लघुकथा - नामकरण

नामकरण

        "ओये लौंडे तुम्हारा नाम क्या है?" निकृष्टतम काली पोशाक में मुच्छड़ कालू उस्ताद ने पूछा। जी में आया जली हुई मोबिल सनी मिट्टी मुँह पर झोंक कर भाग पड़े ! पिता की मृत्यु और माँ की परिस्थिति का ख्याल कर चाचा उसे काम सिखाने के लिए शहर लेकर आया था। ....  खून का घूँट पी कर रह गया।

       "तेजवीर प्रताप सिंह। " बड़ी मुश्किल से बोल पाया।
       "बाप का नाम ?"
        "सूर्यवीर प्रताप सिंह। " न चाहते हुए भी एक गुस्सा सा आँखों में उतर आया। झटका खा गया उस्ताद भी।

        "चलो छोडो, क्या रखा है नाम में। गैराज लाइन का उसूल है। हर नया लड़का, टेनी, रामू, कालू, राजू, ओये या अबे होता है। पुराना हो जाने पर जब अपना खोल लोगे तो उस्ताद अपने-आप जुड़ जायेगा।"

        "हर नई शुरुआत के लिए पुराने को मिटना ही होता है। 

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...