दुनियाँ निराली
इसके खेल निराले ।
गज़ब है यह
शतरंज का खेल ।
ना जाने कब शह मिले
और कब हो जाए मात ।
मार्च के महीने में देखो
कैसी तेज चाल !
बनी हुई सड़क को
घिस कर रुखड़ा बनाते हैं
फिर उसपर हल्के से
तारकोल से काम चलाते हैं ।
देख लेंगे बाकी भी
बस बिल यह पास हो जाये ।
अपने-अपने कायदे हैं
अपनी-अपनी चाल ।
साल भर संचिकायें खाती हैं धूल
मगर देखो अब कैसी
चल रही दुलकी चाल !
सारे रुके पड़े बजट का
चंद दिनों में होता बंटाधार।
अवसर बन गया देखो
आपसी प्यार मुहब्बत के इजहार का !
किसी को शिकायत नहीं
किसी की फरियाद नहीं ।
अपना हिस्सा है
अपना लक्ष्य है
अपनी साझेदारी है
सब मिलीभगत का खेल है ।
आज काली है
कल उजला होगा ।
वजीर चूक जाए तो
प्यादा बन वजीर
देखो कैसे इतराये