गुस्सा आता है मुझे
हाँ, मुझे भी गुस्सा आता है ! जब मैं सड़क पर चल रहा होता हूं और देखता हूं कि आगे जा रही कार धीमी होती है, दरवाजा खुलता है, एक बिना भेजे का सर बाहर निकलता है और सड़क पर रंगीन पिचकारी सी, एक गाढ़ा, काला और लाल मिश्रित, मानों कलेजा गल कर तरल हो गया हो, छोड़ जाता है, तो बहुत गुस्सा आता है।
ऐसे बेमौसम फुहारों का सामना कई बार करना पड़ता है। कभी किसी चलती हुई बस के बगल से गुजरते हुए तो कभी किसी स्कूटर या मोटरसाइकिल के पीछे चलते हुए। एक छोटी सी पिच …. और आपका हो गया काम तमाम। अगर बदकिस्मती से बन्दे ने गला खंखार लिया या नाक साफ कर लिया तो फिर कहना ही क्या! करते रहो गांधीगिरी! सबसे बढ़कर यह कि इस तरह की शरीफाना हरकतें करने वाले को आप किसी खास वर्ग या तबके से जोड़कर नहीं देख सकते। कलंकित करती हुई डिग्रियाँ इनके पास भी हो सकती हैं। वेशभूषा से विभेद कर पाना तो अब वैसे भी नामुमकिन है। गुटकों की अच्छी-खासी खपत तो टाई झाड़ने वालों में भी पाई गई है।
अब अपने ‘मित्र’ को ही देख लीजिए, तीन व्हाट्सऐप ग्रुप (बकबक समूह) में शामिल हैं। एक ही तस्वीर तीनों समूहों में पोस्ट करने से भी दिल नहीं भरता तो फोन में मौजूद प्रत्येक संपर्क को बारी-बारी या प्रसारण सेवा (ब्रॉडकास्ट) के द्वारा भी खास तरजीह देते हुए वही पोस्ट भेज कर खास तवज्जो देने का एहसास कराने से नहीं चूकते। अब करते रहो डिलीट। मिटाते रहो मैसेज बॉक्स से, फाइल एक्स्प्लोरर से और बैकअप से …. हा हा हा ! और तो और पोस्ट करने की बेसब्री इतनी कि इसका भी ख्याल नहीं रख पाते कि एक बार देख ही लिया जाये, ‘क्या पता, किसी ने पहले ही यह नेक काम कर डाला हो’! हे हे हे…. ! दूसरे के किये का पुण्य थोड़े ही मिलता है। तीन साल से पका रहे जोक को भी मार्किट में नया है बोलकर चेप देते है। लगता है सारी दुनियाँ को हँसाने का जिम्मा इनके ही मजबूत कन्धों पर ब्रह्मा ने डाल रखी हो।
अब ‘उनको’ ही देख लीजिये न! ऐसा लगता है सदाचार का सारा ठेका इन्हें ही मिल गया हों। घर में बच्चे 11 बजे तक तो गुड मॉर्निंग नहीं करते और नसीहत देते हैं कि ‘जिसने सुबह सूर्योदय से पहले नहा-धोकर माता-पिता का आशीर्वांद नहीं लिया उसको कैंसर हो जायेगा’। घर के मसालों से ही सारी बीमारियों का इलाज पक्का ! ‘शायद इसीलिए आजकल बड़ी तेजी से दवा दुकान बंद होते जा रहे हैं, क्या’! अब तो सब्जी कहते हुए भी नहीं लगता कि मसालेदार सब्जी खा रहा हूँ, अब तो लगता है या तो दावादार सब्जी खा रहा या फिर जहर खा रहा हूँ और बस क़यामत आने ही वाली है, फिर तो वसीयत कर ही देनी चाहिए। तभी दूसरा मैसेज याद आता है, बच्चों को लड़ मरने या आवारा गर्दी से बचाने का बस एक ही तरीका है, अपना सबकुछ आप ही फूँक डालो। इतने जतन से संजोये धन को संतानों को उड़ाने के लिए क्यों छोड़ जाना। उन्होंने तो वृद्धाश्रम ही भेजना है, तो क्यों नहीं अपनी गति-मति पहले ही कर ली जाये! एक से बढ़ कर एक उपाय! वक्त से पहले ही दर-ब-दर हो जाने का पूरा इंतजाम! और असर भी होने लगा है। सप्ताहांत के घुमक्कड़ों की संख्या में अनायास ही बेतहासा इजाफ़ा हो रहा है। जाहिर है, न प्रकृति से प्रेम है, न वास्तुकला से कोई लेना देना! जहाँ भी जाना है, बस शॉपिंग ही करनी है। और लौट कर पड़ोसियों पर रोब ग़ालिब करना है। हे, चार्वाक के चरम शिष्यों, कुछ तो रहम खाओ!
सड़क पर जा रहे हों और पीछे से हॉर्न की आवाज जैसे कान फाड़ने की कसम खाये हो! जी में तो आता है कि काश इन आँखों से मिसाइल (अमेरिका वाला ना सही, उत्तरी कोरिया वाला ही सही) निकल सकते तो .......। अरे भाई, गाड़ी के आकर-प्रकार की क्या धौंस देते हो, अगर सामर्थ्य हो तो उड़कर निकल जाओ।
वैसे उम्र के लिहाज का तो जमाना ही गया हुजूर । घरों से लेकर बाहर तक...... ।
हम तो ग्वार-पाठे की सब्जी भी पिताजी के डर से रोते-रोते खा लिया करते थे। अब तो मायें घर के वरिष्ठतम सदस्य की मर्जी से नहीं, बच्चों की फरमाइश पर रसोई के मेन्यू तय करती हैं। कुछ भी पका लो चाहे घर में, जबतक सप्ताह में दो दिन बाहर के अमृत न चख लें इनके अम्ल जगते ही नहीं। वाह रे समय, बाहर का कूड़ा चटखारेदार और घर का, माँ की हाथों का बना 'बोरिंग है यार' ...... । अब तो भारतीय रसोईघरों में लगता है मैगी ही रह गयी है, प्यार का पेटबुझाउ धागा बनकर।
बाहर की तो बात ही क्या? कसरती बाहें हों, आधी इंच से थोड़ी कम दाढ़ी हो, एक एस.यु.वी. या सुपर बाइक पर सवार हो, भूलकर भी साइड न मांग लेना भाई, लेने के देने पड़ सकते हैं। पार्कों में कूड़ा फैलाते जवां जोड़े, भूलकर भी कूड़ेदान की और इशारा किया तो बस समझ लेना, खैरियत नहीं।
गाड़ियों के शीशे उतरते हैं और प्लास्टिक की थैलियां नजाकत के साथ लहराती हुई सड़क किनारे या डिवाइडर पर करने से उगाई गयी झाड़ियों में फँसकर वायु की दिशा व तीव्रता बता-बताकर मौसम विभाग का काम हल्का कर रही होती हैं।
पीढ़ियों के फासले तो हमेशा ही रहे हैं। मगर, आज के तो कहने ही क्या! आज के बच्चे मानों किसी दूसरी ग्रह से आये एलियन (विचित्र प्राणी) हों जिसकी कोई भी बात इस धरती के खूसट समझ ही नहीं सकते!
कुछ दिनों से एक अजीब सी उलझन पड़ गयी है! दफ्तर में काम होता है कि सिर्फ मोबाइल-मोबाइल चलता है? जिसे भी देखो सिर झुकाये मोबाइल में ही उलझा पाता हूँ, समझ ही नहीं आता कि आखिर काम कैसे होता है? एक बैंक पहली बार इस सच का सामना नहीं कर पाया। …. नतीजा क्या हुआ!
सबसे अधिक गुस्सा तो तब आता है, जब यह कह कर गुस्से की हवा निकाल दी जाती है कि इसे तो गुस्सा आता ही नहीं।
अगर किसी ने आजतक नहीं कहा, तो हम ही आज कहे देते है, कभी-कभी गुस्सा आना भी देश और समाज के लिए ठीक ही रहता है। शर्त तो लागू होती ही है, सीमा में हो और सकारात्मक हो नहीं तो अपराध हो जाने का खतरा रहता है।