आत्मा की विजय

अचानक सीने में भयानक जलन और पेट में मरोड़ शुरू हो गया। कुछ भी समझ में न आया। गिरने-गिरने को
हो आया। बड़ी मुश्किल से मोटरसाइकिल को सड़क के किनारे किया। स्टैंड भी नहीं गिरा पाया। लुढ़क जाने
दिया। घुटनों के बल जमीन पर ही बैठ गया।

. ...... .. उल्टी के अंतिम दौर के बाद मरोड़ जब बर्दास्त के लायक हो गई, वह सोचने लगा कि ऐसा क्या हो
गया था उसके साथ ! अगर कोई बीमारी थी तो अब से पहले तो कभी पता भी नहीं चला!

तभी थोड़ी ही देर पहले देखी हुई दुर्घटना के बाद वाली घटना उसके जेहन में एक चलचित्र की तरह घूम गए। रात
के अँधेरे में अपनी ही मोटरसाइकिल की रौशनी में उसने एक दुसरे मोटरसाइकिल सवार को गिरा पड़ा देखा था।
उसने देखा था   .........

सड़क किनारे झुरमुटों के पास औंधे मुँह लुढ़का एक खून से लथपथ युवक शायद अभी भी जिंदा था। सिर से खून
बह रहा था। पास ही उसका थैला पड़ा था मोटरसाइकिल भी कुछ ही दूरी पर गिरी हुई दीख रही थी। बेहद भयानक
दृश्य था। किसी तरह हिम्मत जुटाकर राजेश ने उसके पॉकेट तलाशे शायद कोई पहचान मिल जाये ! .........  मिला
भी ! उसने थैले को भी न जाने क्यों देख लिया ! ‘......... लगता है, आज ही पगार मिली थी, पूरे पचास हजार नकद
एक लिफाफे में, इसके अलावे बटुए में भी अच्छी खासी राशि और कार्ड, दो महगे मोबाइल, सोने की अंगूठी और
भी कुछ सामान।’ ......... जाग गया शैतान और सारी मानवता भूल वह थैला और बटुआ संभाल, इससे पहले कि
कोई और राहगीर आ धमकता, वह वहाँ से निकल पड़ा।

परन्तु उसकी आत्मा को शायद यह बर्दाश्त नहीं हुआ। .........  किसी तरह वह उठा, मोटरसाइकिल सीधी की और
वापिस मुड़ गया उसी रास्ते पर। आत्मा ने शैतान पर विजय पा ली थी।

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