इस दुनियाँ में व्यापार ही व्यवहार है। लेनदेन का ही कारोबार है। उपहार की प्रत्याशा में उपहार दिए जाते हैं। कार्यक्रम समाप्त होते न होते लिफाफों के वजन तौले जाते हैं। अगर कम पड़े तो मेजबान की खीझ अगले दिन .....। दूसरी तरफ शगुन के हिसाब से प्लेट को भी खूब तौल कर, उलट पलट कर देख लिया जाता है। अब इन दो कारोबारियों के बीच रिश्ते-नाते त्राहिमाम न करें तो क्या करें। शुक्र है, दुनियाँ फिर भी चल ही रही है।
नोट लेकर वोट दिए जाते हैं और वोट खरीद कर पूरे पांच साल तक उसकी कीमत वसूल की जाते है। कुसूर किसका ? सभी फन्ने खाँ बने बैठे है ! ‘को बड छोट कहत अपराधू’ । बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय ! अपना-अपना भोग है, भाई।
औलाद नालायक ! काम के न काज के दुश्मन अनाज के ! संतानों को पता है, अपना बुढ़ापा निरापद करने के ये चोंचले हैं ! ‘प्यार लुटाओ तो जानवर भी दुम हिलाते नहीं थकते। अपनी गलती की सजा आप भुगतो। हमें क्यों भगत सिंह बनाने पर तुले हो निखट्टुओ, खुद तो सुभाषचंद्र बोस बन कर दिखाओ। स्वयं तो सी.वी. रामन बने नहीं हमें इंजीनियर बनाने के लिए सुबह से चिल्लाते फिरते हैं।’
आभासी दुनियाँ भी कोई अछूती नहीं ! यहाँ भी तो लाइक के बदले लाइक और टिपण्णी के बदले ही टिप्पणी मिलती है ! कोई नहीं पूछता, आपने कितना लिखा और क्या लिखा ! फिर भी प्रकाशन से तो बेहतर है, 10-20 लोग तो पढ़ ही लेते हैं, अगर रचना कम शब्दों की हो तो ! वर्ना, पूरी की पूरी उपन्यास 'बरेली की बर्फी' की तरह पहले पाठक का इंतजार करती हुई, प्लेटफार्म के बुकस्टाल पर धूल ही फांकती न रह जाए !