लघुकथा : आत्मनिष्ठ

https://youtu.be/CA1QzvNo71M

☝  इस लघुकथा को वीडियो रूप में देखने के लिए ऊपर दिए गए लिंक को क्लिक करें। 






My pick on Amazon

लघुकथा - दो रोटी का रिश्ता

दो रोटी का रिश्ता

कुछ भी बिना बोले पत्नी खाना रखकर चली गई। सामने पड़ी रोटी को देखते हुए रमेश बाबू कहीं खो से गए। जब से सेवा निवृत होकर घर बैठे हैं, अक्सर ऐसा ही होता। आलोचना और प्रतिवादों से बचने के लिए दोनों ने ही चुप्पी को हथियार बना रखा है। पूरे समय दोनों एक-दूसरे के बारे में सोचते रहते पर बातें नहीं करते। अगर कोई बात होती भी तो कड़वाहट और उलाहनों से भरी हुई। शब्द नहीं, हड्डियों तक को बेधने की क्षमता रखने वाले शब्द-बाण चलते। समाधान तो कुछ भी नहीं निकलता, गलतफहमियाँ बढ़ती जातीं।
‘वाह री किस्मत, जिस रोटी के लिए जीवन भर जुते रहे, आज वही सम्मुख मानों मुँह चिढ़ा रही है।’ जब समय का कतई अभाव नहीं है, भावों की तंगी से पत्नी के साथ उनका रिश्ता ही बस दो वक्त की रोटी भर का होकर रह गया है, जैसे।

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...