भरोसे का सवाल - एक विचार

भरोसे का सवाल

पिछले दो महीने से देखा रहा था, नई व्यवस्था के तहत प्रतिदिन सात से दस बजे के बीच कूड़े वाली गाड़ी लाऊड-स्पीकर बजाती हुई आती। परन्तु इस मुहल्ले के लोग भी कितने अजीब हैं ! वे अपने पुराने ठेले-वाले (कूड़ा लेने वाले) का साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं !

वे ही महिलायें जो हर महीने उस कचरे वाले से पैसे के नाम पर महाभारत छेड़ा करती थीं, कभी पैसे बढ़ाने के नाम पर तो कभी ‘नागा’ करने को लेकर ! अब इस वाकयुद्ध में एक धमकी और शामिल हो गई, 
 - 'इससे तो बढ़िया गाडी वाले को ही न देना शुरू कर दूँ !’ 
मगर अधिकांश इस शुरुआत को करने से झिझक रही थीं। 
 - ‘अब कूड़ा रोज उठाकर गाड़ी में फेंकने की जहमत कौन उठाये ! यह कम-से-कम दरवाजे पर से उठा तो ले जाता है। ...... और फिर, कम या ज्यादा, पैसे तो उसे भी देने ही पड़ेंगे। क्या पता, कुछ दिनों के बाद बंद ही कर दे तो यह वाला तो और भी भाव खाने लगेगा। ऐसी स्थिति अगर आ ही गई तो नई व्यवस्था कैसी होगी, किसे पता !’ 

घर के मामले में पतियों का हस्तक्षेप जरा भी बर्दाश्त नहीं करने वाली महिलाओं ने भी इस अतिसंवेदनशील मुद्दे पर उनसे सलाह मशविरा किया। समझदार पतियों ने बड़ी सफाई से अपनी गर्दन बचाई, यह कहते हुए कि “ठीक ही कह रही हो, सरकारी काम का क्या भरोसा ! वैसे, तुम जो भी ठीक समझो।“

सरकारी व्यवस्था पर यह संदेह इसलिए भी गहरा हो जाता है, जब लाऊड-स्पीकर पर यह घोषणा की जाती है कि “गीले और सूखे कूड़े को अलग-अलग करना आपकी जिम्मेदारी है। सूखे कूड़े को नीले रंग के कूड़ेदान में और गीले कचरे को हरे रंग के कचरेदान में रखना आवश्यक है । कूड़े को जलाना, या इधर-उधर फैलाना दंडनीय अपराध है।” लब्बो-लुबाब यह कि कूड़ा निष्तारण में जनता की भूमिका और जिम्मेदारियाँ तो याद दिलाई जाती हैं पर एक बार भी भरोसा नहीं दिलाया जाता कि अगर किसी दिन वे आयें ही नहीं तो क्या व्यवस्था होगी ? उसकी गाड़ी में तो गीले और सूखे कचरे अलग लेने की व्यवस्था ही नहीं! ठीक उसी तरह, जैसे एक आम आदमी तो अनुज्ञप्ति लेकर वाहन चलाये, ट्रैफिक के नियमों का पालन करे। उल्लघन पर दंड की व्यवस्था की गई है। परंतु व्यवस्था करने वाले अगर अपने दायित्व का वहन करने में असफल रहते हैं, यथा, संकेतक ख़राब हों, टूटे हों या सड़क पर गड्ढे ही पड़ जाएँ, जिसमें गिरकर चाहे किसी की जान ही चली जाए, तो कोई भी दंड का भागी नहीं होता ! ...... कब तक चलता रहेगा इसी तरह ! ....... तो फिर कहाँ से आये भरोसा !

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