तुम ही बतला दो मुझे, इस रिश्ते का क्या नाम दूँ
सुबह निछावर हो जिसपर, उसको ही हर शाम दूँ
जीवन पथ पर अगणित मिलते, मिलकर मुस्काते हैं
पड़े जरूरत पालक झपकते, गुम जो हो जाते हैं
क्षणभंगुर से बीते पल को, कह कैसे अभिराम दूँ
सम्मुख हों तो कब मिलता है, बोलो सम्मान यहाँ
रहकर दूर भी कब होता है, कहो सुनसान यहाँ
सतत भटकते इस दिल को, कैसे मैं आराम दूँ
सस्ता, सुंदर और टिकाऊ, जो ढूंढते हैं अक्सर
रख देते वे अरमान को, गहनों से खूब सजाकर
उनके जख्मों का कह दो, अब मैं क्या ईनाम दूँ
सुबह निछावर हो जिसपर, उसको ही हर शाम दूँ
जीवन पथ पर अगणित मिलते, मिलकर मुस्काते हैं
पड़े जरूरत पालक झपकते, गुम जो हो जाते हैं
क्षणभंगुर से बीते पल को, कह कैसे अभिराम दूँ
सम्मुख हों तो कब मिलता है, बोलो सम्मान यहाँ
रहकर दूर भी कब होता है, कहो सुनसान यहाँ
सतत भटकते इस दिल को, कैसे मैं आराम दूँ
सस्ता, सुंदर और टिकाऊ, जो ढूंढते हैं अक्सर
रख देते वे अरमान को, गहनों से खूब सजाकर
उनके जख्मों का कह दो, अब मैं क्या ईनाम दूँ