धूल, धुँए और धुंध में लिपटी
एक शहर दिल्ली है।
हर पल की आपाधापी है
बिना बात की मारामारी है।
फितरत नहीं हद में रहना
हर तरफ कोलाहल है।
वाहनों की रेंगती कतार है
पर्वताकार कूड़ों के अंबार हैं।
कभी कंधे टकराने को लेकर
तो कभी हार्न पर अकड़ जाती है।
छोटी-छोटी बात पर
असीम हाहाकार है।
कितना नाज था कभी
दिल वालों की दिल्ली पर!
आज दिल्ली की बेदिली
हर पल जलाती है।
दिल्ली वालों मदद मत माँगना
चलती कार में अस्मत का व्यापार है।
बीच सड़क पर कूड़ा डाल
घर अपने चमकाते रहना।
माता-पिता को छोड़ निरूपाय
पहाड़ों की सैर को जाना।
भरोसा किसी पर मत करना
अपनों का हिसाब बहुत बुरा है।
एक शहर दिल्ली है।
हर पल की आपाधापी है
बिना बात की मारामारी है।
फितरत नहीं हद में रहना
हर तरफ कोलाहल है।
वाहनों की रेंगती कतार है
पर्वताकार कूड़ों के अंबार हैं।
कभी कंधे टकराने को लेकर
तो कभी हार्न पर अकड़ जाती है।
छोटी-छोटी बात पर
असीम हाहाकार है।
कितना नाज था कभी
दिल वालों की दिल्ली पर!
आज दिल्ली की बेदिली
हर पल जलाती है।
दिल्ली वालों मदद मत माँगना
चलती कार में अस्मत का व्यापार है।
बीच सड़क पर कूड़ा डाल
घर अपने चमकाते रहना।
माता-पिता को छोड़ निरूपाय
पहाड़ों की सैर को जाना।
भरोसा किसी पर मत करना
अपनों का हिसाब बहुत बुरा है।