तीन चार पाँच ....

अंधेरी रात में
आसमान को निहारता है
और तारों को गिनता है
एक या एक और दो
टिमटिमाते से तारे को
पकड़ लेना चाहता है
बच्चा है, नादान है
सबकुछ सहेज लेना चाहता है
धरती से आकाश को
नन्हें कदमों से
नाप लेना चाहता है
तारों की आँखमिचौनी से
वह जिद्दी बच्चा
कहाँ हार मानने वाला है
उसे तो अब मजा आने लगा है
अपलक निहारने लगा है
जद्दोजहद को खेल बना लिया है
गायब होकर बाहर निकलने तक
करेगा अहर्निश इंतजार
और झलक पाते ही झट से
गिन लेगा और जीत लेगा
मुट्ठियाँ तान कर बोलेगा
तीन चार पाँच ....।

गुस्सा आता है मुझे

गुस्सा आता है मुझे

हाँ, मुझे भी गुस्सा आता है !  जब  मैं सड़क पर चल रहा होता हूं और देखता हूं कि आगे जा रही कार धीमी होती है, दरवाजा खुलता है, एक बिना भेजे का सर बाहर निकलता है और सड़क पर रंगीन पिचकारी सी, एक गाढ़ा, काला और लाल मिश्रित, मानों कलेजा गल कर तरल हो गया हो, छोड़ जाता है,  तो बहुत गुस्सा आता है।

ऐसे बेमौसम फुहारों का सामना कई बार करना पड़ता है। कभी किसी चलती हुई बस के बगल से गुजरते हुए तो कभी किसी स्कूटर या मोटरसाइकिल के पीछे चलते हुए। एक छोटी सी पिच …. और आपका हो गया काम तमाम। अगर बदकिस्मती से बन्दे ने गला खंखार लिया या नाक साफ कर लिया तो फिर कहना ही क्या! करते रहो गांधीगिरी! सबसे बढ़कर यह कि इस तरह की शरीफाना हरकतें करने वाले को आप किसी खास वर्ग या तबके से जोड़कर नहीं देख सकते। कलंकित करती हुई डिग्रियाँ इनके पास भी हो सकती हैं। वेशभूषा से विभेद कर पाना तो अब वैसे भी नामुमकिन है। गुटकों की अच्छी-खासी खपत तो टाई झाड़ने वालों में भी पाई गई है।

अब अपने ‘मित्र’ को ही देख लीजिए, तीन व्हाट्सऐप ग्रुप (बकबक समूह) में शामिल हैं। एक ही तस्वीर तीनों समूहों में पोस्ट करने से भी दिल नहीं भरता तो फोन में मौजूद प्रत्येक संपर्क को बारी-बारी या प्रसारण सेवा (ब्रॉडकास्ट) के द्वारा भी खास तरजीह देते हुए वही पोस्ट भेज कर खास तवज्जो देने का एहसास कराने से नहीं चूकते।  अब करते रहो डिलीट। मिटाते रहो मैसेज बॉक्स से, फाइल एक्स्प्लोरर से और बैकअप से  …. हा हा हा ! और तो और पोस्ट करने की बेसब्री इतनी कि इसका भी ख्याल नहीं रख पाते कि एक बार देख ही लिया जाये, ‘क्या पता, किसी ने पहले ही यह नेक काम कर डाला हो’!  हे हे हे….  ! दूसरे के किये का पुण्य थोड़े ही मिलता है। तीन साल से पका रहे जोक को भी मार्किट में नया है बोलकर चेप देते है। लगता है सारी दुनियाँ को हँसाने का जिम्मा इनके ही मजबूत कन्धों पर ब्रह्मा ने डाल रखी हो।

अब ‘उनको’ ही देख लीजिये न! ऐसा लगता है सदाचार का सारा ठेका इन्हें ही मिल गया हों। घर में बच्चे 11 बजे तक तो गुड मॉर्निंग नहीं करते और नसीहत देते हैं कि ‘जिसने सुबह सूर्योदय से पहले नहा-धोकर माता-पिता का आशीर्वांद नहीं लिया उसको कैंसर हो जायेगा’। घर के मसालों से ही सारी  बीमारियों का इलाज पक्का ! ‘शायद इसीलिए आजकल बड़ी तेजी से दवा दुकान बंद होते जा रहे हैं, क्या’! अब तो सब्जी कहते हुए भी नहीं लगता कि मसालेदार सब्जी खा रहा हूँ, अब तो लगता है या तो दावादार सब्जी खा रहा या फिर जहर खा रहा हूँ और बस क़यामत आने ही वाली है, फिर तो वसीयत कर ही देनी चाहिए। तभी दूसरा मैसेज याद आता है, बच्चों को लड़ मरने या आवारा गर्दी से बचाने का बस एक ही तरीका है, अपना सबकुछ आप ही फूँक डालो। इतने जतन से संजोये धन को संतानों को उड़ाने के लिए क्यों छोड़ जाना। उन्होंने तो वृद्धाश्रम ही भेजना है, तो क्यों नहीं अपनी गति-मति पहले ही कर ली जाये! एक से बढ़ कर एक उपाय! वक्त से पहले ही दर-ब-दर हो जाने का पूरा इंतजाम!  और असर भी  होने लगा है।  सप्ताहांत के घुमक्कड़ों की संख्या में अनायास ही बेतहासा इजाफ़ा हो रहा है। जाहिर है, न प्रकृति से प्रेम है, न वास्तुकला से कोई लेना देना! जहाँ भी जाना है, बस शॉपिंग ही करनी है। और लौट कर पड़ोसियों पर रोब ग़ालिब करना है। हे, चार्वाक के चरम शिष्यों, कुछ तो रहम खाओ!

सड़क पर जा रहे हों और पीछे से हॉर्न की आवाज जैसे कान फाड़ने की कसम खाये हो! जी में तो आता है कि काश इन आँखों से मिसाइल (अमेरिका वाला ना सही, उत्तरी कोरिया वाला ही सही) निकल सकते तो .......। अरे भाई, गाड़ी के आकर-प्रकार की क्या धौंस देते हो, अगर सामर्थ्य हो तो उड़कर निकल जाओ।

वैसे उम्र के लिहाज का तो जमाना ही गया हुजूर ।  घरों से लेकर बाहर तक...... ।

हम तो ग्वार-पाठे की सब्जी भी पिताजी के डर से रोते-रोते खा लिया करते थे। अब तो मायें घर के वरिष्ठतम सदस्य की मर्जी से नहीं, बच्चों की फरमाइश पर रसोई के मेन्यू तय करती हैं। कुछ भी पका लो चाहे घर में, जबतक सप्ताह में दो दिन बाहर के अमृत न चख लें इनके अम्ल जगते ही नहीं। वाह रे समय, बाहर का कूड़ा चटखारेदार और घर का, माँ की हाथों का बना 'बोरिंग है यार' ...... । अब तो भारतीय रसोईघरों में लगता है मैगी ही रह गयी है, प्यार का पेटबुझाउ धागा बनकर।

बाहर की तो बात ही क्या? कसरती बाहें हों, आधी इंच से थोड़ी कम दाढ़ी हो, एक एस.यु.वी. या सुपर बाइक पर सवार हो, भूलकर भी साइड न मांग लेना भाई, लेने के देने पड़ सकते हैं। पार्कों में कूड़ा फैलाते जवां जोड़े, भूलकर भी कूड़ेदान की और इशारा किया तो बस समझ लेना, खैरियत नहीं।

गाड़ियों के शीशे उतरते हैं और प्लास्टिक की थैलियां नजाकत के साथ लहराती हुई सड़क किनारे या डिवाइडर पर करने से उगाई गयी झाड़ियों में फँसकर वायु की दिशा व तीव्रता बता-बताकर मौसम विभाग का काम हल्का कर रही होती हैं।

पीढ़ियों के फासले तो हमेशा ही रहे हैं। मगर, आज के तो कहने ही क्या! आज के बच्चे मानों किसी दूसरी ग्रह से आये एलियन (विचित्र प्राणी) हों जिसकी कोई भी बात इस धरती के खूसट समझ ही नहीं सकते!

कुछ दिनों से एक अजीब सी उलझन पड़ गयी है! दफ्तर में काम होता है कि सिर्फ मोबाइल-मोबाइल चलता है? जिसे भी देखो सिर झुकाये मोबाइल में ही उलझा पाता हूँ, समझ ही नहीं आता कि आखिर काम कैसे होता है? एक बैंक पहली बार इस सच का सामना नहीं कर पाया। …. नतीजा क्या हुआ!

सबसे अधिक गुस्सा तो तब आता है, जब यह कह कर गुस्से की हवा निकाल दी जाती है कि इसे तो गुस्सा आता ही नहीं।

अगर किसी ने आजतक नहीं कहा, तो हम ही आज कहे देते है, कभी-कभी गुस्सा आना भी देश और समाज के लिए ठीक ही रहता है। शर्त तो लागू होती ही है, सीमा में हो और सकारात्मक हो नहीं तो अपराध हो जाने का खतरा रहता है।

लघुकथा - बेटी बचाओ बेटी पढाओ

अस्पताल के गलियारों में इन दिनों बस एक ही फुसफुसाहट चल रही थी। स्टाफ, नर्स या सफाई कर्मचारी जो भी कोई
किसी से मिलता, बस यही  पूछ बैठता! … “क्या हुआ, आज भी 414 नम्बर का कोई नहीं आया?”
      “अरे … मिलने भला कौन आयेगा! जब मरने को छोड़ गये हों! कोई बता रहा था डिप्टी सुपरिटेंडेंट को बता कर
गया है कलयुग का श्रवण कुमार कि खत्म होने पर फोन कर देना, बिल सेटल कर बाडी ले जाऊंगा।”
       “सुनते हैं बेटा और बहू दोनों ही बहुत बड़े ओहदों पर हैं, बराबर काम के सिलसिले में विदेश जाना लगा रहता है।”
        “अरे काहे का बड़ा, थू है ऐसे बड़प्पन पर जो आखिरी वक्त पर माँ-बाप को इस हालत में छोड़ जाते हैं!
… भगवान भला करे सिस्टर निवेदिता का, इस तरह सेवा कर रही है बेचारी, जैसे सगी माँ हो।”
      “सुनते हैं अब तो खाना भी वह घर से ही लाने लगी है, उसके लिए।”
      “हाँ, क्यों नहीं करेगी वह, … खुद भी कचरे के डब्बे में पड़ी मिली थी, इसी अस्पताल की सफाई वाली थी मीरा,
उसीने इसको पाला था। इसे तो हर औरत में अपनी माँ ही नजर आती है… पगली कहीं की … ।”
      “क्या जिंदगी बनाई है औरत की, बच्ची हो या बुढ़िया, कभी कचरे के ढेर तो कभी अस्पताल के बेड पर फेंक दी
जाती है!”

      “मत भूलो कि दोनों ही अवस्थाओं में सम्भालने वाली भी कोई औरत ही होती है। … चलो सब अपने काम पर
जाओ सुपरवाइजर आता ही होगा …।”

हे देवी नमन

हे देवी !
कितने तेरे रूप
माँ, बहन और भार्या
दादी, नानी, मामी, बुआ, मौसी........
देवी कह दासी बना दी गई
आभूषणों की बेड़ियों में जकड़ी गई
कभी उफ तक न किया।
गृहस्थी की ज़िम्मेदारी ऐसी
बह गया समय कब पता न चला!
सृजन का सुख अनंत
भूल गई सारे दुख
संतति के सुख मे।
कर दिया न्योछावर
अर्पित कर दिया सर्वस्व
समर्पण का भाव अविरल!
खुद को खोकर भी
सबकुछ पा लेने का संतोष
नमन तुम्हें हे देवी

तुम नारी हो ।

दहेज

कलंक का एक टीका है
समाज के चेहरे पर बदनुमा धब्बा है
कोढ़ है, खराश है, एक गलाजत है
जिसका नाम दहेज है।


पाखण्ड का प्रतीक है
झूठ है, प्रपंच है
छुद्र है, दरिद्र है
अतयंत ही कारुणिक है


आये तो मजा है
माँग ले तो सजा है
आग का दरिया है
वही समझे जिसने झेला है


जाल फरेब का है
देखो ये प्रपंच कैसा है
खुद फंसतीचिड़ियाँ है
व्यर्थ बदनाम बहेलिया है


हर शख्स परेशान है
ढो रहा निशान है
बातें तो इंसानियत की हैं  
मगर लहूलुहान भी वही है


धन का बेहिसाब प्रदर्शन है
देश का नकली दर्शन है
काल का क्रूर नर्तन है
बंद करो झूठ का संकीर्तन है


कभी कुँआरी रह जाती है
कभी बली चढ़ा दी जाती है
मानवता सिसकती है
दहेज की चक्की में बेटी पिस जाती हैं  

यात्रा संस्मरण - एक अनुभव जरा हटके

वाकया मेरी  ताजातरीन यात्रा का है।  अनुभव भी कुछ हटकर है, कुछ आत्म साक्षात्कार जैसा है,
कुछ बनी बनाई धारणाओं के टूटने का भी है।

अंदाजा लगाइये कि आप ट्रेन की आरक्षित सीट पर पहुचें और पता चले कि आपकी बर्थ चार ऐसे
इंसान जो कद काठी में तो पुरुषों की तरह हों मगर नारी वेश में हों, आपकी निर्धारित सीट पर
काबिज हैं, तो आप पर क्या गुजरेगी! जी हाँ, मुस्कुरा रहे होंगे आप! लेकिन इसमें मुस्कुराने की
क्या बात हो गई! एक ही ईश्वरीय रचना होते हुए भी, इतनी भ्रांतियां क्यों पाई जाती हैं किन्नरों के बारे में!


बिल्कुल सही अंदाजा लगाया आपने। नर्वस सा हो गया। मै ही क्यों, मेरा एक और सहयात्री भी। उनकी
बातों से पता लगा, उनमें से एक शायद गम्भीर रूप से बीमार हो। चार किन्नरों में से एक का बर्थ पास
वाली कोच में था। स्वाभाविक ही था कि वे एडजस्टमेंट की अपेक्षा में थे, एक साथ हो जाने की। कोई भी
इंसानी समूह ऐसा ही करना चाहेगा। धीरे-धीरे बातें भी होने लगीं। यहां भी पहल की उन्हीं के दल के नेता
ने, जिसे वे माँ कहते थे। माँ नामक लड़कों की तरह बालों वाले इस युवा किन्नर में गजब की नेतृत्व क्षमता
दीख रही थी।


शुरुआत में ही कई बार श्रीमती जी ने सुरक्षा निर्देश जारी कर दिये इशारों-इशारों में ही। समय के साथ स्थितियाँ
स्पष्ट होनी शुरू हुईं। उनके पास कोई निचली बर्थ नहीं थी, जबकि एक बीमार साथी के कारण उन्हें इसकी
आवश्यकता तो थी ही। हमारे दूसरे सहयात्री ने सहृदयता दिखाई और यह प्रस्ताव दे डाला कि हम तीनों सामान्य
जन एक तरफ हो जाएं। परंतु संवाद हीनता के कारण एक गड़बड़ हो गई और जबा नामक किन्नर अपने ऊपरी
बर्थ पर जाकर सो गई और फिर अगले दिन नाश्ते के समय ही उतरी। इस प्रकार सीट समझौते के पहले फार्मूले
की भ्रूणहत्या हो चुकी थी। अब दूसरा फार्मूला यह बचता था कि इस तरफ वाली बीच की और नीचे वाली बर्थ भी
उन्हें दे दी जाए और दूसरी तरफ वाली अर्थात चार, पाँच और छः  हम ले लें। ऐसा लगा ही था कि सहमति बन गई
है तभी एक और लोचा आ गया। बीमार किन्नर किसी प्रकार दूसरे की सहायता से थोड़ी चहलकदमी करने गई तो
श्रीमती जी उछलकर मेरे पास आ गईं, पता नहीं, खतरे से बचने के लिए या बचाने के लिए! चाहे जो भी वजह रही
हो, सीट एडजस्टमेंट का दूसरा फार्मूला भी इसके साथ ही ध्वस्त हो गया। अब विकल्प यह बचता था कि या तो हम
सभी अपनी-अपनी निर्धारित शायिकायें पकड़ें जिसकी सम्भावना कम नजर आ रही थी उनकी शारीरिक भाषा तथा
डीलडौल के कारण, या फिर, एक, दो और छः हमारे पास रहे। श्रीमती जी ने भी अपनी भाव भंगिमा से स्पष्ट कर
दिया कि वे ऊपर नहीं जा सकतीं। अब तक के दो प्रस्तावों को बिखरते देखकर निर्णय को अंतिम पल तक टालने में
ही भलाई समझी। कहते भी हैं, वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है।


टिकट निरीक्षक आया और पहचान पत्रों की जाँच कर चला गया। सात नंबर की सीट की उनकी मंशा पर टीटी ने
पानी फेर दिया यह कहकर कि ‘उसकी है’। टीटी के जाते-जाते माँ ने यह स्पष्ट कर दिया कि पास वाली कोच की
चौथी सवारी जो कि गुरू सम्बोधित हो रही थी के पास पहचान पत्र नहीं था। उनकी आरम्भिक बेचैनी का कारण
भी शायद यही था।


आगे की मेरी यात्रा उनके बातों को सुनने और समझने से ही बाबस्ता रही और यही पहलू मेरी इस यात्रा की खासियत
भी है। माँ अपने बीमार साथी को शल्यचिकित्सा हेतु कलकत्ता से लेकर दिल्ली आई थी। वापिसी में गुरू और जबा भी
साथ हो लिये। इस प्रकार वे चार एक परिवार की मानिंद तत्काल में टिकट लेकर कोलकाता की यात्रा पर थे।


बातों-बातों में यह भी पता चला कि कुछ दिनों पहले ही अपने एक और साथी/शिष्य को लेकर माँ ऑपरेशन के लिए
दिल्ली आ चुकी थी। इसलिये वह तो रेल के नियम कायदों से वाकिफ थी पर उसके अन्य साथी लंबी यात्रा में घबराते थे।


हमारे सहयात्री ने छः नम्बर की ऊपर की शायिका लेना स्वीकार किया, जिसे माँ ने गुरू को समझाया और तकलीफ में
पीड़ित उसके साथी के प्रति सम्वेदना के प्रति अनकहा आभार प्रदर्शित किया। वे मुख्यतया बंगला में वार्तालाप कर रहे
थे। बीच-बीच में उनका खिलंदड़ापन भी जाहिर हो रहा था, जैसे कि किसी भी खाली पड़ी शायिका पर जाकर पसर जाना
या हाथों को झटक-झटककर जोर-जोर से बातें करना या गाना गाने लग जाना बिना किसी की रत्तीभर भी परवाह किये
हुए।


जबा ने रात को खाना नहीं खाया था। सुबह में जबतक उसने नाश्ता नहीं कर लिया तबतक माँ की चिंता और बेचैनी
भावना से भीगी प्रतीत हो रही थी। गुरू का माँ के और जबा द्वारा बीमार के पैर दबाना मानवीय सम्वेदना के उत्कृष्ट
प्रदर्शन थे।


रास्ते से फोनकर माँ ने अपने किसीे अन्य साथी को तीन किलो लोटे माछ और डेढ़ किलो पारसा माछ खरीदकर रखने
का आग्रह किया। जाहिर है अगले दिन की पार्टी की तैयारी हो रही थी। फोन पर किसी से बातें करते हुए माता-पिता की
महिमा का बखान दिल को छू गया। उसी माता-पिता की जो जन्म देने के बाद उन्हें एक स्वाभाविक जीवन देने में
असमर्थ थे। कोई गिला-शिकवा नहीं, जो है, बस उसका कृतज्ञता ज्ञापन! हर भोजन के बाद बिना किसी अपवाद के ईश्वर
का धन्यवाद प्रदर्शन हमारे लिए भी नसीहत थी।

अब अनंत का तत्व प्रश्न तो यह है कि ये किन्नर आते कहाँ से हैं? अगर इसी समाज की उपज ये भी हैं, जैसे कि हम
सभी तो फिर इतने फासले और भ्रांतियाँ क्यों प्रचलित हैं? कानून ने तो इन्हें एक तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दे दी
मगर क्या हम तैयार हैं?

कूड़े बीनने वाला लड़का

हर रोज, सुबह, तड़के उठकर 
निकल जाता है वह 
और कालिख पोत आता है 
सूरज के मुख पर 
जो तमतमा कर हो जाता है लाल 
और खिलखिला उठता है वह। 
हँस देने से उसके 
शर्मा कर भाग जाता है अंधेरा
तब कहीं जाकर होता है सवेरा। 
सवेरा, जो भूख लेकर आता है 
अभावों के दिन लेकर आता है 
छोटे-छोटे कंधों पर 
बड़े-बड़े बोझ डाल जाता है 
जो घर से निकलता है 
जिम्मेदारियों का बोझ लेकर 
और लौटता है 
व्यवस्था की लाचारियों से दबकर 
सिसकता बचपन आज बीनता है 
उम्मीदों के कचरे 
जलाए रखने की खातिर 
टिमटिमाते सपनों की लौ।

तब होगी पूजा स्वीकार

नहीं कोई अगर-मगर
मन में न रहे कोई प्यास
रख देना जब चित्त उघाड़
तब होगी पूजा स्वीकार।
भुला कर सारे गिले-शिकवे
हो जाए जब प्रफुल्लित मन
कर देना सर्वस्व समर्पण
तब होगी पूजा स्वीकार।
भेदभाव की बलि चढ़ा कर
नफरतों के मूल जलाकर
जब करो प्रभु का जयकार
तब होगी पूजा स्वीकार।
करुणा के कर में दीप सजाकर
अधरों पर मीठे बोल बसाकर
कर देना जब अहम् समर्पण
तब होगी पूजा स्वीकार।
कर लेना जब आत्मसाक्षात्कार
तज देना मन के विकार
फिर करना दंडवत साष्टांग
तब होगी पूजा स्वीकार।

लघुकथा - नुश्खे पर आहार

हर बुधवार को गाँव के प्राथमिक चिकित्सालय में प्रखंड स्तर से एक चिकित्सक की ड्यूटी लगती है । आज डा॰ विजय राम की बारी है । बहुत सारे मरीजों में से एक सुगिया भी है जो अपने तीन साल के बच्चे को गोद में लेकर आई है । उसका बच्चा चल भी नहीं पा रहा । माथा बड़ा सा, पेट फूला हुआ और हाथ पैर सूखी टहनियों की तरह। पतली सी गर्दन बड़ी मुश्किल से सिर का बोझ सम्हालने की कोशिस करते से प्रतीत हो रहे थे। आँखें मानों खोढ़रों से बाहर आने को बेताब हो रहे हों।
डॉक्टर ने मुआयना किया। बीमारी तो पहली नजर में ही समझ में आ गयी थी। फिर भी तसल्ली के लिए पलकों को उठाकर पुतलियों का पीलापन देखा, पेट को ठोंक कर देखा, स्टेथोस्कोप लगा कर धड़कनें सुनी और हाथों को कोहनी से तथा पैरों को घुटनों से मोड़ कर देखा। बच्चे को जीभ दिखाने को कहा। सुगिया पूरे मनोयोग से बच्चे के गाल दबा-दबा कर जीभ निकलवा कर दिखाने लगी।
डॉक्टर अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया और सर झुकाकर सरकारी अस्पताल की छोटी सी पर्ची (एक चौथाई पन्ने वाली) पर पूरे जतन से लिखने लगा। लिख चुकने के बाद पर्ची को सुगिया के हाथों में देते हुए बोला ........
“कुछ विटामिन की दवाइयाँ हैं जो यहीं मुफ्त में मिल जाएंगी। बच्चे के खान-पान पर ध्यान देने की जरूरत है। दूध और फल खाने में देना होगा। “
सुगिया को काटो तो खून नहीं! सोचकर आई थी कि ‘दवाई और डॉक्टर के हाथ का यश. ......... बच्चा ठीक हो जाएगा। कितनी मुश्किल से मेहनत मजूरी कर माड़-भात, नमक रोटी का इंतजाम कर पा रही थी! दूध और फल ....... हुंह ......... . . ।’

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...