सृष्टि

सृष्टि का अनुपम विधान
हर मौसम आता है आता है
रूप बदल कर
एक नया परिधान लेकर
कभी तपती धरती
स्वेद रसधार बहती
तो कभी सघन सर्दी
ठिठुरते हाथ और पाँव
गहन छटा निराली लेकर
आती बरसात मतवाली
शरद, पतझड़ और बसंत
अनुपम, मनभावन धरा का कलेवर
नियंता का मोहक अनुशासन
लय, गति, अविरल
युग-युगांतर, कालखंड
आबद्ध,  निमग्न, आलिंगन
पुष्पवेणि, तरुकुंज सरिता तीर सजाकर
उद्दीप्त, आह्लाद, मुस्कान मधुर
जीवन का यह चक्र अविरल।

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