शतरंज सी है ज़िंदगी

बेशक शतरंज सी है ज़िंदगी
कभी फर्शी तो कभी है बंदगी।

प्यादे की दुःख भरी दास्तान है
बादशाह की देखो झूठी शान है।

घोड़े की ढाई घर की टेढ़ी छलांग है
ऊँट की भी तिरछी चाल उटपटांग है।

राजा तो संवैधानिक प्रधान बस नाम का है
पौ-बारह तो इस देश में वजीर के काम का है।

कटवाकर प्यादे को हाथी के पीछे छुप जाता है
वजीर के साथ गलबहियां डाले राजा मुस्काता है।

कभी सुस्ती से, कभी फुर्ती से दुश्मन को उलझाता है
बड़े ही इत्मीनान से शासक समस्या सुलझाता है।

शतरंज के खेल का उद्गम स्थल ही भारत है
हमारे आकाओं को इसमें इसीलिए महारत है।

चाहे कुछ भी जो जाये, खुद पर न आंच आने देना है
चाहे जिसका जो हो, जिन्दगी के भरपूर मजे लेना है ।

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