परछाईं

परछाईं
दिन ढलने लगा
परछाईयाँ होने लगीं लम्बी
खोने लगा इन्सान का वजूद
पालने लगा वहम
अपनी लम्बाई का।
गुम हो चुके अस्तित्व का
गढ़ने लगा इतिहास
करने लगा आभास
झूठी लम्बाई का।
देने लगा आभासी विस्तार
अपनी काली सघनता को।
काटने लगा खुद को
करने लगा विस्मृत
रात की असलियत
भूलकर सच्चाई
थोड़ी ही देर में चली जाएगी
साथ छोड़ जायेगी परछाईं।
मिट जाएगी परछाईं
रह जायेगा मानव ठगा सा
और भी लघु होकर
पहले से भी ज्यादा।

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