…इंतजार
दया और करुणा के प्रतिदान में
देवी बना कर सजा दिया
देखी नहीं दुर्दशा
दासी बना दिया।
जन्म दिया था पुत्र को
पुरुष उसको बना दिया।
कोख का अंधेरा फैलकर
चहारदिवारी में सिमट गया
चांदनी सिकुड़ने लगी
रोशनियों पर पहरा बिठा दिया।
सुरक्षा के नाम पर
मर्तबान बना दिया।
सोन चिरैया हो गई कैद
सोने के पिंजरे में।
अब फड़फड़ाते हैं पंख
और करती हूंँ इंतजार …!
यह इंतजार ही नियति बनकर रह गई
एक अदद औरत की पहचान बन गई
इंतजार …प्रेम का
… प्रकाश का
… मुक्ति का।