जीवन के प्रति :-
धैर्य सम धरम नहीं, जब हों दिन विपरीत।
ज्ञानी गुण त्यागें नहीं, दिन जानें दें बीत।। १
कली-कली हर अलि फिरें, करत फिरें गुंजार।
प्रेम सुधा रस पान कर, जीवन जोत संचार।। २
अद्भुत हैं खेल जग के, अद्भुत है संसार।
जाना तय है एक दिन, फिर भी मारामार।। ३
चलते-चलते थक चुके, होने को है शाम ।
चल मुसाफिर छेड़ तान, कल होगा अब काम।। ४
शांत चित्त है मन व्यथित, उपजा है अनुराग।
योगी बन भटकत फिरें, अपना-अपना भाग।। ५
विरहन की व्यथा :-
सज धज कर गोरी चली, पिया मिलन की आस।
रूठे सजन मिले कहाँ, टूट गया विश्वास ।। ६
पिया गए परदेस को, लाने चुनरी खास।
सजनी बाट जोह रही, जब तक तन में साँस।। ७
प्रीत की रीत जगत में, जान सका है कौन ।
सुनकर विरहन की व्यथा, रह जाते सब मौन ।। ८
इंदौर की घटना पर :-
कच्ची कली मसल दिया, नहीं हुआ संताप ।
पामर मन कलुषित हुआ, गहन हुआ उत्ताप ।। ९
अदालत ने कातिल की, कर दी सजा मुक़र्रर।
इतिहास एक रच दिया, सुनवाई त्वरित कर।। १०
तेईस दिन में फांसी, सजा सही सुनाई ।
वहशी कामुक सिरफिरे, देते अब दुहाई ।। ११
कानून व्यवस्था पर :-
धारण कर गहने कई, नार चली बाजार ।
गुंडे आकर ले गए, बाली, चैन उतार ।। १२
आम बात अब हो गई, गुंडों का है जोर।
चेन लूटकर बोलते, करना मत अब शोर।। १३