अबला नहीं

अबला नहीं
प्रबला है वह
देखो कैसे पीट-पीटकर
चट्टानों को तोड़ रही।
फौलादी इरादे हैं
पत्थर को पीटकर
पालती है पेट।
ठक-ठक की आवाज ही संगीत बन
सुलाती है गोद में प्यारी बिटया।
दूध की धार
और पसीने की मार
एकसाथ 
जिम्मेदारियों का निर्वहन
गजब का देखो संतुलन।
लगन और रवानी से
दरक कर पत्थर कठोर भी
मातृत्व के अनुशासन की चोट से
लेता है मनचाहा आकार।
कर्म के संतोष की आभा से अनुप्राणित
यंत्रवत सहजता से सृजन
गृहस्थी के सारे काम कर सहज
जब तुम मुस्काती हो
सृष्टि की धुरी सबल बन जाती हो।
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