यात्रा संस्मरण - सुनामी की याद

सन् 2004, दिसंबर महीने की 26 तारीख। चेन्नई, 1996 तक मद्रास नाम से ही जाना जाता था। जब उत्तरी भारत ठंढ में सिकुड़ना शुरू कर देता है, तब दक्षिण में अगर लौटती मानसून की झड़ी न लग जाये तो मौसम इतना खुशनुमा हो जाता है कि भ्रमण के लिए आदर्श समय बन जाता है। यही वह समय है, जब वहाँ आर्द्रता तथा गर्मी भी कम होती है।

उस खास तिथि का जिक्र खुशनुमा होने की वजह से कतई नहीं कर रहा बल्कि इसके साथ बाबस्ता हादसा, जिसकी वजह से वह सुहानी सुबह, इस कदर भयावह हो उठी कि कुछ अंतराल के बाद किसी न किसी कारण से विध्वंशक स्मृतियाँ ताजा हो उठती हैं, रोंगटे खड़े हो जाते हैं, अंतरात्मा सिहर उठती है और सर्वशक्तिमान ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।

हमारे विभाग का मुख्यालय तथा प्रशिक्षण केंद्र चेन्नई में अवस्थित है। मौसम सही होने की अपेक्षा में दिसंबर से मार्च के दौरान ही वहाँ का दौरा हम सभी पसंद किया करते हैं। एक लम्बे प्रशिक्षण के सिलसिले में, शायद डेढ़ महीने का रहा होगा, चेन्नई गया हुआ था। प्रशिक्षण केंद्र पर ही ठहरने की व्यवस्था थी। सप्ताहांत की दो दिनों की छुट्टियों में अपना रूम पार्टनर शुक्रवार की शाम में ही बस से बंगलोर, अब बंगलुरु, चला गया था।

रविवार रात में अपने एक सहकर्मी का जन्मदिवस था। इस सिलसिले रात के डेढ़ बजे तक जमकर पार्टी हुई थी। बेसुरे गाने गए और भोंडे नाच नाचे गए। इनसे भी बढ़कर कुछ यारों ने तो इंतजाम भी कर लिया प्रतीत होता था। कम से कम अतिरिक्त जोश देख कर तो ऐसा ही प्रतीत होता था ! स्वाभाविक था कि सुबह देर से नींद खुली।  कुछ लोगों के साथ मिल कर तय हुआ था कि तड़के उठकर माउन्ट रोड से मरीना बीच तक सुबह की सैर पर चलेंगे। यदाकदा हम ऐसा ही किया भी करते थे। साढ़े छः से कुछ ही पहले जब चाय और अखबार के साथ कैंटीन वाले लड़के ने घंटी दबाई तो अलसाया सा उठकर दरवाजा खोला और ले आया।

जैसे ही कप में डाल कर कुर्सी पर बैठा कि दरवाजे से किट-किट की आवाज आने लगी। ऐसा लगा जैसे पंकज बंगलोर से लौट आया हो। दरवाजा खोला, कहीं कुछ नहीं था, एक भयानक सन्नाटे का एहसास हो रहा था। बंद कर दिया और फिर कुर्सी पर बैठा। इस बार कुर्सी हिलती सी प्रतीत हुई। मैं मन ही मन मुस्कुराया, ‘शायद नींद ठीक से नहीं आई, या फिर लगता है रक्तचाप बढ़ गया है’! अचानक सातवें माले से जयाकोडी मैडम के शेरू के बहुत तेज आवाज में भौंकने की आवाज सुनाई पड़ी। फिर गलियारे से भागते कदमों की आहटें सुनाई पड़ने लगीं। थोड़ी ही देर में माजरा समझ में आ गया था। ...... यह भूकंप का झटका था।

15 मिनट से आधे घंटे के भीतर सभी फिर से एकबार कॉमन रूम में एकत्रित होते हैं। टी.वी.पर अतिरंजित रिपोर्ट देखने के लिए तथा एक दुसरे की खिंचाई करने के लिए। सबसे मजेदार तो यह था कि सभी ने एक दुसरे को छत की ओर भागते हुए देख लिया था। मतलब किसी ने किसी को नहीं देखा था, मगर प्रमाणित करने की होड़ सी लग गई थी। मोबाईल आ चुका था, सबों ने अपने घरों को कुशलक्षेम भेजे और लिए। जिसके पास मोबाइल नहीं भी था, दूसरों का इस्तेमाल किया या रिसेप्शन पर बने पी.सी.ओ. का इस्तेमाल किया।

थोड़ी ही देर में झटका और उत्तेजना ख़त्म हुई और सभी अपनी तैयारियों में जुट गए। नाश्ता साढ़े आठ बजे से और 10 बजे से प्रशिक्षण कक्षा। मेरी चिंता बस अब पंकज को लेकर थी, जो नौ बजे तक आ गया तो उस ओर से भी निश्चिन्त हो गया था। मगर वही यह खबर लेकर भी आया कि बाहर बहुत तबाही हुई है। कितनी, इसका अंदाजा न उसे था, न मुझे, न हमारे सहमर्मियों में से किसी और को ही। जीवन में पहली बार ‘सुनामी’ शब्द सुना, जिसका शाब्दिक अर्थ भी उस दिन से पहले कहाँ पता था ! कुछ तो भाषाई अज्ञान और कुछ स्थानीय संबधों का अभाव या फिर प्रबंधन का चातुर्य, हम कुछ हद तक विध्वंश को लेकर बेखबर ही रहे। शाम को एकबार फिर मरीना जाने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा इसलिए कि कोई भी बस, ऑटो उधर नहीं जा रही थी और विवेकानंद मार्ग पर से ही पुलिस ने हमें पैदल भी मरीना बीच की ओर जाने से रोक दिया। अभी तक भी सिर्फ इतना ही पता लग पाया कि समुद्र का पानी शहर के नालों में से होकर घुस आया था, जिससे गलियों में पानी भर गया था।

वस्तुस्थिति का अंदाजा तो अगली सुबह के अख़बार और लोगों से मुलाकात के बाद लगा। रिक्टर पैमाने पर नौ के आसपास का भूकंप सुमात्रा के पश्चिमी किनारे (इंडोनेशिया) पर भारतीय तथा वर्मा भूगर्भीय प्लेटों के बीच टक्कर के परिणामस्वरूप आया था, जिसका पश्चातवर्ती प्रभाव सुनामी लहरों के रूप में आया। सौ फीट से भी ऊँची सागर की लहरों ने किनारों की मर्यादा को ध्वस्त कर दिया और हिन्दू अखबार के अनुसार 135 लोग तो सिर्फ चेन्नई शहर में ही काल कवलित हो गए। मछलीपट्नम, मायलापुरम, केरल के तटीय हिस्सों . . . . . . . .  . ओफ्फ . . . . . . . . . । एक सौ अट्ठारह के करीब लोग तो शायद मरीना बीच पर ही रेहड़ियाँ लगाने वाले या सुबह की सैर करने वाले थे जो मौत की दौड़ में रेत पर भागते हुए सुनामी नामक दैत्य से हार गए और लौटती लहर के साथ याद बनकर मरीना बीच की चमकती बालुकाराशि पर एक लुढ़कती पुढ़कती लाश बनकर रह गए।

इसप्रकार थी मौत की वह ठंढी सी झुरझुरी, जो हमने अगली सुबह महसूस की। अगर यथानिर्धारित कार्यक्रमानुसार हम समुद्र तट पर होते तो. . . . . . . .  . । ईश्वर की मर्जी के आगे भला किसका जोर चला है, चाहे जिस रूप में जिसे बचा ले या जिसे बुला ले . . . . . . . . ।

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