लघुकथा - यम सा नियम

सेठ जमनालाल भोजन कर रहे हैं । आमतौर पर घर में सब से पहले भोजन वही करते हैं। घर वालों ने उन्हें इतना सम्मान दे रखा है कि दोपहर का या रात्रि का भोजन हो, शुरुआत उनसे ही होती है। आखिर घर के सबसे बुजुर्ग जो ठहरे। चार पुत्रों, बहुओं और पोते-पोतियों से भरा यह घर पूरे मोहल्ले में एक आदर्श परिवार है, आज के समय में। 

एकदम सधी हुई और नियमित दिनचर्या है सेठ जी की। गिनती की तीन चपातियाँ, कम तेल-मसालों में बनी हुई सब्जी और साथ में थोड़ा सा दूध। रात में सामान्यतः यही कुछ उनका आहार है। दिल की बीमारी के कारण परहेज से ही रहते हैं। घर वालों को भी आदत सी पड़ गई है। सबकुछ नियमानुसार चल रहा है। यांत्रिक सी जीवनचर्या कभी-कभी उबाऊ भी लगती है। बहू ने खाना दिया, उन्होंने सिर झुकाकर खाना शुरु किया और कमरा खाली। खाना ख़त्म होते न होते उनकी दवाइयाँ हाजिर। कोई मान-मनुहार नहीं, कमी-बेसी की कोई गुंजाईश नहीं। 

परंतु आज सब्जी कुछ खास लग रही है। उनको इच्छा हो रही है कि एक चपाती और ले लें। ‘काश कि आज बहू ही पूछ ले।’ पत्नी, गठिया के कारण कम ही इधर-उधर करती है, शायद आ जाए और पूछ बैठे, पुराने दिनों की तरह। जब, ‘हो गया’ कहने के बाद भी वह चपाती लेकर जरूर आती थी और उनके हाथ धोने तक खड़ी रहती थी। और नहीं तो उनके प्यारे पोते-पोतियों में से ही कोई आ निकले .......। सोचने लगे, ‘बोल दूंगा, लेता तो नहीं, मगर तुम्हारा आग्रह है तो मानना ही पड़ेगा’। 

जैसे ही उन्होंने सिर उठाया, अपनी प्यारी पोती अंशु को सामने पाया। एक स्मित सी मुस्कान तिर आई। पोती ने मुट्ठी खोल कर दाहिनी हथेली को सामने कर दिया जिसमें दवाएँ हैं। कुछ भी नहीं कहा, सूनी हो गई आँखों से पोती के मासूम चेहरे को निहारते हुए अपनी बाईं हाथ से दवाइयाँ उठा लीं।

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