भलाई की सींग पूँछ नहीं होती
बढती भीड़ और लम्बी होती कतार स्थाई समस्या सी बन चुकी है महानगरों की। उसपर से जब देश की राजधानी दिल्ली की बात हो तो ........ कहने ही क्या ! मेट्रो की शुरुआत हुई। मानों राजधानी की धमनियों में एंजियोप्लास्टी कर स्टेंट डाल दी गई हो। पर थोड़े ही दिनों में फिर से नसों में संकुचन होने लगीं। एएफसी गेट पर कतारें लम्बी होने लग गईं। विकल्प के तौर पर कुछ स्टेशनों पर बाई-पास की तरह एक गेट, ‘मात्र निकास के लिए’, बनाया गया।
निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पर एक नंबर प्लेटफार्म की तरफ से सिर्फ निकास वाली सीढियाँ चलन में आ चुकी हैं। बहुत से लोग जिन्हें स्कोप मीनार, ईस्ट एंड या गुरु अंगद नगर की ओर जाना होता है, इन्हीं सीढ़ियों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कुछ लोग मात्र निकास वाली अवधारणा को नहीं समझने के कारण इसी मार्ग से सहमते से धीरे-धीरे ऊपर की ओर भी यदा-कदा जाते दिखाई दे जाते हैं। वैसे, हर जगह भीड़ देखने की आदि आँखें कुछ ही सीढियाँ चढ़ते ही शक करने लग जातीं कि ऊपर की ओर जाने के लिए 'इतने कम लोग क्यों या फिर मैं अकेला ही कैसे ! मगर पूछे भी तो किससे ! सभी धडाधड उतरे ही जा रहे हैं ! जगहंसाई का खतरा अलग से !’
ऐसे ही एक दूसरे का सहारा लेकर सीढियाँ चढ़ रहे एक वृद्ध दम्पती को बड़ा सहारा मिला, जब लगभग दौड़कर उतरती हुई एक जींस-टॉप वाली लड़की ने रुककर पूछ लिया कि ‘दूसरी ओर पार करनी है या मेट्रो पकड़नी है’ और बताया कि "........... अम्माँ ये सीढ़ियाँ सिर्फ नीचे जाने के लिए हैं, आप तो बस, ऊपर के लिए, सर्विस लेन की दूसरी ओर से लिफ्ट या सीढ़ी पकड़ो। "
सहमी, सकुचाई, आशाभरी निगाहों को देखते/महसूसते तो सभी हैं, पर पहल करने की जहमत लेने वाले विरले ही होते हैं। ..... और उनके कोई धर्म, जाति या लिंग नहीं नहीं होते। सच ही कहते हैं, भलाई के लिए किसी सींग पूँछ की आवश्यकता नहीं होती।
बढती भीड़ और लम्बी होती कतार स्थाई समस्या सी बन चुकी है महानगरों की। उसपर से जब देश की राजधानी दिल्ली की बात हो तो ........ कहने ही क्या ! मेट्रो की शुरुआत हुई। मानों राजधानी की धमनियों में एंजियोप्लास्टी कर स्टेंट डाल दी गई हो। पर थोड़े ही दिनों में फिर से नसों में संकुचन होने लगीं। एएफसी गेट पर कतारें लम्बी होने लग गईं। विकल्प के तौर पर कुछ स्टेशनों पर बाई-पास की तरह एक गेट, ‘मात्र निकास के लिए’, बनाया गया।
निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पर एक नंबर प्लेटफार्म की तरफ से सिर्फ निकास वाली सीढियाँ चलन में आ चुकी हैं। बहुत से लोग जिन्हें स्कोप मीनार, ईस्ट एंड या गुरु अंगद नगर की ओर जाना होता है, इन्हीं सीढ़ियों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कुछ लोग मात्र निकास वाली अवधारणा को नहीं समझने के कारण इसी मार्ग से सहमते से धीरे-धीरे ऊपर की ओर भी यदा-कदा जाते दिखाई दे जाते हैं। वैसे, हर जगह भीड़ देखने की आदि आँखें कुछ ही सीढियाँ चढ़ते ही शक करने लग जातीं कि ऊपर की ओर जाने के लिए 'इतने कम लोग क्यों या फिर मैं अकेला ही कैसे ! मगर पूछे भी तो किससे ! सभी धडाधड उतरे ही जा रहे हैं ! जगहंसाई का खतरा अलग से !’
ऐसे ही एक दूसरे का सहारा लेकर सीढियाँ चढ़ रहे एक वृद्ध दम्पती को बड़ा सहारा मिला, जब लगभग दौड़कर उतरती हुई एक जींस-टॉप वाली लड़की ने रुककर पूछ लिया कि ‘दूसरी ओर पार करनी है या मेट्रो पकड़नी है’ और बताया कि "........... अम्माँ ये सीढ़ियाँ सिर्फ नीचे जाने के लिए हैं, आप तो बस, ऊपर के लिए, सर्विस लेन की दूसरी ओर से लिफ्ट या सीढ़ी पकड़ो। "
सहमी, सकुचाई, आशाभरी निगाहों को देखते/महसूसते तो सभी हैं, पर पहल करने की जहमत लेने वाले विरले ही होते हैं। ..... और उनके कोई धर्म, जाति या लिंग नहीं नहीं होते। सच ही कहते हैं, भलाई के लिए किसी सींग पूँछ की आवश्यकता नहीं होती।