आज़ादी

★ सरसी छंद ★

सीमित है यह धरती अपनी
                             छोटा   है   संसार।
है अनंत आकाश यहाँ पर
                            अद्भुत   कारोबार।।
निस्सीम गगन में ही होती है
                            पंछी  की पहचान।
जैसे   मस्त   बजती  बाँसुरी
                            खींच सुरों की तान।।
भरकर उड़ान  सबसे  ऊँची
                            नापें   नभ   विस्तार।
खग कुल की पहचान यही है
                            छोटा  सा   घरबार।।
आश्रय मगर उन्हें चाहिए
                            लेने   को   विश्राम।
छोटा सा एक घोंसला हो
                            जहाँ  करे  आराम।।
आज़ादी के परवाने हम
                           मतवाली   है  चाल।
बंधन कब हैं हमें सुहाते
                           खटके यही सवाल।।

लघुकथा : रंग में भंग

रंग में भंग

जी हाँ, अपने ही देश में इस तरह भी कभी बारात जाती थी और क्या पता कि दूर-दराज में अभी भी जा रही हो! साइकिल, स्कूटर, मोटरसाइकिल, बस, मिनी-बस या ट्रैक्टर में ऊपर-नीचे लद-फंदकर। कुछ और पहले जाएँ, तो बग्घी, घोड़े और बैलगाड़ी भी।

ऐसी ही एक बारात में एक गहन अंधेरी रात में एक बारात महफ़िल सजाये बैठी थी। नाच चल रहा था। एक-से-एक रस भरे गाने और उसपर बसदेवा का चौकीतोड़ नाच जैसे साक्षात् अप्सरा विश्वामित्र को रिझाने धरती पर उतर आई हो। उसके दीवानों की कोई कमी न थी। सारे रसिक, रस-मर्मज्ञ दीवानों की तरह हर थाप पर झूम से रहे थे।  पेट्रोमैक्स या जेनरेटर की रोशनी और लाऊड स्पीकर की चीखती आवाज़ सुन आस-पास के लौंडे-लपाड़े भी अनामंत्रित ही आ जुटे थे। शामियाने के बाहर खड़े लफंगों का दायरा अपनी बढ़ती संख्या के साथ कुछ-कुछ निकट सा आने लगा था और कोई-कोई तो जगह मिलते ही अपनी लुंगियाँ समेट आसन भी ग्रहण करने लगे। कर-कुटुंब के लिए किनारे से लगी कुर्सियाँ धीरे-धीरे बेतरतीब होने लगीं। खैनी चून रहे लोगों के सामने हाथ पसारने में मेहमानों को भी किसी प्रकार का शर्म नहीं। जैसे असली समाजवाद हथेली पर उग आया हो!

तभी एक कोने से हंगामा शुरू हुआ और महाभारत की शक्ल ले उठा। दनादन कुर्सियों, ढेलों या जो भी मिला, का आदान-प्रदान होने लगा। किसी को कुछ न मिला तो शामियाने की ही खूटियाँ उखाड़  लीं, खास तौर पर बारातियों ने क्योंकि उन्हें वहाँ के भूगोल की जानकारी थोड़ी कम थी। गालियों में एक-दूसरे से कई पुश्तों की खानदानी रिश्तेदारी निकालने में कोई कसर न छोड़ी गई। समधी-मिलन की रश्म में चार चाँद लगाने के लिए लाई गई बंदूक को वक्त से पहले ही गरजना पड़ा और शामियाने में नए बने छेद इस युद्ध के स्थाई गवाह बने। हुआ दरअसल यह था कि एक बहनोई या फूफा दर्जे के मेहमान लिए एक बारात पक्ष वाले ने एक लुंगी छाप को कुर्सी खाली करने को बोला तो उसने अकड़कर उठने से मन कर दिया।
“ ......... जे है से कि काहे खाली करें, अपने लोग बाराती हईं त हमहूँ सराती हईं, कवनों बात में कम  हीं का?”
“लगता है सरवा ठानिये के आइल है”! बारातीमेंसेकोई बोला. . . ।
फिर क्या था, गुड्डू, जो कि लड़के का चचेरा भाई था, उसका हाथ-पैर पहले चलता था और दिमाग बाद में, ने कुर्सी समेत उस सींकिया पहलवान को उठा फेंका और पाहुन के लिए सिंहासन एक झटके में ही खाली करा लिया। इसी तरह की सम्भाव्यताओं के लिए भी कुछ ‘लोगों’ को बाराती में लाने का चलन भी तो था।

खैर दोनों पक्षों के समझदार और बुजुर्ग लोगों ने मिलकर किसी तरह घरैयों को मेह्माननवाजी का वास्ता देकर तो बाराती को आसपास नक्सली बस्ती होने का डर और इस झड़प को किसी विशेष साजिश का हिस्सा बताकर यथास्थिति बहाल कराई। दाद देनी पड़ेगी नाच पार्टी को, जिसे फिर से गाना  और नाचना पड़ रहा था  ......... “नथनियाँ में गोली मारे ......... “। 

 श्रीकांत बड़े भैया से फुसफुसा रहे थे, “भैया कहीं ऊ सरवन दुबारा न अटैक कर दे, हमनी के तनी......... “
बड़का भइया - “धुर बुड़बक एक बेर पिटल चोर कब्बो दोबारा पिटे लागी आबे हे! तूँ निश्चिंत रह। हम अइसन- अइसन तमाशा कइक बेर देखलिक हे। झटके में जे भय गेल से भेल सँपर  के त हिंदुस्तानों पकिस्तान पर न चढ़े गेल ......... जो तूँ खाये-पिए के वेवस्था देख हो।” बड़का भइया का आत्मविश्वास देख श्रीकांत को भी भरोसा हो गया और वह नथनियाँ पर निशाना साधने चल पड़े।

हास्य के दोहे

हास्य के दोहे

किस जन्म का पाप किया, भुगत रहा हूँ आज।
पत्नी जाती काम  पर,  घर  का  करता  काज।।

तरस खाती है हर पल, कहती है शाबास।
हो न जाये चूक कहीं, अटकी रहती साँस।।

देर  तक  सोती  रहतीं,   ऐसे  उनके  ठाट।
गुड ब्वॉय बनकर हम तो, रहें ताकते बाट।।

एक पुकार पर उनके, हम झट से उठ जाँय।
बिन बात हाल पूछते,  फिरें  पास  मँडराय।।

हालत पतली देख कर, आती माँ की याद।
सजल नयन हैं पूछते, कहाँ करूँ फरियाद।।

नन्हीं गुड़िया भी अजब, लेती  मम्मा  नाम।
दिनभर खेलूँ साथ मैं, मुफ्त गया यह काम।।

भूले-भटके जो कभी, आये  कोई  मित्र।
जैसे अलबम में लगा, मिले पुराना चित्र।।

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...