चुनावी दोहे

मिल सकता अवसर पुनः, खूब मचाना लूट।
बार-बार जो भज सको,  वही  पुराना  झूठ।।

झाँसा-पट्टी  खा   गये,   भूल गये  इतिहास।
चल पड़ा फिर रिमोट से, सत्ता का परिहास।।

मान-मनौव्वल शुरु हुआ, कौन बने सिरमौर।
आगे की  अब  सोचिये,  आया  कैसा  दौर।।

लो जी अब तो हो गये,  हम भी हैं निरपेक्ष।
मन की बात मत करना, अर्थ लगा सापेक्ष।।

जीत मिली पर खुश नहीं,  कैसा आया काल।
खुद के  बुने  उलझ  गये,  वादों  के  जंजाल।।

संभव है हर बार ही, झोंक सको तुम धूल।
कुछ दिनों के बाद ही, जनता जाती भूल।।

माफ किया हमने तुझे, मत करना फरियाद।
भूल गये सब लोभ में,  रहा न कुछ भी याद।।

छोटी-मोटी बात पर,  नाप  दिया  सरकार।
आगे की तो बात क्या, शुरू अभी तकरार।।

कीमत मत की भूलकर,  बेच  दिया  बेमोल।
अपनी किस्मत आप ही, रखकर डंडी तोल।।

चक्र घूम रथ का  गया,   ऐसा  चला  कुचक्र।
अर्द्ध-सत्य ने फिर किया, राह काल का वक्र।।

नक्कारे की चल पड़ी, उल्टी सीधी चाल।
बल्ले-बल्ले हो रही ,  ठोंको  देकर  ताल।।

सिक्का खोटा चल गया, चहक रही मुस्कान।
इतिहास मगर कह रहा,  फीकी  है पकवान।।

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