अपरिचय
निर्धारित समय पर दोनों एक पार्क मिले। संयोग अच्छा था, एक सूने कोने में खाली बेंच भी मिल गई। दोनों एक दूसरे से इस तरह चिपक गए जैसे कभी अलग होना ही न हो।
“सुनो। … अगले हफ्ते मैं जा रही हूँ। “ घुटती सी आवाज में लड़की ने कहा।
“कहाँ? अधरामृत का पान करते हुए लड़के ने पूछा।
“ऊ…. हरपालपुर। “
“किसलिए। “
“मेरी शादी तय हो गई है। आज अपनी आखिरी मुलाकात है। समझ नहीं आ रहा, तुम्हारे बिन कैसे जिऊंगी! “
“ओह …. !”
फिर, दोनों ने स्वयं को एक दूसरे से आजाद किया और अपनी-अपनी राह पकड़ ली। ...... ऐसे, जैसे कभी मिले ही न हों!
निर्धारित समय पर दोनों एक पार्क मिले। संयोग अच्छा था, एक सूने कोने में खाली बेंच भी मिल गई। दोनों एक दूसरे से इस तरह चिपक गए जैसे कभी अलग होना ही न हो।
“सुनो। … अगले हफ्ते मैं जा रही हूँ। “ घुटती सी आवाज में लड़की ने कहा।
“कहाँ? अधरामृत का पान करते हुए लड़के ने पूछा।
“ऊ…. हरपालपुर। “
“किसलिए। “
“मेरी शादी तय हो गई है। आज अपनी आखिरी मुलाकात है। समझ नहीं आ रहा, तुम्हारे बिन कैसे जिऊंगी! “
“ओह …. !”
फिर, दोनों ने स्वयं को एक दूसरे से आजाद किया और अपनी-अपनी राह पकड़ ली। ...... ऐसे, जैसे कभी मिले ही न हों!