दोहा त्रयोदशी

जीवन के प्रति :-
धैर्य सम धरम नहीं, जब हों दिन विपरीत।
ज्ञानी गुण त्यागें नहीं, दिन जानें दें बीत।। १

कली-कली हर अलि फिरें, करत फिरें गुंजार।
प्रेम सुधा रस पान कर, जीवन जोत संचार।। २

अद्भुत हैं खेल जग के, अद्भुत है संसार।
जाना तय है एक दिन, फिर भी मारामार।। ३

चलते-चलते थक चुके, होने को है शाम ।
चल मुसाफिर छेड़ तान, कल होगा अब काम।। ४

शांत चित्त है मन व्यथित, उपजा है अनुराग।
योगी बन भटकत फिरें, अपना-अपना भाग।। ५

विरहन की व्यथा :-
सज धज कर गोरी चली, पिया मिलन की आस।
रूठे सजन मिले कहाँ, टूट गया विश्वास ।। ६

पिया गए परदेस को, लाने चुनरी खास।
सजनी बाट जोह रही, जब तक तन में साँस।। ७

प्रीत की रीत जगत में, जान सका है कौन ।
सुनकर विरहन की व्यथा, रह जाते सब मौन ।। ८

इंदौर की घटना पर :-
कच्ची कली मसल दिया, नहीं हुआ संताप ।
पामर मन कलुषित हुआ, गहन हुआ उत्ताप ।। ९

अदालत ने कातिल की, कर दी सजा मुक़र्रर।
इतिहास एक रच दिया, सुनवाई त्वरित कर।। १०

तेईस दिन में फांसी, सजा सही सुनाई ।
वहशी कामुक सिरफिरे, देते अब दुहाई ।। ११

कानून व्यवस्था पर :-
धारण कर गहने कई, नार चली बाजार ।
गुंडे आकर ले गए, बाली, चैन उतार ।। १२

आम बात अब हो गई, गुंडों का है जोर।
चेन लूटकर बोलते, करना मत अब शोर।। १३

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

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