लघुकथा - नामकरण

नामकरण

        "ओये लौंडे तुम्हारा नाम क्या है?" निकृष्टतम काली पोशाक में मुच्छड़ कालू उस्ताद ने पूछा। जी में आया जली हुई मोबिल सनी मिट्टी मुँह पर झोंक कर भाग पड़े ! पिता की मृत्यु और माँ की परिस्थिति का ख्याल कर चाचा उसे काम सिखाने के लिए शहर लेकर आया था। ....  खून का घूँट पी कर रह गया।

       "तेजवीर प्रताप सिंह। " बड़ी मुश्किल से बोल पाया।
       "बाप का नाम ?"
        "सूर्यवीर प्रताप सिंह। " न चाहते हुए भी एक गुस्सा सा आँखों में उतर आया। झटका खा गया उस्ताद भी।

        "चलो छोडो, क्या रखा है नाम में। गैराज लाइन का उसूल है। हर नया लड़का, टेनी, रामू, कालू, राजू, ओये या अबे होता है। पुराना हो जाने पर जब अपना खोल लोगे तो उस्ताद अपने-आप जुड़ जायेगा।"

        "हर नई शुरुआत के लिए पुराने को मिटना ही होता है। 

लघुकथा - एक और पन्ना धाय

एक और पन्ना धाय “मेरी बातें ध्यान से सुनना। किसी भी प्रकार की होशियारी बहुत महँगी पड़ेगी। तुम्हारा बेटा और चौकीदार दोनों ही हमारे कब्जे में हैं। ....... उनकी सलामती चाहिए तो बस, जब, जैसा, जो करने को कहा जाए, करते जाना। पुलिस की तो सोचना भी मत। ....... हमारे अगले कॉल का इंतजार करो।” फोन विच्छेदित होते ही सेठ चम्पक लाल की आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा। फोन एक डरावनी वस्तु लगने लगा। बिना एक पल गँवाए घर का रूख किया। रास्ते भर, हजारों तरह की आशंकाएं मन में आती रहीं। अपनी सारी सफलताओं पर ही आज ग्लानि हो रही थी। गेट पर चौकीदार नहीं था। ....... ‘इसका मतलब फोन करनेवाले की बात सही थी। या तो उसे भी उठा लिया गया होगा या फिर वह भी उन्हीं लोगों से मिल गया होगा ! छोटे लोगों के ईमान का क्या भरोसा !’ ....... बदहवासी की हालत में दौड़ते हुए से ऊपर बेडरूम में पहुंचे। बच्चे को सही-सलामत देख कर कलेजा मुँह को आ गया। बेतहासा गले से लगा लिया। ....... सोचने लगे तो क्या चौकीदार ने अपहरणकर्ताओं को झूठ बोलकर अपना ही बच्चा ....... !!

लघुकथा - भलाई की सींग पूँछ नहीं होती

भलाई की सींग पूँछ नहीं होती

बढती भीड़ और लम्बी होती कतार स्थाई समस्या सी बन चुकी है महानगरों की। उसपर से जब देश की राजधानी दिल्ली की बात हो तो ........  कहने ही क्या ! मेट्रो की शुरुआत हुई। मानों राजधानी की धमनियों में एंजियोप्लास्टी कर स्टेंट डाल दी गई हो। पर थोड़े ही दिनों में फिर से नसों में संकुचन होने लगीं। एएफसी गेट पर कतारें लम्बी होने लग गईं। विकल्प के तौर पर कुछ स्टेशनों पर बाई-पास की तरह एक गेट, ‘मात्र निकास के लिए’, बनाया गया।

निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पर एक नंबर प्लेटफार्म की तरफ से सिर्फ निकास वाली सीढियाँ चलन में आ चुकी हैं। बहुत से लोग जिन्हें स्कोप मीनार, ईस्ट एंड या गुरु अंगद नगर की ओर जाना होता है, इन्हीं सीढ़ियों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कुछ लोग मात्र निकास वाली अवधारणा को नहीं समझने के कारण इसी मार्ग से सहमते से धीरे-धीरे ऊपर की ओर भी यदा-कदा जाते दिखाई दे जाते हैं। वैसे, हर जगह भीड़ देखने की आदि आँखें कुछ ही सीढियाँ चढ़ते ही शक करने लग जातीं कि ऊपर की ओर जाने के लिए 'इतने कम लोग क्यों या फिर मैं अकेला ही कैसे ! मगर पूछे भी तो किससे ! सभी धडाधड उतरे ही जा रहे हैं ! जगहंसाई का खतरा अलग से !’

ऐसे ही एक दूसरे का सहारा लेकर सीढियाँ चढ़ रहे एक वृद्ध दम्पती को बड़ा सहारा मिला, जब लगभग दौड़कर उतरती हुई एक जींस-टॉप वाली लड़की ने रुककर पूछ लिया कि ‘दूसरी ओर पार करनी है या मेट्रो पकड़नी है’ और बताया कि "........... अम्माँ ये सीढ़ियाँ सिर्फ नीचे जाने के लिए हैं, आप तो बस, ऊपर के लिए, सर्विस लेन की दूसरी ओर से लिफ्ट या सीढ़ी पकड़ो। "

सहमी, सकुचाई, आशाभरी निगाहों को देखते/महसूसते तो सभी हैं, पर पहल करने की जहमत लेने वाले विरले ही होते हैं। ..... और उनके कोई धर्म, जाति या लिंग नहीं नहीं होते। सच ही कहते हैं, भलाई के लिए किसी सींग पूँछ की आवश्यकता नहीं होती।

लघुकथा - गति-मति

गति-मति

साढ़े आठ बजते-बजते आलोक रंजन जी रात्रि भोजन कर लेते हैं। बच्चों के भोजन का समय देर से होता है। श्रीमती जी का समय, उनके और बच्चों के बीच में, कहीं उनके जीवन की ही तरह डोलता रहता है। किसी के पास खाली समय होता ही नहीं ! सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त।  

ऐसा नहीं कि आलोक रंजन के पास मोबाइल नहीं है!  उनके पास भी है और इस्तेमाल करने का हुनर भी ! फिर भी कहीं-ना-कहीं उन्हें लगता है कि इससे बेहतर होता आपस में बैठकर कुछ बातें करते। इसी, बात से ही तो बच्चों को अधिक चिढ़ होती, कि सारी बात घूम-फिरकर नसीहतों पर आ जानी है ! खास तौर पर, हमारे समय में ऐसा होता था, अब के बच्चे ऐसा करते हैं, वैसा करते हैं ! समझते ही नहीं, जिम्मेदारी का एहसास ही नहीं है ! शायद इन्हीं वजहों से एक ही मकान में कई कमरे और कमरों भी कई सूने कोने विकसित होते जा रहे हैं। 

अपने इस अकेलेपन को दूर करने का उन्होंने एक रास्ता निकाल लिया है। भोजन करते ही, सामने के पार्क में, टहलने के लिए चल पड़ते हैं।  यहां घूमते हुए, उन्होंने एक दोस्त भी बना लिया है।   मन-ही-मन अपने इस दोस्त से वह भरपूर मन की बातें किया करते हैं। कहीं-ना-कहीं लगता है कि उनका दोस्त भी उन्हीं की तरह अकेलेपन का शिकार है और उनसे ही मिलने आया करता है।  उनका दोस्त कोई जीव जंतु नहीं बल्कि आसमान में उड़ने वाला जहाज है। उनका दोस्त, एयरपोर्ट पर उतरने की क्यू में होने के कारण चक्कर काट रहा होता है।  जब तक वह पार्क का एक चक्कर लगाते हैं, दोस्त दो चक्कर लगा कर उन्हें चुनौती दे रहा होता है।  तब वे पहचानने की कोशिश करते हैं कि उनका दोस्त उनके साथ धोखा/चीटिंग तो नहीं कर रहा ! वही जहाज बार-बार चक्कर लगाता है या हर चक्कर पर कोई नया आ जाता है। भुक-भुकाती बत्तियां कभी नीली, कभी पीली और कभी लाल; कभी दाएं और कभी बायें या कभी पीछे की ओर ! इन्हीं जलती बुझती बत्तियों या सरसराती, गड़गड़ाती आवाजों से वह अपने दोस्त को पहचानने की कोशिश करते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं। .......अचानक उनका दोस्त आसमान से गायब हो जाता है,  .......शायद उसे उतरने की जगह मिल गई होगी।  

....... एक लम्बी उच्छ्वास निकलती है उनके मन के सूने कोने से।  ........ वे याद करने लग जाते हैं, ........ कभी इसी समय पत्नी के साथ लूडो खेलने बैठ जाया करते थे और धोखे से अधिक घर गोटी सरका लेने के सवाल पर दोनों जी भरकर लड़ने का खेल खेल कर हँसते हुए सोने चले जाया करते थे। 

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...