लघुकथा - एक और पन्ना धाय

एक और पन्ना धाय “मेरी बातें ध्यान से सुनना। किसी भी प्रकार की होशियारी बहुत महँगी पड़ेगी। तुम्हारा बेटा और चौकीदार दोनों ही हमारे कब्जे में हैं। ....... उनकी सलामती चाहिए तो बस, जब, जैसा, जो करने को कहा जाए, करते जाना। पुलिस की तो सोचना भी मत। ....... हमारे अगले कॉल का इंतजार करो।” फोन विच्छेदित होते ही सेठ चम्पक लाल की आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा। फोन एक डरावनी वस्तु लगने लगा। बिना एक पल गँवाए घर का रूख किया। रास्ते भर, हजारों तरह की आशंकाएं मन में आती रहीं। अपनी सारी सफलताओं पर ही आज ग्लानि हो रही थी। गेट पर चौकीदार नहीं था। ....... ‘इसका मतलब फोन करनेवाले की बात सही थी। या तो उसे भी उठा लिया गया होगा या फिर वह भी उन्हीं लोगों से मिल गया होगा ! छोटे लोगों के ईमान का क्या भरोसा !’ ....... बदहवासी की हालत में दौड़ते हुए से ऊपर बेडरूम में पहुंचे। बच्चे को सही-सलामत देख कर कलेजा मुँह को आ गया। बेतहासा गले से लगा लिया। ....... सोचने लगे तो क्या चौकीदार ने अपहरणकर्ताओं को झूठ बोलकर अपना ही बच्चा ....... !!

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...