लघुकथा - गति-मति

गति-मति

साढ़े आठ बजते-बजते आलोक रंजन जी रात्रि भोजन कर लेते हैं। बच्चों के भोजन का समय देर से होता है। श्रीमती जी का समय, उनके और बच्चों के बीच में, कहीं उनके जीवन की ही तरह डोलता रहता है। किसी के पास खाली समय होता ही नहीं ! सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त।  

ऐसा नहीं कि आलोक रंजन के पास मोबाइल नहीं है!  उनके पास भी है और इस्तेमाल करने का हुनर भी ! फिर भी कहीं-ना-कहीं उन्हें लगता है कि इससे बेहतर होता आपस में बैठकर कुछ बातें करते। इसी, बात से ही तो बच्चों को अधिक चिढ़ होती, कि सारी बात घूम-फिरकर नसीहतों पर आ जानी है ! खास तौर पर, हमारे समय में ऐसा होता था, अब के बच्चे ऐसा करते हैं, वैसा करते हैं ! समझते ही नहीं, जिम्मेदारी का एहसास ही नहीं है ! शायद इन्हीं वजहों से एक ही मकान में कई कमरे और कमरों भी कई सूने कोने विकसित होते जा रहे हैं। 

अपने इस अकेलेपन को दूर करने का उन्होंने एक रास्ता निकाल लिया है। भोजन करते ही, सामने के पार्क में, टहलने के लिए चल पड़ते हैं।  यहां घूमते हुए, उन्होंने एक दोस्त भी बना लिया है।   मन-ही-मन अपने इस दोस्त से वह भरपूर मन की बातें किया करते हैं। कहीं-ना-कहीं लगता है कि उनका दोस्त भी उन्हीं की तरह अकेलेपन का शिकार है और उनसे ही मिलने आया करता है।  उनका दोस्त कोई जीव जंतु नहीं बल्कि आसमान में उड़ने वाला जहाज है। उनका दोस्त, एयरपोर्ट पर उतरने की क्यू में होने के कारण चक्कर काट रहा होता है।  जब तक वह पार्क का एक चक्कर लगाते हैं, दोस्त दो चक्कर लगा कर उन्हें चुनौती दे रहा होता है।  तब वे पहचानने की कोशिश करते हैं कि उनका दोस्त उनके साथ धोखा/चीटिंग तो नहीं कर रहा ! वही जहाज बार-बार चक्कर लगाता है या हर चक्कर पर कोई नया आ जाता है। भुक-भुकाती बत्तियां कभी नीली, कभी पीली और कभी लाल; कभी दाएं और कभी बायें या कभी पीछे की ओर ! इन्हीं जलती बुझती बत्तियों या सरसराती, गड़गड़ाती आवाजों से वह अपने दोस्त को पहचानने की कोशिश करते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं। .......अचानक उनका दोस्त आसमान से गायब हो जाता है,  .......शायद उसे उतरने की जगह मिल गई होगी।  

....... एक लम्बी उच्छ्वास निकलती है उनके मन के सूने कोने से।  ........ वे याद करने लग जाते हैं, ........ कभी इसी समय पत्नी के साथ लूडो खेलने बैठ जाया करते थे और धोखे से अधिक घर गोटी सरका लेने के सवाल पर दोनों जी भरकर लड़ने का खेल खेल कर हँसते हुए सोने चले जाया करते थे। 

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...