई  घरों  में
करते रहते नित  काम।
काम  हमारा  किसी  को  भाए
कोई हरदम मीनमेख निकाले।
कोई   पूछे   पड़ोसी   का  हाल
दोष अपना कोई हम पर डाले।
रंग-रंगीले दुनिया के ढंग
बहू लाते ही हमें निकाले।
लाल  कई  ऐसे  भी  देखे
माँ को लाकर हमें धकेले।
पति   से   भी  ज्यादा
हमपर   रखे   निगाह।
ओह! बेचारी, कितनी
हसरत से भरती आह!
कोई   भागे    काम    पर
कोई   दिन   भर   सड़ती
ठसक   में  कमी  लेकिन
रत्ती भर भी कहाँ करती!
हमारा तो यह धंधा  है
माना कि गैरत कम है
परिवार अपना  मगर
इसी पर तो पलता  है।

दोहा त्रयोदशी

जीवन के प्रति :-
धैर्य सम धरम नहीं, जब हों दिन विपरीत।
ज्ञानी गुण त्यागें नहीं, दिन जानें दें बीत।। १

कली-कली हर अलि फिरें, करत फिरें गुंजार।
प्रेम सुधा रस पान कर, जीवन जोत संचार।। २

अद्भुत हैं खेल जग के, अद्भुत है संसार।
जाना तय है एक दिन, फिर भी मारामार।। ३

चलते-चलते थक चुके, होने को है शाम ।
चल मुसाफिर छेड़ तान, कल होगा अब काम।। ४

शांत चित्त है मन व्यथित, उपजा है अनुराग।
योगी बन भटकत फिरें, अपना-अपना भाग।। ५

विरहन की व्यथा :-
सज धज कर गोरी चली, पिया मिलन की आस।
रूठे सजन मिले कहाँ, टूट गया विश्वास ।। ६

पिया गए परदेस को, लाने चुनरी खास।
सजनी बाट जोह रही, जब तक तन में साँस।। ७

प्रीत की रीत जगत में, जान सका है कौन ।
सुनकर विरहन की व्यथा, रह जाते सब मौन ।। ८

इंदौर की घटना पर :-
कच्ची कली मसल दिया, नहीं हुआ संताप ।
पामर मन कलुषित हुआ, गहन हुआ उत्ताप ।। ९

अदालत ने कातिल की, कर दी सजा मुक़र्रर।
इतिहास एक रच दिया, सुनवाई त्वरित कर।। १०

तेईस दिन में फांसी, सजा सही सुनाई ।
वहशी कामुक सिरफिरे, देते अब दुहाई ।। ११

कानून व्यवस्था पर :-
धारण कर गहने कई, नार चली बाजार ।
गुंडे आकर ले गए, बाली, चैन उतार ।। १२

आम बात अब हो गई, गुंडों का है जोर।
चेन लूटकर बोलते, करना मत अब शोर।। १३

छलावा

कहाँ कुछ बदला है!
आज भी युवा चिंतित है
प्रेमपत्र नहीं लिखता है
नौकरियों की दौड़ लगाता है।
युवतियाँ सशंकित हैं
जल्दी घर लौटने के दबाव झेलती
घर और बाहर के काम निबटाती हैं।
हर बार बदलाव का बवंडर उठता है
और फुस्स हो जाता है
जड़ जाता है दो-चार गालियाँ!
पिटे हुए गालों को सहलाते हुए
याद करता है कंधों पर पड़े बोझ को
और लगाने लगता है फिर से दौड़
लगाने लगता है जुगाड़
शायद इसबार लग जाए!
भूख, गरीबी और असुरक्षा के बीच
कितना संयम दिखलाता है युवा!
समय छलावे की तरह आता है
गुजर जाता है, कुछ और जख्म देकर
और वह भागता रहता है
हाँफता हुआ दौड़ता रहता है।

उम्मीद की डोर

एक ख़त क्या आया, पूरे गाँव में शोर हो गया! इससे पहले कि वह पत्र उसके पताधारक अर्थात् पीताम्बर मिश्र को प्राप्त होता, गाँव भर को पता चल गया!

अब सभी इस बात का पता लगाने को व्यग्र हो उठे थे कि पीताम्बर के पिता श्री परशुराम मिश्र जो कि महीने भर पहले ही शहर के अस्पताल से अचानक गायब हो गये थे, के इस तरह लापता होने का क्या रहस्य था। … और यह भी कि सबसे सही अटकल किसने लगाई!

पीताम्बर को पत्र घर पर नहीं दिया गया। कालिदास आम पेड़ के नीचे एक बिनबुलाई पंचायत सी लग गई। पुत्र की सहमति से पिता के पत्र को उनके अभिन्न मित्र लिकड़ू काका ने खोला और गणेश पंडित को पढ़ने को दिया।

"… बड़ी उम्मीद लेकर आया था, बाबा, दादा, काका, चाचा बनकर सबके साथ जीवन के आखिरी पल बिताने! अकेला उस दिन नहीं हुआ जब शकुंतला छोड़कर कर चल बसी थी, …. उस समय उम्मीदें शेष थीं। अस्पताल के बिस्तर पर सात-सात दिन तक किसी अपने की प्रतीक्षा ने शायद उस उम्मीद की हत्या कर दी। … चलो माफ किया, माफी मांगता भी हूँ। अब तक जो हुआ सो हुआ… आगे मेरे लिए किसी भी प्रकार की परेशानी मत उठाना। सारी जिम्मेदारियों से बरी कर दिया। कोई क्रियाकर्म करने की आवश्यकता नहीं है। शकुंतला ने जीते जी कार्तिक उद्यापन के समय अपने साथ मेरे भी अंतिम संस्कार करा डाले थे, पंडित जी और समस्त ग्राम वासी साक्षी होंगे। …

एक भयावह सन्नाटे ने पूरे चौपाल को घेर लिया था।

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